1947 - स्वतंत्रता की असलियत भाग-2
1947 - स्वतंत्रता की असलियत भाग-2

1947 - स्वतंत्रता की असलियत भाग-2
राष्ट्र की औपनिवेशिक गुलामी से स्वतंत्रता का बुनियादी सवाल वस्तुत: औपनिवेशिक सम्बन्धों से मुक्ति का सवाल है। बड़ी विडम्बना है कि इन सम्बन्धों को खासकर आर्थिक राजनीतिक सम्बन्धों को प्रमुखता देकर उससे देश की स्वतंत्रता का प्रश्न पहले भी बहुत कम उठा था। इसे क्रान्तिकारियों ने खासकर भगत सिंह जैसे क्रान्तिकारियों ने इस रूप में जरूर उठाया था कि कांग्रेस का उद्देश्य देश को औपनिवेशिक सम्बन्धों से मुक्त कराना नहीं बल्कि डोमिनियन राष्ट्र का दर्जा लेकर ब्रिटिश हुक्मरानों से समझौता कर जाना है।
यही हुआ भी। लेकिन उनकी आवाज बाद के दौर में खासकर 1935 के संवैधानिक सुधारों के जरिये 1937 में कांग्रेस व मुस्लिम लीग द्वारा प्रांतीय सरकारों की बागडोर सम्भालने के बाद समझौतावादी एवं सत्तावादी प्रचारों एवं प्रयासों द्वारा, कारगुजारियो द्वारा दबा दिया गया। फिर बाद के दौर में खासकर 1947 के बाद के दौर में तो इसे और कम महत्व दिया गया या कहिये उपेक्षित ही कर दिया गया। राज प्राप्ति को ही स्वतंत्रता प्राप्ति का पर्याय बना दिया गया। जबकि इस बात में कही से कोई संदेह न तो था और न ही है कि ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपने आर्थिक लाभ के लिए ही अर्थात् इस देश की श्रम सम्पदा की लूट के लिए ही कम्पनी राज या ब्रिटिश राज की स्थापना की थी। देश को ब्रिटिश राज का गुलाम बना दिया था।
स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान इस आर्थिक लूट–पाट और उसके लिए कम्पनी द्वारा बनाये गये आर्थिक सम्बन्धों पर चर्चा तो होती रही, पर वह चर्चा आवश्यकता से बहुत कम हुई।
खासकर 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता दादा भाई नौरोजी ने तो देश से धन की निकासी को लेकर महत्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी। लेकिन, जैसे–जैसे भारतीय उद्योगपति का ब्रिटिश कम्पनियों के साथ ब्रिटिश पूंजी व तकनीक के साथ समझौते बढ़ते रहे और जैसे–जैसे कांग्रेस ( मुस्लिम लीग आदि ) को देश की शासन सत्ता पर चढ़ने के अधिकारों में वृद्धि होती रही, वैसे–वैसे इन सम्बन्धों पर अर्थात् विदेश द्वारा देश की औपनिवेशिक लूट के आर्थिक सम्बन्धों पर चर्चा कमजोर पड़ती गयी।
क्योंकि 1858 के बाद से खासकर 1900 के बाद से ही देश के धनाढ्य वर्गों का एवं उच्च पढ़े – लिखे तबकों के एक हिस्से को ब्रिटिश राज द्वारा धन – पूंजी तथा शासन – प्रशासन की उंचाइयो पर चढ़ने – बढ़ने के अवसरों को बढ़ाया जाता रहा। नि:संदेह इन अवसरों को बढ़ाने में राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए किये जाते रहे क्रांतिकारी एवं सुधारवादी संघर्षों आंदोलनों की भारी भूमिका भी जरूरी थी। उन आंदोलनों संघर्षो के फलस्वरूप देश के धनाढ्य हिस्सों को ब्रिटिश शोषण तथा अंग्रेजों द्वारा हिन्दुस्तानियों के प्रति गैर-बराबरी व भेदभाव के व्यवहार से किसी हद तक मुक्ति भी मिलने लगी थी। उनके लिए अब देश के संसाधनों पर तथा सत्ता संचालन से लेकर अन्य संस्थाओं पर चढ़ते रहना ही देश की स्वतंत्रता का प्रमुख सवाल बन गया था। इसीलिए उन्होंने देश के नीचे के व्यापक शोषित–शासित आबादी को लूट व प्रभुत्व के सम्बन्धों से ब्रिटिश साम्राज्य के आर्थिक कूटनीतिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक सम्बन्धों से मुक्ति के सवाल को राष्ट्र की आजादी का प्रमुख सवाल नहीं बनाया।
1947 में राजनीतिक सत्ता प्राप्ति को पूर्ण स्वतंत्रता कहकर औपनिवेशिक लूट के बने व बचे रह गये सम्बन्धों पर पर्दा डाल दिया गया।
इस मुद्दे पर उस दौर के इतिहासकारों, राजनीतिज्ञों एवं अन्य विद्वान बुद्धिजीवियों में वस्तुत: कोई बुनियादी अंतर नहीं है। इसका सबसे बड़ा सबूत तो यही है कि इन सभी हिस्सों ने 1947 की स्वतंत्रता को ही पूर्ण स्वतंत्रता मानने व बताने का काम किया हुआ है। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के सवाल को औपनिवेशिक दासता के आर्थिक, कूटनीतिक शैक्षणिक, सांस्कृतिक सम्बन्धों से मुक्ति के रूप में कोई महत्व नहीं दिया है।
उस समय की कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों द्वारा आजादी को नकली आजादी बताने का सवाल भी खुद कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आगे नहीं बढ़ाया गया। और बाद में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भी देश को विदेशी दासता से ( यानी दासता के सभी सम्बन्धों से ) से आजाद घोषित कर दिया गया। इसके अलावा जो वामपंथी संगठन 1947 की स्वतंत्रता को राष्ट्र की आधी – अधूरी या साम्राज्यवाद के साथ सहयोग व सगठन बढ़ाने वाली धनाढ्य वर्गीय स्वतंत्रता मानते हुए उनका विरोध करते रहे थे, उन्होंने भी इसे प्रमुखता देकर चर्चा का विषय नहीं बनाया।
1947 में बने रह गये तथा 1980 के बाद से खुले रूप में बढ़ाये जा रहे साम्राज्यी शोषण लूट एवं प्रभुत्व के सम्बन्धों से राष्ट्रमुक्ति के सवाल को अपना कार्यभार नहीं बनाया। लेकिन किसी की उपेक्षा या उदासीनता से सच्चाई छिपने वाली नहीं है। राष्ट्र के परनिर्भरता एवं लूट- पाट के सम्बन्ध छिपने वाले नहीं है। उसका परिलक्षण विदेशी साम्राज्यी पूंजी द्वारा विदेशी कम्पनियों द्वारा देश की श्रम सम्पदा के बढ़ते लूट के रूप में सामने आता भी जा रहा है। देश की धनाढ्य कम्पनियों एवं सरकारों द्वारा इसे चौतरफा बढ़ावा देने की भूमिकाएं भी सामने आती जा रही हैं।
अत: अब राष्ट्र की परनिर्भरता के साथ बढ़ते परतंत्रता के आर्थिक राजनीतिक सम्बन्धों से मुक्त कराने का दायित्व देश के जनसाधारण का ही बनता है।
अब देश के मजदूरों किसानों एवं अन्य मेहनतकश हिस्सों पर न केवल शोषण – उत्पीड़न के सम्बन्धों से स्वयं मुक्त कराने का दायित्व है, अपितु समूचे राष्ट्र को साम्राज्यी परतंत्रता के इन सम्बन्धों से मुक्त कराने का दायित्व भी है। सही बात तो यह है कि वह राष्ट्र को साम्राज्यी लूट और प्रभुत्व के सम्बन्धो से मुक्त कराए बिना देश का जनसाधारण अपने आपको शोषण उत्पीड़न के सम्बन्धों से मुक्त नहीं करा सकता। इसलिए 1947 की स्वतंत्रता पर चर्चा करना उसकी जांच पड़ताल करना देश के जनसाधारण के लिए आवश्यक है।
सुनील दत्ता
1947 - स्वतंत्रता की असलियत भाग-1


