“आप” की सफलता और जासूसी की सच्चाई सामने आने से नरेंद्र मोदी को विजेता ब्राण्ड बनाने की उनकी कोशिशों को झटका जरूर लगेगा।

शेष नारायण सिंह

आम आदमी पार्टी (आप) के कनाट प्लेस दफ्तर में कुछ घण्टे बिताने पर समझ में आने लगता है कि कम से कम दिल्ली में तो इस पार्टी की झाड़ू तेजी से चल रही है। हनुमान रोड के एक पुराने मकान में यह दफ्तर बना हुआ है। योगेन्द्र यादव और संजय सिंह की प्रेस कान्फ्रेंस के पहले और बाद में घर के सामने की सड़क पर पार्टी कार्यकर्ताओं और टिकट माँगने वालों का मेला लगा हुआ था। 1977 जैसा माहौल लग रहा था। 36 साल पहले उस साल भी जब जनता पार्टी जीतकर आयी थी तो दिल्ली में उस वक्त के युवक काँग्रेस के बहुत सारे कार्यकर्ता जनता पार्टी के नेताओं के दरबार में फेरी लगाने लगे थे। गुरुवार को आप के दफ्तर में भी दिल्ली की राजनीति में सक्रिय भाजपा और काँग्रेस के कई नेता नजर आए। कई प्रापर्टी डीलर भी दिखे। यहाँ यह समझ लेना जरूरी है कि दिल्ली में भाजपा और काँग्रेस की राजनीति में प्रॉपर्टी डीलरों का दबदबा रहता है।

प्रेस कान्फ्रेंस में जब योगेन्द्र यादव ने कहा कि भाजपा को डर है कि कहीं उनकी तथाकथित मोदी वेव की हवा न निकल जाये तो प्रेस कान्फ्रेंस में मौजूद भाजपा से सहानुभूति रखने वाले पत्रकारों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी थीं। योगेन्द्र यादव के इस कथन में अब दम नजर आने लगा है क्योंकि उनकी पार्टी अब एक विजेता पार्टी है और उसने सत्ता के बिलकुल करीब पहुँच चुकी भाजपा और उसके नेता नरेंद्र मोदी की गति को रोक दिया है। हालाँकि भाजपा वाले इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं लेकिन इस बात में सच्चाई है कि जिन चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे 8 दिसंबर को निकले हैं उनमें छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अपने बल पर जीते हैं। राजस्थान में काँग्रेस के सभी बड़े नेता मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को हराने के लिये काम कर रहे थे जबकि दिल्ली का चुनाव शुद्ध रूप से नरेंद्र मोदी का चुनाव था। दिल्ली में नरेंद्र मोदी ने अपने मन का मुख्यमंत्री पद का दावेदार तय किया था, खुद ही कई सभाओं में भाषण किया था और खूब प्रचार किया था। उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी तो बन गयी लेकिन सरकार नहीं बना सकी। इस राजनीतिक घटना ने बिल्कुल साफ कर दिया कि दिल्ली में जनता ने नरेंद्र मोदी और उनके ब्राण्ड की राजनीति को नकार दिया है।

दिल्ली विधानसभा की चुनावी राजनीति में मिली असफलता के बाद नरेंद्र मोदी को विजेता ब्राण्ड बनाने की भाजपा की कोशिश को जबरदस्त झटका लगा है। अब तक काँग्रेस को दुश्मन नम्बर एक मान रही भाजपा के नेता डर गये हैं और अब वे नए सिरे से आप और अरविन्द केजरीवाल को निशाने पर लेने की कोशिश कर रहे हैं। अब बाकी देश की तरह उनको भी मालूम है कि आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता देश के 94 शहरी लोकसभा क्षेत्रों में बहुत ज्यादा है, इसके अलावा 122 अर्धशहरी क्षेत्रों में भी झाड़ू की लोकप्रियता की खबरें आ रही हैं। ऐसी हालत में अब भाजपा के नेताओं को लगने लगा है कि काँग्रेस को दुश्मन नम्बर एक मानकर गलती हो रही थी। पिछले विधानसभा चुनावों में आये नतीजों ने साफ बता दिया है कि दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश में काँग्रेस की ताकत बहुत कमजोर पड़ चुकी है। छत्तीसगढ़ और मिजोरम में वह अभी भी है लेकिन यह दोनों छोटे राज्य हैं और केन्द्र में सत्ता दिलाने में बहुत ही मामूली भूमिका निभायेंगे। दिल्ली में नरेंद्र मोदी की रफ्तार को रोक चुकी आप के सपने बड़े हैं, वे लोकसभा में बड़े पैमाने पर शामिल होने जा रहे हैं।

योगेन्द्र यादव और संजय सिंह की प्रेस कान्फ्रेंस का उद्देश्य लोकसभा चुनाव की तैयारियों की जानकारी देना भी था। इस बात में दो राय नहीं है कि आप बिल्कुल नयी पार्टी है और उसके नेताओं को खुद नहीं मालूम है कि वे कितने लोकप्रिय हैं लेकिन उनकी सम्भावित लोकप्रियता से भाजपा में चिंता बढ़ गयी है। शायद इसीलिये आप के खिलाफ अब भाजपा के बड़े नेताओं के बयान आने लगे हैं। वरना इसके पहले तो भाजपा के बड़े नेता लोग अरविन्द केजरीवाल को नजरअंदाज करने की रणनीति पर ही काम कर रहे थे। नरेंद्र मोदी को एक विजेता ब्राण्ड के रूप में पेश करने की भाजपा की कोशिश को आम आदमी पार्टी की सफलता ने एक मजबूत झटका दिया है। इसके बाद भाजपा में अरविन्द केजरीवाल को कमजोर साबित करने की कोशिशें तेज हो गयी हैं। नरेंद्र मोदी को विजेता ब्राण्ड बनाने की भाजपा के एक वर्ग की कोशिशों पर पार्टी के अन्दर की ताकतें भी नजर लगाए हुये हैं।

हमदाबाद के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के उस फैसले पर भी भाजपा के इस वर्ग की नजर थी। यह मामला एक बहुत ही सीमित दायरे वाला केस था। उस केस में विशेष जाँच टीम की उस अर्जी पर फैसला आना था जिसमें कहा गया था कि हालाँकि जकिया जाफरी के पति अहसान जाफरी की हत्या और गुलबर्गा सोसाइटी में हुये नरसंहार में गुजरात सरकार के शामिल होने के संकेत साफ थे, लेकिन नरेंद्र मोदी की संलिप्तता साबित करने लायक सबूत आरके राघवन वाली जाँच टीम नहीं जुटा पाई थी और कोर्ट से प्रार्थना की थी कि उसको जाँच बन्द करने की अनुमति दी जाये। अदालत ने विशेष जाँच टीम की अर्जी मान ली। लेकिन उसके बाद भाजपा के मोदी समर्थक खेमे में जिस खुशी की लहर देखी गयी वह बहुत ही दिलचस्प थी। ऐसा लग रहा था जैसे 2002 के नरसंहार के सभी मुकदमों से नरेंद्र मोदी बरी हो गये हों। लेकिन सच यह है कि ऐसा कुछ नहीं है। अभी पता नहीं कब तक नरेंद्र मोदी के सर पर 2002 के गुजरात नरसंहार की तलवार लटकती रहेगी। ब्रांड मोदी को तबाह करने के लिये काँग्रेस की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार ने एक और काम कर दिया है। केन्द्र सरकार ने आदेश कर दिया है कि कुख्यात स्नूपगेट (जासूसी) काण्ड की जाँच अब केन्द्र सरकार करवायेगी। स्नूपगेट काण्ड वास्तव में नरेंद्र मोदी के खास शिष्य और गुजरात के पूर्व गृह राज्यमंत्री अमित शाह की उस कारस्तानी का नाम है जिसमें वे किसी लड़की का पीछा करने के लिये गुजरात पुलिस के अधिकारियों का इस्तेमाल कर रहे थे। यह काम वे किसी साहेब के लिये कर रहे थे। काँग्रेस का कहना है कि यह साहेब कोई और नहीं खुद नरेंद्र मोदी ही हैं। इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद नरेंद्र मोदी की नायक की छवि में कुछ कमी आना शुरू हुयी थी लेकिन गुजरात सरकार ने बहुत तेजी से काम किया और एक कमीशन बना दिया जिसके जिम्मे स्नूपगेट की जाँच का काम सौंप दिया गया। जो लोग गुजरात नरसंहार की जाँच के लिये गठित नानावती कमीशन के बारे में जानते हैं उनको मालूम है कि इस जाँच का मकसद क्या है। लेकिन केन्द्र सरकार ने स्नूपगेट की नई जाँच का आदेश देकर यह सुनिश्चित कर दिया है कि स्नूपगेट की सारी जानकारी अब मीडिया में आती रहेगी। जासूसी को पब्लिक डोमेन में लाने वाले पोर्टल, गुलेल, का दावा है कि अभी तो ऐसी बहुत सारी जानकारी उसके पास मौजूद टेप में हैं। अगर यह सच है तो जासूसी के #साहेब एक #खलनायक के रूप में प्रस्तुत हो जायेंगे और ब्राण्ड नरेंद्र मोदी स्थापित करने की रणनीति पर सवाल उठने लगेगा।

यह बात भाजपा में नरेंद्र मोदी समेत सभी नेताओं को मालूम है कि भारत की जनता किसी संदिग्ध चरित्र को देश का प्रधानमंत्री कभी नहीं बनने देगी। उस हालत में फिर से भाजपा के अन्दर किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश शुरू हो जायेगी जो जरूरी संख्या में सीट मिलने पर पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री बन सके। इस तलाश में सबसे पहले लालकृष्ण आडवानी का नाम आयेगा क्योंकि उन्होंने अभी मैदान छोड़ा नहीं है। शैडो प्रधानमंत्री सुषमा स्वराज या अरुण जेटली भी नरेंद्र मोदी से ज्यादा काबिल माने जाते हैं। इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व में उन नेताओं पर भी विचार किया जा सकता है जो जमीन से जुड़े हुये हैं। इस वर्ग में राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, रमन सिंह, वसुन्धरा राजे और शिवराज सिंह का नाम आता है। यह बात भाजपा के अन्दर मौजूद मोदी के समर्थकों और विरोधियों सबको मालूम है।

ब्राण्ड मोदी पर आए इस खतरे को पार्टी ने भाँप लिया है। इसी कारण पार्टी ने सर्वोच्च स्तर पर मोदी के चरित्र को बेनकाब करने की कांग्रेसी योजना के खिलाफ लामबन्दी शुरू कर दी है। जासूसी पर केंद्रीय जाँच की घोषणा के कुछ घण्टे बाद ही पार्टी के बहुत सीनियर नेता अरुण जेटली मीडिया से मुखातिब थे। उन्होंने कहा कि तथाकथित स्नूपिंग के मामले में नयी जाँच करवाने के केन्द्र का फैसला वास्तव में गुजरात सरकार की छवि को खराब करने की कोशिश है। यह हमारे संविधान के फेडरल ढाँचे को ध्वस्त करने की कोशिश है। उन्होंने सवाल किया कि जब राज्य सरकार ने जाँच का आदेश दे दिया है तो केन्द्र की जाँच का क्या औचित्य है। अरुण जेटली केन्द्र राज्य सम्बंधों के हवाले से अपनी बात को कहते रहे, लेकिन उनके मन में और पार्टी की सोच में शंका है।

दिल्ली की राजनीति के जानकार जानते हैं कि नरेंद्र मोदी आज जो कुछ भी हैं उसके निर्माण में अरुण जेटली का सबसे ज्यादा योगदान है और अपने क्रियेशन को कमजोर होते देख अरुण जेटली का चिंतित होना स्वाभाविक है। अरुण जेटली अब तक आप की उपेक्षा करते रहे थे, लेकिन अब उन्होंने उन पर सीधा हमला शुरू कर दिया है क्योंकि नरेंद्र मोदी की छवि के धूमिल होने की स्थिति में उस छवि के मूल निर्माता को तकलीफ पहुंचना स्वाभाविक है। बहरहाल जो भी हो आप की सफलता और जासूसी की सच्चाई सामने आने से नरेंद्र मोदी को विजेता ब्राण्ड बनाने की उनकी कोशिशों को झटका जरूर लगेगा।

शेष नारायण सिंह, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं।