24 घंटे में फिर पंद्रह नवजात शिशुओं ने दम तोड़ा
24 घंटे में फिर पंद्रह नवजात शिशुओं ने दम तोड़ा
शिशुओं ने दम तोड़ा - भारत में परिवार नियोजन हो जाने के बावजूद शिशुओं की मृत्यु हमें बेचैन नहीं करती।
कोलकाता। सुबह ही बांग्लादेश विजय के कार्निवाल के मध्य बहुत बुरी खबर कोलकाता के विधान चंद्र राय शिशु अस्पताल से मिली, जहां 24 घंटे में फिर पंद्रह नवजात शिशुओं ने दम तोड़ा है।
कोलकाता और मालदह के अस्पतालों में थोक शिशु मृत्यु की फिर भी खबरें बनती रहती हैं। बाकी बंगाल और बाकी देश में प्रसूतियों और नवजात शिशुओं की मृत्यु के आंकड़ें नहीं मिलते।
बंगाल के जो हाल हैं, उससे कपड़ा और जूट मिलों, चाय बागानों, तमाम बंद कल कारखानों के बाद अब बहुत जल्द खेतों खलिहानों और इस आसमुद्र हिमालय पर्यंत सीमेंट के जंगल से भी मृत्यु जुलस का अनंत सिलिसिला निकलेगा।
भारत में पुरुष वर्चस्व का करिश्मा है कि स्त्री की मृत्यु पर शोक नहीं मनाया जाता।
रस्म अदायगी के फौरन बाद स्त्री का सुलभ विकल्प नयी युवा स्त्री उपलब्ध है, तो शोक काहे का।
भारत में परिवार नियोजन हो जाने के बावजूद शिशुओं की मृत्यु हमें बेचैन नहीं करती।
अस्पतालों से स्त्रियों और शिशुओं के निकलते रोज रोज के मृत्यु जुलूस के प्रति हम उतने ही तटस्थ हैं, जितने आजादी के बाद से रोजाना अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों से, सलवा जुड़ूम से, आफसा से, सिखों के नरसंहार से, भोपाल गैस त्रासदी से, बाबरी विध्वंस और देश के कोने कोने में भड़काये जाने वाले दंगों से, गुजरात नरसंहार से, आदिवासियों की बेदखली से, दलितों पर निरंतर जारी अत्याचारों से, गैरनस्ली लोगों और अस्पृश्य भूगोल और अस्पृश्य समुदायों से निरंतर जारी रंगभेदी भेदभाव और अर्थव्यवस्था से उनके सामूहिक निष्कासन से लेकर किसानों की थोक आत्महत्या से हम बेखबर हैं। बेपरवाह हैं।
दरअसल भारत की गौरवशाली सनातन सभ्यता के मिथ्या मिथकों के जरिये हम अत्याधुनिक ज्ञान, तकनीक, वैज्ञानिक आविष्कारों, सूचना प्राद्योगिकी बूम बूम के सीमेंट जंगलों में निहायत असामाजिक बर्बर पाशविक मर्दवादी आदिम युग का अंधकार जी रहे हैं चकाचौंध रोशनियों के महोत्सव में।
पलाश विश्वास


