लाठीचार्ज व जेल भेजना बिहार पुलिस के लिये हुयी आमबात
8 जनवरी को पुलिस ने किया लाठीचार्ज कर 150 घायल, 36 छात्रों को, को भेजा जेल
विद्या सागर
पटना। बिहार की तथाकथित सुशासन सरकार में जनआन्दोलनों पर पुलिस-प्रशासन द्वारा दमन अब आम बात हो गया है। सरकार के खिलाफ कोई भी आन्दोलन करें, बिहार पुलिस उसको छोड़ने वाली नहीं है। जी हाँ, नीतीश कुमार के बिहार में अब यही हो रहा है। पिछले वर्ष 2013 के फरवरी माह में ट्रेड यूनियन का भारत बंद के दौरान बिहार पुलिस द्वारा लाठीचार्ज हो या शिक्षकों द्वारा अपनी माँगों को लेकर लगातार हो रहे आन्दोलन। शिक्षकों पर तो नीतीश सरकार की पुलिस ने हद ही कर दिया था। रात के 12 बजे शिक्षक-शिक्षिकाओं को बुरी तरह पिटाई करने के बाद दर्जनों शिक्षकों को जेल भेज दिया था। इसके बाद पूरे बिहार के शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल सरकार की नींद हराम कर दी थी।
इस आन्दोलन पर हुये लाठीचार्ज के बाद तो सुप्रीम कोर्ट ने भी बिहार पुलिस को फटकार लगायी थी। फिर भी यहाँ की पुलिस और सरकार सचेत नहीं हुयी। सुप्रीम कोर्ट के फटकार के बाद भी 31 अगस्त 2013 को एआईएसएफ के प्रदर्शकारी छात्रों को पटना के सचिवालय डीएसपी मनीष कुमार ने थाने में बंद कर उनकी अपराधियों से भी ज्यादा पिटाई कर दी थी। इसे लेकर एआईएसएफ ने सचिवालय डीएसपी पर कार्रवाई की माँग को लेकर लगातार राज्य भर में प्रदर्शन किया। जब सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की तो एआईएसएफ ने पटना के जिला कोर्ट में वाद दायर किया जो अभी चल रहा है।
शिक्षक, छात्र आन्दोलनों पर लाठीचार्ज के बाद बिहार पुलिस का खौफनाक चेहरा एक बार फिर अक्टूबर में बिजली मजदूरों के प्रदर्शन पर दिखा था। पुलिस ने बिजली विभाग के कर्मचारियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जिसमें 300 से ज्यादा कर्मचारी बुरी तरह घायल हो गये। इसे लेकर बिजली विभाग के कर्मचारियों ने बिहार में बिजली आपूर्ति को ही रोक दिया। जिसके बाद इन कर्मचारियों के आगे सरकार नत्मस्तक हो गयी और इनकी माँगों को मानना पड़ा। ये सब मामला धीरे-धीरे लोग भूल रहे थे। लेकिन बिहार पुलिस की दरिन्दगी एक बार फिर वर्ष 2014 के पहले हफ्ते में ही देखने को मिल गयी।
8 जनवरी 2014 को ऑल इण्डिया स्टूडेन्ट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) के छात्र इन्टर परीक्षा में ओआरएम सीट एवं बहुवैकल्पिक प्रश्नों को हटाने का फैसला वापस लेने, आईबीपीएस-2 पीओ एवं कर्लक परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति सुनिश्चित करने, सूबे में रिक्त पदों पर शिक्षक-कर्मचारियों की स्थायी नियुक्ति, सूबे के सभी विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के रेगुलेशन की मंजूरी प्रदान कर अलग आधारभूत संरचना विकसित करने, टीईटी-एसटीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों की अविलम्ब नियुक्ति करने एवं नियुक्ति प्रक्रिया में व्यवहारिक संशोधन करने, मनमाने तरीके से बढ़ रहे मकान किराए पर रोक लगाने हेतु रूम रेन्ट कन्ट्रोल एक्ट लागू करने, छात्र आन्दोलन पर हो रहे दमन पर रोक लगाने, विगत दिनों छात्रों पर दर्ज फर्जी मुकदमे वापस करने, विगत दिनों लाठीचार्ज के दोषी सचिवालय डी॰एस॰पी॰ मनीष कुमार को निलम्बित करने, ईबीसी/ओबीसी (पोस्ट मैट्रिक) छात्रवृति के लिये सत्र 2013-14 का आवेदन प्रपत्र यथाशीघ्र निकालने, वहीं 2012-13 के आवेदन लिये छात्रों को छात्रवृति देने, सूबे में प्रारम्भिक शिक्षा मातृभाषा में देना सुनिश्चित करने, एमबीबीएस पढ़ाई के दरम्यान रूरल पोस्टिंग की बाध्यता खत्म करने, विभिन्न वि॰वि॰ में एकेडमिक कैलेण्डर को सख्ती से लागू करने, उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्याँकन की सुविधा पुनः बहाल करने, निजी विश्वविद्यालय कानून रद्द करने के साथ-साथ सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की बदहाली दूर करने, समान स्कूल प्रणाली लागू करने, मगध महिला कालेज के पास कन्वेंशन सेंटर बनाने का फैसला वापस लेने, छात्राओं की सुरक्षा की गारंटी करने तथा जे॰एन॰यू॰ के तर्ज पर हर महाविद्यालय में जेण्डर सोन्सिटाइजेशन सेल का गठन करने, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा तथा मोतिहारी एवं गया में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना यथाशीघ्र करने, लिंगदोह समिति की सिफारिशें रद्द कर लोकतान्त्रिक ढँग से छात्र संघ का चुनाव कराने, राज्य में चिकित्सा क्षेत्र सहित स्नातकोत्तर केन्द्रों एवं स्नातकोत्तर की सीटों की संख्या में वृद्धि करने, हाजीपुर (वैशाली) में उत्क्रमित मध्य विद्यालय को पुनः उच्च विद्यालय का दर्जा दिया जाए तथा विद्यालय का दर्जा छीनने वाले लापरवाह अधिकारियों को बर्खास्त करने, दरभंगा अवस्थित सी॰एम॰ लॉ कॉलेज एवं आयुर्वेदिक कॉलेज तथा मोतिहारी स्थित एम॰एस॰ लॉ कॉलेज में पढ़ाई पर लगी रोक को यथाशीघ्र हटाने, मगध वि॰ वि॰ के पटना प्रक्षेत्र के कॉलेजों को मिलाकर पाटलिपुत्र विश्ववि़द्यालय एवं बेगूसराय में दिनकर विश्वविद्यालय का निर्माण सुनिश्चित करने, सूबे के अन्दर छात्रावासों की बदहाली दूर करते हुये आवश्यकतानुसार छात्रावासों की संख्या बढ़ाने, प्रत्येक प्रखंड में डिग्री महाविद्यालय की होना सुनिश्चित करने, साथ ही, सूबे के अन्दर में मेडिकल और इंजिनियरिंग कालेजों की संख्या में वृद्धि करने, औरंगाबाद स्थित अल्पसंख्यक छात्रावास एवं मोतिहारी स्थित ओबीसी छात्रावास सहित राज्य के सभी निर्मित छात्रावासों को यथाशीघ्र छात्रों को उपलब्ध कराने, मोईनुलहक स्टेडियम से सैदपुर जानेवाला रास्ता यथाशीघ्र खोलने, साईकिल पोशाक योजना में धांधली पर रोकने, साथ ही, मध्याह्न भोजन के वितरण में लगे धांधली के दोषी अधिकारियों को बर्खास्त करने आदि माँगों को लेकर विधान सभा धेराव करने गांधी मैदान से 12 बजे निकले थे।
कड़कड़ाती ठंड में बिहार के विभिन्न जिलों से आये हजारों छात्रों का जुलूस जब डाकबंगला पहुँचा तो पुलिस वहीं पर छात्रों को रोकना शुरू कर दिया। छात्र नहीं माने और आर ब्लॉक की तरफ कूच कर गये। पुलिस ने छात्रों को बिना चेतावनी दिये लाठी भाँजना शुरू कर दिया। अफरातफरी मचने के बाद छात्रों का एक बड़ा हिस्सा दरोगा राय पथ की ओर भागने लगा। इसके बाद बिहार पुलिस ने अपना बर्बर चेहरा दिखा दिया। छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर इतना पीटा कि दर्जनों छात्रों के सर फट गये। तो कई छात्रों के हाथ और पैर में गंभीर चोटें आयीं। प्रदर्शन में भाग लेने आये एआईएसएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सैयद बली उल्ला कादरी को भी लाठीचार्ज में गंभीर चोटें आयीं। संगठन के राज्य सचिव सुशील कुमार का सर फट गया, वहीं राज्य कोषाध्यक्ष हरेन्द्र पंडित का दाहिना पैर एवं हाथ टूट गया। प्रदेश अध्यक्ष परवेज आलम, मुकेश कुमार समेत 150 छात्रों को गंभीर चोटें आयी। इतना ही नहीं पुलिस ने सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर छात्रों को पीटने के बाद 36 छात्र नेताओं को जेल भी भेज दिया। जिसमें 3 नाबालिक बच्चे शामिल थे। जेल भेजे गये सभी छात्र नेता बुरी तरह जख्मी थे जिनका पुलिस ने समुचित इलाज तक नहीं कराया।
इस घटना के विरोध में एआईएसएफ ने बिहार में नीतीश सरकार व इनकी निक्कमी पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 9 जनवरी को पटना कॉलेज में एक कार्यक्रम में शामिल होने गये मानव संसाधन विकास मंत्री प्रशांत कुमार शाही को छात्रों ने घेर कर घंटों बंधक बनाये रखा। पुलिस के बीच-बचाव के बाद छात्र शांत हुये। 10 जनवरी को छात्र नेताओं की रिहाई व लाठीचार्ज के दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की माँग को लेकर एआईएसएफ ने राज्य के सभी स्कूल-कॉलेजों को बंद करने का कॉल दिया। जिसका व्यापक असर राजधानी समेत 20 जिलों में देखने को मिला। इसके बाद भी सरकार द्वारा कोई पहल नहीं किये जाने के बाद 13 जनवरी को राज्य भर में छात्रों ने रेल एवं सड़क मार्ग को जाम कर अपना विरोध जताया। सरकार द्वारा अनदेखी किये जाने के बाद संगठन के राष्ट्रीय महासचिव विश्वजीत कुमार ने 18 जनवरी को बिहार बंद की घोषणा कर दिया। बिहार बंद की घोषणा पर राजधानी समेत 20 जिलों में इनके बंद का व्यापक असर रहा।
एआईएसएफ के छात्र नेताओं पर लाठीचार्ज एवं जेल भेजे जाने के खिलाफ आइसा, छात्र राजद, एआईबीएसएफ, छात्र राकपा एवं छात्र लोजपा ने सरकार की निंदा करते हुये इनके आन्दोलन के साथ रही।
लगातार संघर्ष के बाद भी सुशासन बाबू पर कोई फर्क नहीं पड़ा। अंत में 21 जनवरी को सभी गिरफ्तार छात्र नेताओं को पटना जिला कोर्ट से जमानत मिल गयी। 22 जनवरी को सभी गिरफ्तार छात्र रिहा हो गये।
ये रही बिहार के सुशासन सरकार में आन्दोलनों पर सरकार व पुलिस के बर्बर दमन की कहानी। ये कहानी यहीं समाप्त नहीं होती है। पटना पुलिस का एक और कारनामा 17 जनवरी के अखबार में सामने आया। पटना कॉलेज के 6 छात्रों पर मारपीट एवं बमबारी के एक मामले में रासुका लगाने के ऐलान पटना के एसएसपी मनु महाराज ने कर दिया। पटना विश्वविद्यालय ने जनतांत्रिक छात्र आन्दोलनों को रोकने के लिये कैम्पस में प्रदर्शन पर ही 18 जनवरी 2014 को रोक लगा दिया।
बिहार पुलिस, सरकार एवं विश्वविद्यालय प्रशासन के ऐसे रवैये से तो यह साफ हो रहा है कि सरकार राज्य के अंदर जनआन्दोलनों पर दमन कर इसे रोकना चाहती है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस लोकतंत्र में क्या आन्दोलन करना, धरना देना, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना गुनाह है? अगर नहीं तो फिर सुशासन बाबू ऐसा क्यों कर रहे हैं।
विद्या सागर, पटना स्थित युवा पत्रकार हैं।