बलात्कार कांड की वजह से मृतात्माओं के महानगर, जहां आधा महानगर समाधियों, मकबरों और तन्हा-तन्हा आलीशान महलों का है, राजधानी नई दिल्ली में नये साल का जश्न फिर सोलह दिसंबर बतर्ज मनाया जा रहा है।
हमने कल ही बंगाल भर में स्त्री उत्पीड़न की घटनाओं को ब्लागों में डाला और आज फिर वहीं खेल दिल्ली में खुल्लमखुल्ला।
राजधानियों में तो बलात्कार सत्ता का महोत्सव है और राजधानियों से बहुत दूर यह रोजमर्रे की हकीकत है।
अगर स्त्री उत्पीड़न की सारी वारदातें दर्ज हों तो देश भर के सारे अखबारों के पन्ने कम पड़ जायेंगे। सारे अखबारों में तब रवींद्र सरोवर नजर आयेगा।
रोज पूर्वोत्तर के बच्चों के बच्चों पर हमले होते हैं तो रोज बलात्कार भी होते हैं और रोज-रोज मोमबत्ती जुलूस भी निकलते हैं और जंतर मंतर में किसी न किसी का धरना प्रदर्शन होता है। जनपथ से लेकर संसद और संसद से लाइव टीवी परदे पर रात दिन चौबीसों घंटे सातों दिन विचित्र किस्म के नुक्कड़ नाटक होते हैं।
सत्ता विमर्श में तस्वीर का यह दूसरा रुख है जो बेपर्दा होता नहीं है।
दरअसल हम इस नस्ली पुरुषतांत्रिक समाज में स्त्री देह के आखेट को ही सफलता का चरमोत्कर्ष मानते हैं और रूपहले माध्यमों का कथासार भी यही है, जहां जिंदगी की आहटें बमश्किल दर्ज हो पाती हैं।
समूचा साहित्य अब अनंत देहगाथा है। सारी विधायें अब नंगी स्त्रीदेह है। कला का चरमोत्कर्ष भी फिर वही वस्त्रहरण।
स्त्रीविरुद्धे भोग की अनंत रात है, जिसी तपिश से हम जी रहे हैं और मर भी रहे हैं, जो दरअसल घर-घर की कहानी भी है।
क्योंकि सेक्सस्लेव औरतें ही सती सावित्रियां हैं और इसी सतीत्व प्रतिमान के तहत स्त्री का अस्तित्व ही पल छिन पल छिन दांव पर लगा है। इसीलिए जिंदगी उसके लिए पल-पल मरण है।
पुरुषतांत्रिक समाज, नस्लभेदी, रंगभेदी, जातिवादी समाज व्यवस्था में स्त्री को अपनी देह से मुक्ति तो मिलेगी नहीं, उसको अपनी देह बेचने की आजादी जरूर मिल सकती है और यह मर्दों के भोग के खातिर मुक्तबाजारी उत्तरआधुनिक विमर्श और सौंदर्यबोध दोनों हैं।
साहेब कयामत का मंजर यही है।
जब तक न जागे खेत खलिहान, जब तक न जागे देश के नौजवान और जब तक इस पुरुषतांत्रिक मनुस्मृति के खिलाफ सेक्स दासी बना दी गयीं औरतें चहारदीवारियां लांघ कर मर्द सांढ़ संस्कृति के खिलाफ चित्रांगदा बनकर तमाम धनुर्धरों के खिलाफ हानीमून के लिए नहीं, बल्कि इस राज्यतंत्र को बदलने के लिए युद्ध शुरु नहीं करतीं तब तक हालात वहीं रहेंगे कि कातिल बदल जाते हैं, खंजर बदल जाते हैं, हालात बदलते नहीं हैं।
O- पलाश विश्वास