कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल: भारतीय वामपंथ क्यों ठहरा और पुनर्निर्माण के सबक क्या हैं
कम्युनिस्ट पार्टी के 100 वर्षों का आत्मालोचन: वर्ग, जाति, जेंडर और संगठनात्मक संकट के बीच भारतीय वामपंथ के पुनर्निर्माण के जरूरी सबक।

Communist Party of India
कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक सफर का 100 वर्ष : भारतीय वामपंथ के पुनर्निर्माण के लिए कुछ बुनियादी सबक
- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 वर्ष: संघर्ष, शहादत और मौजूदा संकट
- वर्ग, जाति और जेंडर: क्या कम्युनिस्ट आंदोलन इन्हें समझने में चूका?
- वर्ग: आर्थिक श्रेणी से राजनीतिक कर्ता बनने की अधूरी प्रक्रिया
- अम्बेडकर, लोहिया और मार्क्सवादी परंपरा में सामाजिक विभेद की समझ
- पार्टी बनाम वर्ग: संगठनात्मक ढांचे की ऐतिहासिक विफलता
हिंदुत्व और नवउदारवाद से वाम की तुलना: राजनीतिक कर्ता कैसे गढ़े गए
1920 के दशक में बनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने राजनीतिक जीवन का 100 वर्ष पूरा कर लिया है। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का इतिहास लंबा और जटिल है, उस पर टिप्पणी करना हमारा यहां मकसद नहीं है। आज के दौर के कम्युनिस्ट आंदोलन के अंतर्विरोधों को समझने की यह कोशिश है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कम्युनिस्ट पार्टी अपने जन्मकाल से ही संघर्ष और शहादत की परंपरा को जीवंत बनाए हुई है। फिर भी आज के दौर में इसके प्रभाव का क्षरण दिखता है।
यह बात आम प्रचलन में है कि कम्युनिस्ट पार्टी वर्ग, जाति, जेंडर और नए दौर की पीढ़ी को समझ नहीं पाई है। लेकिन मेरी समझ में कम्युनिस्ट आंदोलन के ठहराव को समझने के लिए अन्य कारणों में यह भी एक कारण हो सकता है। लेकिन यह मुख्य कारण नहीं है। मार्क्सवादी परंपरा में जाति, जेंडर, संस्कृति और विचारधारा पर पर्याप्त काम हुआ है। कम्युनिस्ट साहित्य में वर्ग और जाति को अलग-अलग नहीं बल्कि उसे निर्मित और बदलती हुई सामाजिक प्रक्रिया में देखा गया है। कम्युनिस्ट साहित्य, पार्टी कार्यक्रमों और संगठनात्मक दस्तावेजों में बार-बार यह स्वीकार किया गया है कि वर्ग राजनीति को जाति, जेंडर, संस्कृति और पीढ़ीगत प्रश्नों से जूझना चाहिए।
वर्ग एक साथ आर्थिक और सामाजिक श्रेणी के बतौर दिखता है। आर्थिक श्रेणी में वर्ग मजदूर, किसान, निम्न मध्यम वर्ग, अभिजात वर्ग और पूंजीपति के रूप में है। जबकि सामाजिक क्षेत्र में वर्ग दलित, पिछड़े, महिला और अन्य उत्पीड़ित जाति और समुदाय के रूप में दिखता है। एक स्तर पर वर्ग एक पूर्ण इकाई के रूप में दिखता है और दूसरे स्तर पर अविभाजित सामाजिक समूह के रूप में। डॉ अम्बेडकर और लोहिया ने भी वर्ग, जाति, जेंडर को एक दूसरे के बाहर नहीं बल्कि समाज के विभेदों में देखा है।
यहां वर्ग को समझने और राजनीतिक कर्ता बनने में आ रही दिक्कतों पर चर्चा करना जरूरी है। मार्क्सवादी सिद्धांत में वर्ग दो स्तरों पर अस्तित्व रखता है। एक उत्पादन संबंधों में उसकी वस्तुगत स्थिति दूसरा एक राजनीतिक कर्ता के बतौर उसकी क्षमता। इन दोनों के बीच में रूपांतरण स्वतः नहीं हो जाता। वह बनता है पार्टी आंदोलन, संगठन और वैचारिक अभ्यास के माध्यम से।
भारत में वर्ग वस्तुगत रूप में मौजूद हैं, लेकिन अपने लिए वर्ग के रूप में रूपांतरित नही हो पाएं हैं। जातिगत पदानुक्रम, लैंगिक उत्पीड़न, पीढ़ीगत विभाजन और सांस्कृतिक पहचान यह सभी वर्ग के अनुभव को आकार देते हैं।
पार्टी वर्ग को एक आत्म चेतन राजनीतिक कर्ता की भूमिका में विकसित करने में असफल रही है। उलटे कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्ग की जगह अपने को स्थापित कर दिया। इसके विपरीत अन्य राजनीतिक शक्तियों ने सामाजिक यथार्थ से राजनीतिक श्रेणियां गठित की। हिंदुत्व ने जाति और धार्मिक पहचान को संगठित राजनीतिक शक्ति में बदला, नव उदारवाद ने आकांक्षी व्यक्ति को राजनीतिक सामाजिक विषय के रूप में निर्मित किया।
इस विफलता का केंद्रीय कारण पार्टी का ढांचा है, जो औपनिवेशिक और युद्ध कालीन दौर से लगभग अपरिवर्तित बना हुआ है। पार्टी का संगठन तर्क प्रणाली, अनुशासन, पदानुक्रम और केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया पर आधारित है।
कम्युनिस्ट पार्टी जहां वर्ग को एक राजनीतिक कर्ता के बतौर नहीं विकसित कर पाई वहीं पार्टी का समग्र प्राधिकार एक केन्द्रीय समिति के छोटे समूह में सीमित हो गया। कार्यशैली के स्तर पर भी बड़ी समस्या दिखती है। सिद्धांत और व्यवहार की प्रैक्सिस निर्मित न होने की वजह से पार्टी के अंदर सिद्धांत को व्यवहार से मिलाने और व्यवहार को सैद्धांतिक स्तर पर विकसित करने की द्वंदात्मक पद्धति नहीं दिखती।
यह कहना कि पार्टी को वर्ग, जाति और विभिन्न आंदोलनों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, लेकिन इन स्वायत्त शक्तियों की स्वायत्तता लायक पार्टी ढांचा है ही नहीं। कम्युनिस्ट पार्टी के जितने जन संगठन हैं, कहने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन व्यवहार में पार्टी कमांड में ही चलते हैं।
भारतीय वामपंथ के पुनर्निर्माण के लिए कुछ बुनियादी सबक हैं। वर्ग का राजनीतिक निर्माण और वर्ग को सक्रिय रूप से एक ऐसी राजनीतिक कोटि के रूप में गढ़ना होगा, जो जाति, जेंडर, संस्कृति और पीढ़ी को अपने भीतर समाहित करे। यदि वाम को प्रासंगिक और परिवर्तनकामी बने रहना है तो उसे संगठनात्मक रणनीतियों पर पुनर्विचार करना होगा, सामाजिक श्रेणियों के अंतर्विरोधों को व्यवहार में उतारना होगा और जनता से प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करना होगा। पार्टी को एक बड़े राजनीतिक मंच में बिना इस आग्रह के कि सभी सामाजिक शक्तियां उसके नेतृत्व को स्वीकार करें, को छोड़ना होगा। बड़े राजनीतिक मंच में सभी सामाजिक-आर्थिक श्रेणियों के साथ उसे सामूहिक नेतृत्व कायम करना होगा। तभी पार्टी भारत की जटिल सामाजिक संरचना में एक प्रभावी राजनीतिक प्रतिरोध की वाहक बन सकेगी।
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
संस्थापक सदस्य
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट।
दिनांक - 21 जनवरी, 2026


