प्रभात रंजन दीन

आतंकवाद को लेकर पूरा देश और पूरा विश्व संवेदनशील है। लेकिन केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय को न संवेदनशीलता से कोई लेना-देना है और न संवेदना से। आतंकवाद के आरोपों में जिन्हें गिरफ्तार किया जाता है और लंबा अरसा जेल में काट लेने के बाद अदालतों द्वारा जिन्हें निर्दोष बता कर रिहा किया जाता है, उसकी कोई सूचना न गृह मंत्रालय के पास उपलब्ध है और न प्रदेश के गृह विभाग के पास। फिर सरकार ऐसे लोगों के पुनर्वास के दावे किस आधार पर कर रही है!

यह सवाल नहीं है, बल्कि आधिकारिक तथ्य है, जो सवाल बन कर केंद्र और यूपी सरकार के माथे पर चिपका हुआ है।

सबसे सनसनीखेज पहलू यह है कि आतंकी गतिविधियों में शामिल रहने के आरोप में गिरफ्तार होने वाले लोगों या निर्दोष साबित होने के बाद रिहा होने वाले लोगों के बारे में जानकारी मांगने पर, जानकारी मांगने वाले व्यक्ति को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) या एंटी टेररिस्ट स्क्वायड (एटीएस) के हवाले कर दिया जा रहा है। यह महज इसलिए कि जानकारी मांगने वाले व्यक्ति के मन में आतंकवाद के मामले में फंसने का मनोवैज्ञानिक डर भर दिया जाए, ताकि वह चुप्पी मार कर बैठ जाए।

आतंकवाद के आरोपों में गलत फंसे लोगों का ब्यौरा केंद्रीय गृह मंत्रालय और यूपी सरकार के गृह विभाग के पास नहीं है। ऐसे लोगों के निर्दोष साबित होने के बाद रिहा होने का आंकड़ा भी उपलब्ध होने की स्थिति नहीं है।

स्वाभाविक है कि ऐसे लोगों में से किन्हें मुआवजा मिला या नहीं मिला, किन्हें पुनर्वास योजना के तहत लाभ मिला या नहीं मिला और निर्दोष लोगों को फंसाने वाले कितने पुलिस वालों को सजा मिली या नहीं मिली, इसका भी कोई आंकड़ा केंद्र सरकार के पास या राज्य सरकार के पास नहीं है।

संदर्भित सूचनाएं मांगने पर गृह मंत्रालय अपने हाथ खड़े कर देता है कि उसके पास ऐसी कोई सूचना नहीं है। इसके अलावा आधिकारिक तौर पर गैर जिम्मेदाराना और बेवकूफाना बयान भी देता है कि आतंकवादी मामलों की जांच एनआईए या राज्य पुलिस करती है, लिहाजा सूचना मांगने वाले व्यक्ति का आवेदन एनआईए के हवाले किया जाता है।

साथ ही गृह मंत्रालय यह भी सलाह देना नहीं भूलता कि संबंधित सूचनाएं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के पास उपलब्ध हो सकती हैं।

प्रधानमंत्री दफ्तर के पास भी ऐसी सूचना नहीं रहती।

पीएमओ कहता है, मांगी गई जानकारी इस कार्यालय के अभिलेखों का हिस्सा नहीं है’।

प्रधानमंत्री कार्यालय कहता है कि सूचनाएं गृह मंत्रालय से मांगी जा सकती हैं। लेकिन गृह मंत्रालय से सूचना नहीं मिलती। उत्तर प्रदेश सरकार भी यही नकल करती है। मुख्यमंत्री कार्यालय जानकारी से अनभिज्ञता जता कर आवेदन को गृह विभाग भेज देता है और गृह विभाग उसे गुपचुप तरीके से एंटी टेररिस्ट स्क्वायड के पास अग्रसारित कर देता है। सूचना के अधिकार की मर्यादा समझते हुए दो पंक्ति का जवाब भेजने की भी जरूरत नहीं समझता।

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम प्रेमी सरकार का हाल बुरा है। आतंकवाद के आरोपों में फंसे और रिहा हुए लोगों के बारे में सूचनाएं मांगने पर मुख्यमंत्री कार्यालय अपनी अनभिज्ञता जताता हुआ आवेदन को गृह विभाग के सुपुर्द कर देता है। गृह विभाग उस आवेदन पर कोई जवाब नहीं देता। सूचना मांगने वाले व्यक्ति को अचानक एंटी टेररिस्ट स्क्वायड की तरफ से हाजिर होने का सम्मन पहुंचता है तो उसके होश उड़ जाते हैं। वह समझ नहीं पाता कि जानकारी मांगने का उसका अधिकार किस कानून के तहत जुर्म हो चुका है! अब वह जानकारी मांगने के बजाय अपनी सफाई पेश करता फिर रहा है और एटीएस अधिकारियों की खुशामद में कोर्निशें बजा रहा है। मुरादाबाद के आरटीआई एक्टिविस्ट सलीम बेग इन्हीं त्रासद स्थितियों से गुजर रहे हैं।

ऐसे अनगिनत सलीम बेग हैं, जो सूचनाएं मांगने के चक्कर में अब एनआईए और एटीएस के दफ्तरों के आगे पीछे घनचक्कर हो रहे हैं

बाटला हाउस मुठभेड़ कांड के बारे में सूचनाएं मागने पर आजमगढ़ के विनोद यादव को इस कदर प्रताड़ित किया गया कि उसका जिक्र करते हुए वे असहज हो जाते हैं। स्पेशल टास्क फोर्स ने उन्हें लखनऊ के चारबाग स्टेशन से उठा लिया और एक हफ्ते तक अपने पास बंधक बनाए रखा। इस दरम्यान वे आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े तमाम ऐसे सवाल पूछते रहे, जिसका उनसे कोई प्रसंग ही नहीं बनता था।

एसटीएफ के अधिकारी विनोद यादव और उनके साथियों की टेलीफोन पर हुई बातचीत के कॉल रिकार्ड सुनाकर उसे गलत गतिविधियों से जबरन जोड़ते और प्रताड़ित करते। फिर एसटीएफ ने अपराधियों की तरह अपनी गाड़ी में बैठा कर लगातार दो दिन लखनऊ की सड़कों पर घुमाया।

आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोपों में सबसे अधिक लोगों की गिरफ्तारी उत्तर प्रदेश में हुई है। इनमें से कई लोग लंबे अरसे तक जेल भुगत लेने के बाद निर्दोष करार दिए गए। लेकिन उनके रिहा होने से उनकी खुशियां थोड़े ही लौट सकती हैं।

अपनी उम्र का सबसे अच्छा हिस्सा जेल में बिना कसूर काट लेने के बाद उनमें बचता ही क्या है!

उत्तर प्रदेश के विभिन्न सरकारों के कार्यकाल के हिसाब से देखें तो मायावती के कार्यकाल में आतंकवादी होने के आरोप में सबसे अधिक लोग गिरफ्तार किए गए। मायावती के कार्यकाल में 41 लोगों की गिरफ्तारी हुई। इनमें तारिक कासमी, खालिद मुजाहिद, कौसर फारूकी, गुलाब खान, मो। शरीफ, सबाहुद्दीन, फहीम अंसारी, जंग बहादुर, नूर इस्लाम, सज्जादुर्रहमान, मो. अख्तर वानी, याकूब, नासिर हुसैन, नौशाद, जलालुद्दीन, मो. अली अकबर, अज़ीज़ुर्रहमान, शेख मुख्तार, आफताब आलम अंसारी, मुफ्ती अबुल बशर, शहबाज़, बशीर हसन, मो. आरिफ, सलमान, शहज़ाद, हबीब फलाही, मो. सैफ, सैफुर्रहमान, साकिब निसार, हाकिम, ज़ीशान, आरिफ बदर, ज़ाकिर शेख, अफज़ल उस्मानी, इजहार, जियाउद्दीन, मो. आबिद, सादिक शेख, महबूब मंडल और सरवर शामिल हैं।

इसी तरह मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में आतंकवादी होने के आरोपों में 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें आसिफ इकबाल, मो. नसीम, मो. अज़ीज़, शकील अहमद, डॉ. इरफान, मौलाना वलीउल्लाह, महबूब अली, सैयद शोएब हुसैन, फरहान, रिज़वान सिद्दीकी, मो. शाद अली और सैय्यद मुबारक सीतापुर के नाम शामिल हैं। मुलायम के पुत्र अखिलेश यादव के ताजा कार्यकाल में 16 लोगों को आतंकवादी होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इनमें अमजद, ज़ाकिर, सालिक, महबूब, नजमा, ज़फर मसूद, मौलाना मुफ्ती अबुल समी कासमी, असदुल्लाह अख्तर, आसिफ, मो. अलीम, रिज़वान, फखरुद्दीन, अहमद, वसीम बट, सज्जाद बट और शकील अहमद शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार की असलियत यह भी है कि जिन गिरफ्तार लोगों को अदालतों की तरफ से रिहा किया गया, उनकी रिहाई के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार ही सुप्रीम कोर्ट में अपील में चली गई और रिहाई रुक गई

ऐसे निर्दोष लोगों की रिहाई के लिए कानूनी से लेकर राजनीतिक-सामाजिक लड़ाई लड़ने वाले ‘रिहाई मंच’ के राजीव यादव कहते हैं कि आतंकवाद के नाम पर न केवल प्रदेश के लोगों को जेलों में ठूंसा जा रहा है, बल्कि उन्हें फर्जी मुठभेड़ों में मारा भी जा रहा है।

बाटला हाउस मुठभेड़ कांड में आजमगढ़ के साजिद और आतिफ अमीन इसी तरह मारे गए। 23 दिसंबर 2007 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को मारने की साजिश रचने के नाम पर कश्मीरी शॉल बेचने वाले दो लोगों को लखनऊ के चिनहट में मार डाला गया था। पुलिस ने उन्हें लश्कर का आतंकी बताया था, जबकि बाद में पाया गया कि वे जाड़े में शॉल बेचने के लिए आने वाले कश्मीरी व्यापारी थे।

राजीव कहते हैं कि इसी तरह 25 जनवरी 2009 को नोएडा के सेक्टर 97 में फर्जी मुठभेड़ में दो लोगों को मारा गया, लेकिन उनके बारे में पुलिस ने बताया ही नहीं कि उनके आतंकी होने का सुराग क्या था। इसी तरह लखनऊ के इजहार को वारंगल में फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था।

रिहाई मंच का कहना है कि उत्तर प्रदेश के नौ युवक विभिन्न आतंकी मामलों में गिरफ्तार किए गए, लेकिन उनका कोई अता-पता नहीं है। आजमगढ़ का डॉ. शाहनवाज बाटला हाउस कांड में पकड़ा गया था, लेकिन आज तक लापता है। अहमदाबाद विस्फोट कांड, दिल्ली विस्फोट कांड और जयपुर विस्फोट कांड में शामिल होने और इंडियन मुजाहिदीन और आईएसआईएस का सदस्य होने के आरोप में पकड़े गए आजमगढ़ के खालिद का भी कोई अता-पता नहीं है। मुम्बई रेल सीरियल ब्लास्ट कांड में पकड़े गए आजमगढ़ के अबु राशिद का भी कुछ पता नहीं चला। आजमगढ़ के ही मोहम्मद आरिज को अहमदाबाद विस्फोट कांड, दिल्ली विस्फोट कांड, जयपुर विस्फोट कांड और बाटला हाउस कांड में शामिल होने के आरोप में पकड़ा गया था, लेकिन वह लापता है। इन्हीं कांडों में शामिल होने के आरोप में पकड़े गए आजमगढ़ के मिर्जा शादाब बेग, वासिक बिल्लाह, साजिद बड़ा, मोहम्मद राशिद और शादाब अहमद का भी आज तक कोई अता-पता नहीं चला। इन्हें पुलिस ने इंडियन मुजाहिदीन और आईएसआईएस का सदस्य बताया था।

तकरीबन डेढ़ दर्जन ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें आतंकवादी आरोपों में गिरफ्तार लोग लंबे-लंबे समय तक जेलों में सड़ते रहे, बाद में निर्दोष साबित होकर रिहा हुए लेकिन उन्हें किसी भी पुनर्वास पैकेज का फायदा नहीं मिला और उनकी जिंदगी रिहा होने के बावजूद त्रासदियों में कैद होकर रह गई।

लखनऊ के सहकारिता भवन विस्फोट मामले (अपराध संख्या- 213/2000) में गिरफ्तार किए गए कलीम अख्तर और सैयद अब्दुल मुबीन के साथ ऐसा ही हुआ। लखनऊ के हुसैनगंज में आरडीएक्स के साथ रंगे हाथों गिरफ्तार किए गए बिजनौर के याकूब को अदालत ने निर्दोष साबित कर रिहा किया।

इसी तरह लखनऊ के नाका थाना इलाके में पकड़े गए बिजनौर के ही नासिर हुसैन और वजीरगंज पुलिस द्वारा पकड़े गए नौशाद को भी अदालत ने निर्दोष पाया। जबकि पुलिस ने इन्हें आरडीएक्स के साथ पकड़ने का दावा किया था। बरेली के सैयद मुबारक, कानपुर के वासिफ हैदर, मुमताज, रामपुर के जावेद, ताज मोहम्मद और मकसूद व लखनऊ के आफताब आलम अंसारी भी लंबा अर्सा जेल में बिताने के बाद निर्दोष साबित होकर रिहा हुए।

लखनऊ के वजीरगंज थाने की पुलिस ने पश्चिम बंगाल के जलालुद्दीन उर्फ बाबू भाई, मोहम्मद अली अकबर हुसैन, अजीजुर्रहमान सरदार और शेख मुख्तार को आरडीएक्स के साथ पकड़ने का दावा किया था, लेकिन अदालत ने सबूतों के अभाव में उन लोगों को रिहा कर दिया। लेकिन इन्हें सरकार की तरफ से कोई मुआवजा या राहत पैकेज का लाभ नहीं मिला।

केरल के एरनाकुलम में वाघमन में आतंकियों का ट्रेनिंग कैंप चलाने के नाम पर गिरफ्तार किए गए आजमगढ़ के अबू शाद और शाह आलम को भी अदालत ने निर्दोष पाया और उन्हें जेल से रिहा कर दिया। उनके खिलाफ मुकदमा चलाने लायक कोई साक्ष्य ही नहीं पाया गया। अदालत से वे रिहा तो हो गए, लेकिन उन्हें न तो केरल सरकार ने कोई मुआवजा दिया और न उत्तर प्रदेश सरकार ने कोई खोज-खबर ली।

रामपुर सीआरपीएफ कैंप पर हमले के आरोप में गिरफ्तार प्रतापगढ़ के कौसर फारूकी समेत कई लोग जेल में बंद हैं, लेकिन उस मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ रही। यहां तक कि हाईकोर्ट ने भी कहा कि मामले की तेज सुनवाई की जाए पर उसका भी कोई असर नहीं हुआ।

सिमी के नाम पर गिरफ्तारियों का जो सिलसिला शुरू हुआ वह सारे मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में जारी रहा।

मुलायम के कार्यकाल में हूजी के नाम पर इलाहाबाद से वलीउल्लाह समेत 12 लोगों की गिरफ्तारियां, मायावती की सरकार में आजमगढ़ के तारिक-खालिद समेत 41 लोगों की गिरफ्तारियां और अब अखिलेश सरकार में मौलाना खालिद (जो हिरासत में मारा गया) समेत 16 लोगों की गिरफ्तारियां इसी का क्रम है।

संभल से आसिफ और जफर मसूद को अलकायदा के नाम पर गिरफ्तार कर लिया जाता है तो लखनऊ में अलीम और कुशीनगर से रिजवान को आईएसआईएस के नाम पर पकड़ कर जेल में ठूंस दिया जाता है।

सिमी और हूजी के नाम पर जो गिरफ्तारियां हुई उनमें से अधिकतर लोग अदालतों से रिहा हो गए, लेकिन न तो उन्हें कोई मुआवजा मिला और न दोषियों पर कोई कार्रवाई हुई

अहमदाबाद और लखनऊ धमाकों के आरोपी संजरपुर निवासी आरिफ के परिजन पूछते हैं कि लखनऊ कचहरी धमाके में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार कर चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी तो फिर बाद की आतंकी घटनाओं में यही नाम कैसे जोड़ दिए गए?

इस तरह के दर्जनों मामले सामने आए, जिसमें पहले की किसी घटना में गिरफ्तारियां हुईं और उनके जेल में रहते हुए उन्हें बाद की घटनाओं में भी शामिल दिखा दिया गया। ऐसे ही विरोधाभासी मामले अदालतों द्वारा छोड़े जा रहे हैं, लेकिन इससे भी प्रताड़नाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा।

सीतापुर के सैय्यद मुबारक हुसैन तो बरेली में फेरी लगाकर शॉल बेचते थे। उनका कसूर यह था कि वे गोरे हैं और उनकी कद-काठी अच्छी है। बस, उन्हें कश्मीरी बता दिया गया और आतंकवाद के आरोप में उन्हें चार साल जेल में बिताना पड़ा। अदालत ने उन्हें रिहा किया।

विडंबना यह है कि मुबारक हुसैन की मां जब उनसे मिलने जातीं तो पुलिस उन पर कश्मीर का प्रमाण पत्र लाने का दबाव डालती।

सीतापुर के रहने वाले मुबारक हुसैन के बच्चे भी काफी गोरे हैं। अब उन्हें यह डर सताता है उनके बच्चों को भी कहीं पुलिस कभी कश्मीरी आतंकी न बता दे।

रामपुर के जावेद को पाकिस्तानी लड़की से प्रेम करने की सजा में लंबे अरसे तक जेल में रहना पड़ा। जावेद की मां पाकिस्तान के अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए जाना चाहती थीं, उसी दरम्यान फोन पर एक लड़की से जावेद की बात हुई थी। जब जावेद अपनी मां के साथ पाकिस्तान गए तो वहां उस लड़की से उन्हें प्रेम हो गया। प्रेम की पेंगों में परस्पर लिखे जाने वाले प्रेम पत्रों में जावेद और मोबीना ‘जे-एम’ लिखा करते थे। पुलिस ने प्रेमी जोड़े ‘जे-एम’ को जैशे मुहम्मद बता दिया। मोबीना के उर्दू में लिखे गए खत को हिंदी में अनुवाद करने या जावेद के हिंदी वाले पत्र को उर्दू में लिखने वाले जावेद के दोस्तों सरताज और मकसूद को भी पुलिस ने आईएसआई एजेंट बता दिया और सबको जेल में ठूंस डाला।

यूपी की जेलों में बंद यूपी के ‘आतंकी’ आतंकवाद के नाम पर उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद मुस्लिम नौजवानों की तादाद काफी है। आधिकारिक तौर पर जो आंकड़े सामने आए हैं, उसके मुताबिक यह संख्या 32 है। लेकिन जेल विभाग के ही सूत्र बताते हैं ऐसे लोगों की संख्या सौ से ऊपर है, जो प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद हैं। वे किसी मामूली केस में भी अंदर आए तो उनकी जमानत के समय पुलिस उन पर आतंकी गतिविधियों जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमा लाद देती है और उन्हें जेल में ही घुटना पड़ता है।

प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद ऐसे कैदियों का आधिकारिक ब्यौरा यह है।

तारिक कासमी, निवासी- आज़मगढ़। लखनऊ कचहरी बम कांड, अपराध संख्या- 547/07, थाना- वजीरगंज; फैजाबाद कचहरी बम कांड, अपराध संख्या- 3398/07, थाना- कोतवाली सिटी फैजाबाद; बाराबंकी विस्फोट कांड, अपराध संख्या- 1891/07, कोतवाली बाराबंकी; गोरखपुर विस्फोट कांड, अपराध संख्या- 812/07, थाना- कैंट गोरखपुर। गोरखपुर मामले में उम्र कैद और शेष में विचाराधीन।

खालिद मुजाहिद, निवासी- जौनपुर। लखनऊ कचहरी बम कांड, अपराध संख्या- 547/07, थाना- वजीरगंज; फैजाबाद कचहर