श्रमिक आदिवासी संगठन
‘हरियाली अभियान’ में आप भी सहभाग दें!
देश और दुनिया में पर्यावरण, सूखे और बेरोजगारी को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। गाहे-बगाहे, इसकी भयावयता की हल्की झलक हमें मीडिया की खबरों में देखेने को मिलती रहती है; लेकिन, यह सवाल अक्सर अनुत्तरित रह जाता है - इस समस्या का हल क्या है? अगर, हम पर्यावरण के मुद्दे को व्यवसायिक वनीकरण से; पानी की समस्या को बाँध, नदी-जोड़ परियोजना से; और बेरोजगारी की समस्या को तथाकथित औधोगिक विकास से निपटाने के प्रयास से यह समस्या आज-तक तो बढी ही है!
इस समस्या के स्थाई हल के लिए सरकार प्रयास करेगी? इस बारे में, अभी तो शंका है! क्योंकि: एक तो, अक्सर सरकारी प्रयास तात्कालीन होते है - जो मुनाफे कमाने वाली कॉर्पोरेट ताकतों से प्रभावित होते है ; और दूसरा - वो अक्सर भ्रष्टाचार का एक नया जरिया भर बनकर रह जाते है। वैसे भी, सूखे पर सुप्रीम कोर्ट के सामने केंद्र और राज्य सरकारों ने जिस तरह से अपनी असमर्थता जाहिर की है, उससे यह साफ़ है - यह सरकार के बस और रुचि का काम नहीं है। तथा, वैकल्पिक वनीकरण के लिए जो कैम्पा फंड के 35 हजार 853 करोड़ रुपए केंद्र सरकार के पास है; उसमें से मात्र 6% का ही उपयोग इस काम के लिए हो पाया है – याने, 2357 करोड़ रुपए।
इसलिए, जब यह समस्या जनता की है, तो इसके सार्थक प्रयास भी जनता को ही करना होंगे। इस समस्या के दीर्घकालीन हल की दिशा में, बैतूल और हरदा जिले के आदिवासीयों ने एक अनूठी पहल की - उन्होंने, आज से आठ साल पहले ‘हरियाली अभियान’ की शुरुवात की; उसके तहत, फलदार पौधों से जमीन को हराभरा कर भोजन, पानी और पर्यावरण की समस्या के हल के लिए अभियान शुरू किया।

इसमें आप भी अपना सहभाग दे - इसलिए इस पत्र को पूरा पढ़े।
1970 के दशक में अमेरिका के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री , शू-माकर, ने अपनी किताब ‘स्माल इज़ ब्यूटीफुल’ में इस बात को रेखांकित करते हुए कहा था: अगर भारत देश के हर गाँव में, हर व्यक्ति पांच पेड़ लगाए, तो बिना किसी विदेशी कर्जे और आर्थिक मदद के इस देश की बेरोजगारी की समस्या का स्थाई हल निकाला जा सकता है।
इस अभियान में हमारा नारा है-

‘हरियाली खुशहाली लाएंगे – पर्यावरण बचाएंगे – भुखमरी भगाएंगे’।
क्योंकि, फलदार पौधे ना सिर्फ जैव-विविधता जंगल को लौटाएंगे , बल्कि इसके बढ़ने पर यह अपनी जड़ों से मिट्टी का कटाव रोकेंगे और जड़ों में प्राकृतिक तरीके से पानी संचित करके रखेंगे। इसके फल ना सिर्फ आदिवासियों को भोजन के रूप में पोषण लौटाएंगे, बल्कि इसकी बिक्री से उन्हें आमदनी भी होगी। आप कल्पना कीजिए! अगर, पहले की तरह देश के हर गाँव में हजारों फलदार पोधों का बगीचा हो? जिस पर मेहनतकश लोगों का हक़ हो। तो, उससे रोजगार, सूखे और पर्यावरण भी स्थाई निज़ात मिलगी या नहीं? जाएगी। इस अभियान को, हम अभी तक बैतूल जिले में जोर-शोर से और कुछ रूप में हरदा जिले में चलाते है। इस वर्ष खंडवा जिले के खालवा ब्लाक को भी इस अभियान से जोड़ेंगे – यहाँ, हर साल कुपोषण से अनेक कोरकू आदिवासी बच्चों की मौत होती है।
‘हरियाली अभियान’ के तहत, हम हर साल जुलाई माह में पढने वाले आदिवासीयों के ‘हरी-जिरोती’ के त्यौहार पर क पखवाड़े की हरियाली यात्रा पूरे ईलाके में रखते है। जिसके दौरान, बड़ी संख्यां में आदिवासी इस ईलाके के साप्ताहिक हाट-बाज़ारों में ढोल-ढमाकों के साथ फलदार पोधों की कावंड-यात्रा निकलकर, लोगों को फलदार पौधे लगाने का सन्देश देते है। इसके आलावा, गाँव में पड़ती पडी जंगल आदि जमीन, खेत, बाड़ी में बड़ी संख्या में फलदार पौधों को लगाया जाता है। इस हेतु पौधे तैयार करने के लिए, बैतूल जिले के तीन गाँव - मरकाढाना, बोड़ और पीप्ल्बर्रा में आदिवासीयों ने अपनी मेहनत और चंदे से अपनी नर्सरी भी बनाई है। हर नर्सरी में पिछले कई सालों से 2 से 5 हजार पौधे हर साल तैयार किए जाते है। लेकिन: एक तो, इसके अलावा अन्य गाँवों में भी पौधों के लिए हमें मदद की जरुरत है; दूसरा, बोड और पीप्ल्बर्रा गाँव की नर्सरी को वन-विभाग पहले 19 दिसम्बर 2015 को नष्ट कर दिया, जब लोगों ने उसे दुबारा खड़ा किया, तो फिर वन विभाग के रेंजर ने 3 मई 2016 को इसमें आग लगा दी। इसके अलावा, इस अभियान के प्रचार-प्रसार में भी मदद की दरकार है।
वन विभाग की मान्यता है: वन क्षेत्र में, उसके आलावा कोई और पौधे लगाने का काम नहीं कर सकता – और फलदार पौधे लगाना तो ‘बागवानी’ के तहत आता है, जो वन जमीन पर प्रतिबंधित है । जबकि, केंद्र सरकार व्दारा वर्ष 2006 में पारित विशेष कानून: अनूसूचित जनजाति एवं परम्परगत वन निवासी (वन अधिकार) कानून, 2006, के तहत ग्रामसभा की सीमा के जंगल की जैव-विविधता को सभालने और सवारने का अधिकार और जवाबदारी गाँव के लोगों की है। दूसरा, सरकार के पास महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना में 40 हजार करोड़ का बज़ट है, और कैम्पा फंड के तहत वनीकरण के लिए 35हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि है इसका उपयोग ग्राम के संसाधन विकास में होना है। अगर, इस क़ानून और सरकार के पास मौजूद राशी का उपयोग कर सरकार भी इस हरियाली अभियान में जुड़े, तो इस देश की तस्वीर बदल सकती है।

हमें ‘हरियाली अभियान’ में आपकी मदद की दरकार है:
१. यह मदद आर्थिक हो सकती है – इस आर्थिक सहयोग से हम नर्सरियों से फलदार पौधों को खरीदकर जो गाँव इस अभियान में रुची ले रहे उनके बीच बांटेंगे – एक पौधे की कीमत और परिवहन की राशी 15 रुपए के आसपास आएगी। आप अपने लोगों की याद में, या जन्मदिन आदि में खर्च होने वाली राशी इसमें लगा सकते है। किसी भी सरकारी योजना में एक पौधे की देखभाल में हजारों का खर्चा आता है। मगर यहाँ, एक बार पोधा मिलने पर लोग अपने श्रम से उसकी मुफ्त देखभाल करेंगे। उस पेड़ का फल जरुर उन्हें मिलेगा, लेकिन उसके पर्यावरण का लाभ सारी मानव जाति को मिलेगा।
२. इसके अलावा, आप हमें बीज और नर्सरी हेतु पलास्टिक की थैलियाँ भी दे सकते है।
३. आदिवासीयों के इस अभियान को सरकार समझे और इसमें सकारत्मक भूमिका निभाए, इस हेतु आप सरकार से अपील कर सकते है, इस बारे में मुख्य-धारा और सोशल मीडिया में लिख सकते है।
४. यहाँ आकर इस अभियान में अपना श्रमदान दे सकते है।
आपके सहयोग की प्रतीक्षा में
बसंत टेकाम, सदाराम मांडले, सुरेश, रामदीन, शमीम मोदी आलोक सागर
राजेंद्र गढ़वाल 9424471101, बबलू नलगे , 9424435513 ,अनुराग मोदी 942504162
email: [email protected], [email protected]