माल ढुलाई उत्सर्जन पर लगाम की तैयारी: 2050 से पहले फ्रेट सेक्टर के डीकार्बनाइजेशन की राष्ट्रीय रूपरेखा

भारत में माल ढुलाई की मांग 2050 तक तीन गुना होगी। फ्रेट सेक्टर के डीकार्बनाइजेशन और उत्सर्जन लेखांकन की नई राष्ट्रीय पहल पर विशेष विश्लेषण...

Update: 2026-02-12 13:07 GMT

Freight emissions in India: The hidden carbon crisis of a growing economy

भारत में माल ढुलाई उत्सर्जन: बढ़ती अर्थव्यवस्था का छिपा हुआ कार्बन संकट

  • 2050 तक तीन गुना मांग: क्या तैयार है भारत का लॉजिस्टिक्स ढांचा (India's freight sector)?
  • फ्रेट एमिशन अकाउंटिंग क्यों अनिवार्य है?—‘मापेंगे नहीं तो घटाएँगे कैसे’ का सिद्धांत
  • ISO 14083 और GLEC के साथ भारत-विशिष्ट मानक: नीति निर्माण की नई दिशा
  • CO₂ से आगे: NOx, SOx और ब्लैक कार्बन का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
  • दिल्ली-एनसीआर से औद्योगिक कॉरिडोर तक: CAQM की भूमिका और क्षेत्रीय मॉडल
  • डिजिटल MRV सिस्टम और इलेक्ट्रिक फ्रेट: डीकार्बनाइजेशन का व्यावहारिक खाका
  • वैश्विक कार्बन मार्केट और भारत: प्रतिस्पर्धात्मक लॉजिस्टिक्स की ओर बढ़ते कदम

भारत में माल ढुलाई की मांग 2050 तक तीन गुना होगी। फ्रेट सेक्टर के डीकार्बनाइजेशन और उत्सर्जन लेखांकन की नई राष्ट्रीय पहल पर विशेष विश्लेषण...

भारत की सड़कों, रेल पटरियों और बंदरगाहों से गुजरता हर ट्रक केवल सामान नहीं ढोता—वह अपने साथ कार्बन का बढ़ता बोझ भी लेकर चलता है। 2050 तक माल ढुलाई की मांग तीन गुना होने जा रही है। ऐसे में स्मार्ट फ्रेट सेंटर इंडिया, टेरी और आईआईएम-बैंगलोर की नई रिपोर्ट बताती है कि बिना सटीक उत्सर्जन लेखांकन के जलवायु लक्ष्यों को पाना असंभव है। यह केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि जन-स्वास्थ्य, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और भविष्य की अर्थव्यवस्था का प्रश्न है...

माल ढुलाई उत्सर्जन पर लगाम कसने की पहल: फ्रेट सेक्टर के डीकार्बनाइज़ेशन की तैयारी

भारत में माल ढुलाई उत्सर्जन के आंकड़े

भारत में परिवहन उत्सर्जन में माल ढुलाई (ट्रक, रेल, बंदरगाह) का बहुत बड़ा हिस्सा है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है। इस बात का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वित्त वर्ष 2024-25 में, भारतीय रेलवे 1.6 अरब टन से अधिक माल परिवहन करके अमेरिका और रूस को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल मालवाहक बन गया।

2050 तक तीन गुना हो जाएगी माल ढुलाई की मांग

देश में आर्थिक विकास, शहरीकरण और ई-कॉमर्स में वृद्धि के साथ, 2050 तक माल ढुलाई की मांग तीन गुना होने का अनुमान है।

India's logistics and climate policy & Freight emission accounting in India

  • फ्रेट सेक्टर डीकार्बनाइजेशन नीति भारत
  • भारत में लॉजिस्टिक्स कार्बन फुटप्रिंट
  • 2050 तक माल ढुलाई की मांग भारत

जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में देश के समग्र कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी गंभीर चुनौती को केंद्र में रखते हुए स्मार्ट फ्रेट सेंटर इंडिया(SFC-India), टेरी (TERI) और आईआईएम-बैंगलोर((IIM-banglore) ने संयुक्त रूप से एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज़ जारी किया है जिसका शीर्षक 'इंस्टीट्यूशनलाइजिंग फ्रेट एमिशन एकाउंटिंग इन इंडिया' है। यह दस्तावेज़ तकनीकी रूप से जितना जटिल प्रतीत होता है, इसकी ज़मीनी हकीकत उतनी ही सीधी और स्पष्ट है कि भारत में ट्रकों, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर, वेयरहाउस और पूरी सप्लाई चेन से होने वाले उत्सर्जन को मापे बिना उसे कम करना असंभव है।

अब एक ऐसा मोड़ आ गया है जहाँ किसी भी देश के लिए अपने कार्बन उत्सर्जन को घटाना तब तक संभव नहीं है, जब तक वह उन सेक्टरों की अनदेखी करता रहे, जो चुपचाप लेकिन सबसे तीव्र गति से विस्तार कर रहे हैं।

भारत का फ्रेट सेक्टर (India's freight sector) जितनी तेज़ी से बढ़ रहा है, उतनी ही रफ़्तार से इसका कार्बन फुटप्रिंट भी फैल रहा है और यह व्हाइटपेपर उसी डेटा के बिखराव को खत्म करने की एक ठोस कोशिश है, जहां अब तक नीतियां अक्सर केवल अनुमानों पर टिकी रहती थीं।

रिपोर्ट का सबसे बुनियादी और प्रभावी तर्क यही है कि जिसे हम सटीक रूप से माप नहीं सकते, उसे हम वैज्ञानिक रूप से घटा भी नहीं सकते। इसी सिद्धांत के आधार पर यह दस्तावेज़ एक राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित फ्रेमवर्क की वकालत करता है जो ISO 14083 और GLEC जैसे वैश्विक मानकों के साथ तालमेल बिठाता है, लेकिन इसे भारत की अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, ईंधन मिश्रण और संचालन की वास्तविकताओं के अनुरूप ढाला गया है।

स्मार्ट फ्रेट सेंटर इंडिया की टेक्निकल प्रमुख दीपाली ठाकुर का साफ़ कहना है कि- मानकीकृत और भारत-विशिष्ट 'एमिशन फैक्टर' ही नीति-निर्माण को अनुमानों के अंधेरे से निकालकर सटीक हस्तक्षेप की रोशनी में ला सकते हैं।

टेरी के विशेषज्ञों का भी कहना है कि फ्रेट एमिशन का हिसाब रखना केवल कागजी रिपोर्टिंग की कवायद नहीं है, बल्कि यह भविष्य के क्लीन फ्रेट प्रोग्राम्स, डीकार्बनाइजेशन रणनीतियों और उभरते हुए वैश्विक कार्बन मार्केट्स में भारत की मजबूत भागीदारी की नींव रखने जैसा है।

यह रिपोर्ट एक और गंभीर पहलू को रेखांकित करती है कि माल ढुलाई से होने वाला नुकसान केवल कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), सल्फर ऑक्साइड (SOx), पार्टिकुलेट मैटर और ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक तत्व हमारे शहरों की हवा को ज़हरीला बना रहे हैं। खासतौर से औद्योगिक गलियारों के आसपास रहने वाली आबादी पर इसका सीधा और घातक प्रभाव पड़ रहा है।

यही कारण है कि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) जैसे संस्थानों के लिए दिल्ली-एनसीआर जैसे हॉटस्पॉट इस पूरी बहस और रणनीति के केंद्र में बने हुए हैं, क्योंकि यहां किए गए सफल प्रयोग देश के अन्य औद्योगिक क्लस्टर्स के लिए एक आदर्श मॉडल साबित हो सकते हैं।

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने भी इस दिशा में अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि फ्रेट एमिशन लेखांकन को केवल पर्यावरण का मुद्दा न मानकर इसे लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर की दक्षता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।

व्हाइटपेपर केवल समस्याओं का पिटारा नहीं है, बल्कि यह डिजिटल एमआरवी (MRV) सिस्टम, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए भारत-विशिष्ट एमिशन फैक्टर्स और ट्रांसपोर्टेशन एमिशन मेजरमेंट टूल जैसे आधुनिक समाधानों के माध्यम से आगे का एक स्पष्ट रास्ता भी सुझाता है। ये सभी पहल इस बात का प्रमाण हैं कि भारत में फ्रेट सेक्टर अब केवल कागजी आकांक्षाओं से आगे बढ़कर वास्तविक क्रियान्वयन की दहलीज पर खड़ा है।

भारत की जलवायु कथा में अब वह समय आ गया है जब सड़क पर दौड़ता हर ट्रक केवल सामान ही नहीं ढोएगा, बल्कि वह अपने साथ अपने कार्बन का सटीक हिसाब-किताब भी लेकर चलेगा। निश्चित रूप से यहीं से भारत की लॉजिस्टिक्स और जलवायु नीति (India's logistics and climate policy) के एक नए और सशक्त अध्याय की शुरुआत होती है जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ और हरित भारत का मार्ग प्रशस्त करेगी।

डॉ. सीमा जावेद

(लेखिका पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ हैं)

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