एस. एम. जोशी जी की पुण्यतिथि पर विशेष: जानिए समाजवादी नेता श्रीधर माधव जोशी के जीवन, राष्ट्र सेवा दल के संघर्ष, जाति-धर्मनिरपेक्ष भारत के सपने और महाराष्ट्र की सामाजिक क्रांति में एस. एम. जोशी के योगदान के बारे में। डॉ. सुरेश खैरनार के संस्मरण।
समाजवादी नेता श्रीधर माधव जोशी एस. एम. जोशी (12 नवंबर 1904 - 1 अप्रैल 1989) जी का जन्म 12 नवम्बर 1904 को पुणे जिले के जुन्नर नाम के तालुके में हुआ, जहां उनके पिताजी नौकरी में थे. उनका मूल परिवार कोंकण के गोलप नाम के जगह से अन्य कोंकण के लोगों जैसे ( क्योंकि आँखो से कोंकण का सौदर्य कितना भी सुंदर दिखता हो, लेकिन किसी भी इन्सान के जीने के लिए कोंकण की जमीन और प्रकृति पर्याप्त नहीं है, इसलिए सैकड़ों सालों से पेशवाओं से लेकर लोकमान्य तिलक और एस. एम- नानासाहब गोरे, साने गुरूजी तक पैदा कोंकण में हुए. लेकिन अपने और अपने परिवार के निर्वाह के लिए बहुत बडी संख्या मुंबई-पुणे और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में विस्थापित होने के कारण एस. एम. जोशी जी के परिवार को भी कोंकण छोड़कर पुणे जिले के जुन्नर नाम की छोटी जगह पर आना पड़ा था. )
परिवार के भरण-पोषण के लिए पचहत्तर प्रतिशत कोंकण के लोगों को मुख्यतः मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों
एस. एम. का जन्म हुआ तब भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के सबसे बड़े नेता लोकमान्य तिलक पुणे में ही रहते थे.
और किसी भी अन्य संवेदनशील बच्चों के जैसे एस. एम. भी तिलक भक्तों में शामिल थे. यहां तक कि मैंने पुणे में जितने भी समाजवादी नेताओं के घर देखे हैं, सब के घर के प्रथम कमरे की दीवार पर सिर्फ लोकमान्य तिलक की फोटो देखकर आश्चर्य होता है. कि उसी समय उसी पुणे में महात्मा ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी क्रांतिज्योति सावित्रीबाई जात जैसी हजारों सालों से चली आ रही कुरीतियों के खिलाफ और उसमें से विधवाओं की समस्या जो कि मुख्य रूप से ब्राह्मण समाज की महिलाओं की थी जिसके खिलाफ खुद पुणे के ब्राह्मण समाज के कोपभाजन का शिकार ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी क्रांति ज्योति सावित्रीबाई को होना पड़ा है.
ठीक है कि एस. एम. जोशी जी का जन्म ज्योतिबा फुले की मृत्यु के सोलह साल बाद का है. और सावित्रीबाई की मृत्यु के सात साल के बाद. हालांकि एस. एम. को होश आया तभी से ही वह जाति धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना देखने वालों में से एक थे. यहाँ तक कि शादी के बाद अपने खुद के दो बेटे अजय और अभय के अलावा हमेशा अपने घर में एक दलित लड़का पढ़ने के लिए घर के सदस्य जैसा ही रखा.
और इस बात का उच्चारण कभी भी सार्वजनिक जीवन में नहीं किया, जब वह पुणे मयुनिस्पल इलेक्शन से लेकर विधानसभा-लोकसभा चुनाव में भी अपने प्रचार में कभी नहीं भुनाया.
एस. एम. जोशी जी सार्वजानिक जीवन के संत प्रकृति के माने जाते हैं. मेरी किस्मत अच्छी थी कि मुझे उनके जीवन के उत्तरार्ध में बहुत ही नजदीकी से संबंधित होने का मौका मिला है. यहाँ तक कि जब वह महाराष्ट्र जनता पार्टी के अध्यक्ष थे 1977 में, तब वह अपनी पार्टी की कई अंदरूनी बातें मुझसे शेयर करते थे. यहां तक कि मैंने जनता पार्टी की सदस्यता नहीं ली है, लेकिन मैं महाराष्ट्र की जनता पार्टी का अध्यक्ष हूँ.
लेकिन पेशवाई के बाद जाति के प्रश्न को लेकर भारत के इतिहास में शायद प्रथम बार एक आंदोलन की शक्ल देने का ऐतिहासिक काम संपूर्ण उन्नीस्वीं शताब्दी फुले पति-पत्नी के अथक प्रयास की महाराष्ट्र के पुरोगामी ब्राह्मणों ने भी दखल नहीं ली है. और सबसे ज्यादा लोकमान्य तिलक ने उनके दो अखबार मराठी केसरी और अंग्रेजी मराठा उन दोनों अखबारों में ज्योतिबा फुले के काम के बारे में खबर तो बहुत ही दूर की बात थी. उल्टा पैसे देकर ज्योतिबा फुले के पत्रिका का विज्ञापन तक नहीं छपा. उसके उदाहरण के लिए उनके किसी के भी घर की दीवार पर सिर्फ लोकमान्य तिलक की फोटो क्यों थी ? क्योंकि मीडिया का परिणाम जिस तरह आज है. आज से दो सौ साल पहले भी यही नजारा था.
यह सवाल मेरे सामने जब-जब इन सभी के घरों में जाता था. तो मेरे जेहन में यह सवाल बार-बार आता था. और फुले के अलावा महात्मा गाँधी की भी फोटो मैंने नहीं देखी है. इसमें मुझे एस. एम. जोशी जी या किसी भी परिवर्तनवादी लोगों की आलोचना या अपमान करने का इरादा नहीं है. क्योंकि हमारे सभी के जन्म सवर्ण समाज से होने के कारण डॉ. बाबा साहब अंबेडकर या ज्योंतिबा फुले के अलावा महात्मा गाँधी जो दक्षिण अफ्रीका के वर्ण व्यवस्था का अनुभव भुगत चुके थे. इसलिये उन्होंने ही नागपुर कांग्रेस के 1920 के अधिवेशन में संपूर्ण अस्पृश्यता विरोधी प्रस्ताव पारित किया है. जब एस. एम. जोशी जी की उम्र सिर्फ सोलह साल की थी. इसलिए कालसापेक्षता का सिद्धांत बहुत मायने रखता है. और गाँधी से लेकर किसी भी नेता की आलोचना करने वाले लोग यह भूल जाते हैं या जान बूझ कर अनजान बनते हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना,महाराष्ट्र में हिंदू महासभा की स्थापना और शिवसेना, सनातन संस्था की भी स्थापना के जवाब मेरे इसी सवाल मे मिल जाते हैं. एक तरह से हिंदू उच्च जाति का वर्चस्व भारत की सभी प्रमुख पार्टियों के शुरू के नेतृत्व को देखने से भी पता चलता है. कि कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट और गाँधी के आगमन के पहले की कांग्रेस यानी स्थापना के तीस साल संपूर्ण कांग्रेस बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक सवर्ण जातियों के नेता बाल-लाल-पाल यह मुहावरा से ही पता चलता है कि लोकमान्य तिलक की मृत्यु तक (1अगस्त 1920) कांग्रेसी नेताओं में सभी उच्च जाति का वर्चस्व था.
वह तो महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से 1915 में लौटने के बाद, और तिलक की मृत्यु के बाद (1 अगस्त 1920) सही मायने में बहुजन समाज के लोगों का समावेश होना शुरू होने के बावजूद समाजवादी नेता अपने दीवार पर लगे फोटो नहीं बदले हैं. यह बात मैं भूलने से भी भूल नहीं सकता.
हालांकि एस. एम जोशी जी का जीवन का बहुत कीमती समय जाति धर्मनिरपेक्ष भारत का सपना पूरा करने के लिए गया है. इसमें कोई दो राय नहीं है. और राष्ट्र सेवा दल के स्थापना का उद्देश्य और सेवा दल के इतिहास को देखा जाये तो आंतर-जातीय शादियों से लेकर एक गांव एक कुआँ का आंदोलन, औरंगाबाद विश्वविद्यालय के नामांतर आंदोलन से लेकर महाराष्ट्र के कई-कई सामाजिक बदलाव के कार्यक्रम राष्ट्र सेवा दल के इतिहास को देखा जाये तो पता चलेगा मुख्य रूप से एस. एम. जोशी जी की आत्मकथा मी एस. एम. के 145 वें पन्ने से लेकर 166 सिर्फ इक्कीस पन्ने जिसका टाइटल ही राष्ट्र सेवा दल है. एक तरह से राष्ट्र सेवा दल के इतिहास को लेकर राष्ट्र सेवा दल के मूल्य और संविधान इन सब बातो को इक्कीस पन्नों में मौजूद है
और सबसे बड़ी ऐतिहासिक विरासत हामिद दलवाई जैसे मुस्लिम सत्यशोधक समाज की स्थापना करने वाले एक सेक्युलर मुसलमान को सत्तर के दशक में तलाक-पीड़ित औरतों का मोर्चा महाराष्ट्र के विधानसभा पर 1966 और उसके साथ-साथ इंडियन सेक्युलर सोसायटी की स्थापना यह महात्मा ज्योतिबा फुले के बाद भारत के सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में हिंदू-मुस्लिम सवाल को लेकर काम शुरू करने के लिए एस. एम. जोशी जी ने अपने पार्टी के और उसके पहले राष्ट्र सेवा दल के कार्यकर्ता हमिद दलवाई जैसे मुस्लिम का निर्माण होना भी संपूर्ण इस्लाम के पंद्रह सौ साल के इतिहास में, तुर्कस्तान के बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दौर के कमाल अतातुर्क पाशा के बाद, भारतीय उपमहाद्वीप में सिर्फ हमीद दलवाई जैसे मुस्लिम का निर्माण में एस. एम. जोशी जी का बहुत ही बडा योगदान है.
हालाँकि संसदीय राजनीति के दौरान इस तरह के साहसी और समाज सुधार के कामों के लिए आज बहुत ही कम जगह बची है, क्योंकि राष्ट्र सेवा दल के अध्यक्ष बनने के बाद मुस्लिम सत्यशोधक समाज के वर्तमान पदाधिकारियों की काफी पुरानी मांग थी कि राष्ट्र सेवा दल के मध्यवर्ती कार्यालय के परिसर में मुस्लिम सत्यशोधक समाज के लिए ऑफिस के लिए एक कमरा दिया जाए, और वह निर्णय मैंने अध्यक्ष होने के तुरंत लिया था, और सेवा दल के संविधान में किसी भी दल के सदस्य किसी राजनीतिक दलों के साथ सेवा दल के सदस्य नहीं बन सकता है. यह नियम होने के बावजूद कुछ लोगों ने इस नियम का पालन नहीं करने के कारण काफी लोग विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ सेवा दल के भी सदस्य है. और उनमें से कुछ लोगों ने बहुत ही महत्वपूर्ण संविधानिक पदों को हथियाने में कामयाबी हासिल की है. और वह अपनी राजनीतिक सुविधाओं के लिए मुस्लिम सत्यशोधक समाज का कार्यालय हटाने का काम करने के पीछे पड़े हैं. आज एस. एम. जोशी जी की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि राष्ट्र सेवा दल के संविधान की रक्षा नहीं करते हुए देश के संविधान बचाओ आंदोलन बेमानी है. पहले अपने मातृ संगठन के संविधान का पालन कीजिए फिर देश के संविधान बचाने की बात कीजिये.
संगटन के इतिहास में राष्ट्र सेवा दल को समाजवादी पार्टी के साथ जोड़ा जाय. यह कोशिश किसी समय सेवा दल के पूर्ण समय कार्यकर्ता श्री मधु लिमये ने काफी प्रयास किया लेकिन एस. एम. जोशी जी ने अपने पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए मधु लिमये की सूचना का विरोध करते हुए कहा था कि "राष्ट्र सेवा दल निर्दलीय ही रहेगा और जिन्हें राजनीति में जाने की इच्छा हो, वह पहले राष्ट्र सेवा दल की सदस्यता से इस्तीफा दे और राष्ट्र सेवा दल किसी भी राजनीतिक दल की इकाई नहीं रहेगी".
यह एस. एम जोशी. जी ने आपातकाल में हमारे प्रवास के दौरान भी दोहराया, तो कम-से-कम उनकी पुण्य तिथि पर अगर सचमुच उनके प्रति हमारे किसी भी साथी के मन मे सम्मान है तो अण्णा के प्रति सही श्रद्धांजलि होगी.
मुझे व्यक्तिगत रूप से उनके उम्र के सत्तर साल के पड़ाव यानी आपातकाल में एक साथ रहने घूमने का मौका मिला है. और शायद ही जीवन का कोई विषय होगा जिस पर हमने बात नहीं की होगी. एस. एम. को बातचीत करने की विशेष रूप से खुशी होती थी. और उसमें क्रिकेट से लेकर, संगीत, नाटक, सिनेमा तक के विषय होते थे. मेरे हिस्से में आये तब वह बयालिस के हीरो फिर महाराष्ट्र के शिल्पकार और विधानसभा-लोकसभा और रिजर्व बैंक के बोर्ड मेंबर वगैरा सब अनुभव ले चुके थे. इसलिये मुंबई-दिल्ली के सत्ता के गलियारों से लेकर संसदीय समिति के सदस्यों के नाते सोवियत रूस की यात्रा सत्तर के दशक मेंबीस साल बाद रशियामे 1990 को क्या हुआ ? इसकी कुछ झलक मुझे बताई थी क्योंकि उनके अनुसार कहीं भी अकेले जाने की इजाजत नहीं थी. उनके लोगों द्वारा जितना दिखाया जाता था उतना ही रशिया में देखने को मिला था.
एस. एम. जोशी जी समाजवादी पार्टी के संस्थापक थे. इस कारण वह थे तो सोशलिस्ट लेकिन आचार्य विनोबा भावे के बहुत ही करीबी मित्र थे. आपातकाल में उनके साथ कम से कम चार बार पवनार आश्रम उनके साथ ठहरा हूँ. और विनोबाजी एस. एम. जोशी जी की मुलाकात का साक्षी हूँ बहुत गहरी दोस्ती थी, तो मेरा मानना है कि अगर भारत में सोशलिस्ट पार्टी नहीं बनी होती तो जयप्रकाश नारायण के पहले ही एस. एम. जोशी जी विनोबाजी के कारण जीवन दानी बने होते. और भूदान के काम कर रहे होते.
आपातकाल में विनोबाजी के कहने पर वह एक गाय साथ में लेकर यात्रा निकालने के लिए तैयार हो गये थे. मैंने कहा कि "आप जिस दिन गाय को लेकर निकलोगे उस दिन से मेरा आपके साथ यात्रा करना बंद". मुझे गर्व है कि एस. एम. जोशी जी बोले कि "मेरे लिए तेरे जैसे युवा ( 21-22 सालों की उम्र का था. ) दोस्त को खोने से, मैं बगैर गाय के घूमना पसंद करूँगा".
मेरे जीवन में काफी बड़ी हस्तियों के साथ रहने और मनमुताबिक बातें करने के काफी मौके आए हैं. और बहुत मित्रो का आग्रह चल रहा है कि तुम यह सब अक्षरबद्ध करो। अब लिखने की शुरुआत की है तो शायद वह भी हो जायेगा. यही एक तरह से शुरूआत ही समझिये.
दूसरे व्यक्ति के प्रति आदर या सम्मान एस. एम. जोशी जी को करते हुए देखा। जे कृष्णमूर्ति। हालाँकि मुझे भी जे कृष्णमूर्ति में थोड़ा बहुत इंट्रेस्ट था. लेकिन एस. एम. जोशी जी के अनुभवों के कारण मेरी रूचि और बढ़ती गई, अच्यूतराव पटवर्धन जी के कारण जे. कृष्णमूर्ति के साथ मेरी व्यक्तिगत मुलाकात कलकत्ता में 1982 के उनके भाषण के बाद जहाँ वह ठहरे थे वहां पर हुई है.
एस. एम. जोशी जी के व्यक्तित्व मे डॉग्मा नहीं के बराबर था. और तथाकथित बड़प्पन के शिकार काफी लोग हो जाते हैं. लेकिन एस. एम. जोशी जी के जैसा आजादी के आंदोलन से लेकर महाराष्ट्र निर्माण का संयुक्त महाराष्ट्र और सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष, और मेरे जैसे राष्ट्र सेवा दल के सैनिक के मातृ संगटन के संस्थापक अध्यक्ष. और साने गुरूजी ने जिस तरह राष्ट्र सेवा दल मेरा प्राण वायु है. इसी तरह एस. एम. जोशी जी का भी राष्ट्र सेवा दल के प्रति जुड़ाव साने गुरूजीके जैसा ही था.
आजकल राष्ट्र सेवा दल के इतिहास को लेकर गलत बयानी चल रही है. उन मित्रों को एक ही प्रार्थना है कि “मी एस. एम.” इस “एस. एम. जोशी जी की आत्मकथा” के 145 से लेकर 166 सिर्फ इक्कीस पन्ने जिसका टाइटल ही राष्ट्र सेवा दल है. सिर्फ कल उनकी पुण्य तिथि पर कोई और कर्मकांड करने के बजाय सिर्फ इक्कीस पन्ने पढने का कष्ट करेंगे जो इस विवाद का अंत करने के लिए पर्याप्त है.
अरे भाई संस्थापक अध्यक्ष खुद लिख रहे हैं कांग्रेस की राष्ट्र सेवा दल को हथियाने की कोशिश का हमने कैसा विरोध करते हुए नाकामयाब किया. यहाँ तक कि कांग्रेस ने गाँधी हत्या के बाद संघ के साथ राष्ट्र सेवा दल के ऊपर भी बैन लगा दिया. और संघ से प्रतिबंध तो उठा दिया, लेकिन राष्ट्र सेवा दल के ऊपर से प्रतिबंध नहीं उठाया था.
कोई भी राष्ट्र सेवा दल के सैनिक महात्मा गाँधी की हत्या के कारण राष्ट्र सेवा दल के ऊपर की बंदी नहीं सह सकता है. और उस कांग्रेस के पटेल, एस. के. पाटिल और शंकराव देव और सबसे हैरानगी की बात मोरारजी देसाई इन लोगों के साथ एस. एम. जोशी जी की व्यक्तिगत बातचीत इन इक्कीस पन्नों में मौजूद रहते हुए अगर कोई कांग्रेस सेवा दल के साथ राष्ट्र सेवा दल के एक होने की बात करना राष्ट्र सेवा दल के इतिहास को तोड़ मरोड़कर क्या हासिल करना चाहते हैं ?
सबसे प्रमुख बात एस. एम. जोशी जी के इन इक्कीस पन्नों में राष्ट्र सेवा दल के किसी भी राजनीतिक दलों के साथ संबंध नहीं है. और जिन्हें राजनीति के लिए किसी भी दल में जाना हो वह व्यक्तिगत रूप से जा सकता है. लेकिन राष्ट्र सेवा दल के इस्तीफे के बाद.
और यही बात मैंने 2015 में ट्रस्ट के सदस्य के नाते कही है, जो कि अनदेखी की है. और 2017 से 2019 तक अध्यक्ष पद पर रहते हुए आदरणीय अण्णा उर्फ एस. एम. जोशी जी की बात पर कायम रहने की कोशिश की है. लेकिन राष्ट्र सेवा दल के कुछ सैनिक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं. क्योंकि राष्ट्र सेवा दल के इतिहास को तोड़मरोड़कर क्या हासिल करना यह कोई नई बात नहीं है.
जब जिस नेता को राजनीति में कुछ काम नहीं होता था, वह टाईमपास करने के लिए राष्ट्र सेवा दल के महत्वपूर्ण पदों पर आराम से आकर बैठ जाने के दर्जनों उदाहरण हैं. और सबसे आश्चर्य की बात है कि आज के राष्ट्र सेवा दल के सभी सदस्यों की ईमानदारी से इन्क्वायरी हो तो कितने लोग कौन से दलों से संबंधित है यह सबसे पहले साफ होने की जरूरत है. अन्यथा एस. एम. जोशी जी की पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी तारीफों के कसीदे पढ़ने वाले कम नहीं है. क्योंकि मेरी समझ से महाराष्ट्र में इस तरह के अजातशत्रु नेता और कोई नहीं हुआ होगा जिस पर एस. एम. जोशी जी जैसे प्रेम करने वाले शायद हर क्षेत्र में लोग हैं, जो मैंने अपने आँखों से देखा है, कि किसी भी गाँव में हर पार्टी के कार्यकर्ता एस. एम. जोशी जी के पैर नहीं छुआ होगा.
मैंने अपने जीवन में इतना निष्कंलक, निष्कपट और स्नेह करने वाले नेता को नहीं देखा. हालाँकि साने गुरूजी के बारे मे यह सब विशेषणों से लिखते-बोलते हुए देखा है. लेकिन मैने तो गुरूजी के इस दुनिया को छोड़कर तीन साल बाद इस दुनिया मे कदम रखा है. इसलिए मुझे तो एस. एम. जोशी जी,ग प्र प्रधान और मेरे फ्रेंड-फिलॉसफर और गाइड यदुनाथ थत्तेजी इन महानुभावों को देखने के बाद मुझे लगता था कि गुरूजी कैसे होंगे ?
कल अण्णा उर्फ एस. एम. जोशी जी की पुण्यतिथि के अवसर पर इतना ही.
डॉ. सुरेश खैरनार,
30 मार्च,नागपुर 2025.