ग़ाज़ा में मलबे से उठी उम्मीद की आवाज़: ‘ज़मान एफ़एम’ रेडियो स्टेशन की ऐतिहासिक वापसी

ग़ाज़ा में दो वर्षों के युद्ध के बाद ‘ज़मान एफ़एम’ की वापसी हो गई है। मलबे के बीच यह रेडियो उम्मीद और सूचना की जीवनरेखा बना है।

Update: 2026-02-20 04:53 GMT

A voice of hope rises from the rubble in Gaza: The historic return of Zaman FM radio station

‘ज़मान एफ़एम’: ग़ाज़ा का एकमात्र सक्रिय एफएम स्टेशन

  • युद्ध की राख में मीडिया का संघर्ष
  • तबाही के बीच सूचना की जीवनरेखा
  • विश्व रेडियो दिवस और स्थानीय पत्रकारिता का महत्व
  • ग़ाज़ा के पुनर्निर्माण में मीडिया की भूमिका
  • सीमित संसाधन, अटूट संकल्प: रामी अल-शराफ़ी की कहानी

स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय संकट में रेडियो की प्रासंगिकता

दो साल की तबाही के बाद ग़ाज़ा में ‘ज़मान एफ़एम’ ने फिर प्रसारण शुरू किया है। मलबे के बीच बैठा एक प्रसारक, लोगों तक पहुँचा रहा है उम्मीद, स्वास्थ्य सलाह और जीवनरक्षक सूचनाएँ। क्या युद्धग्रस्त समाज के पुनर्निर्माण में स्थानीय पत्रकारिता को उसका स्थान मिलेगा?

नई दिल्ली, 20 फरवरी 2026. दो वर्षों तक चले इसराइल–हमास युद्ध के बाद ग़ाज़ा पट्टी में स्थानीय मीडिया ढाँचा लगभग ध्वस्त हो गया था। युद्ध से पहले सक्रिय 23 रेडियो स्टेशनों में से अब केवल ‘ज़मान एफ़एम’ ने पुनः अपना एफएम प्रसारण शुरू किया है। ग़ाज़ा शहर के तल अल-हवा क्षेत्र में स्थित यह स्टेशन मलबे और सीमित संसाधनों के बीच स्वास्थ्य सलाह, मानवीय सहायता और बुनियादी सेवाओं की जानकारी प्रसारित कर रहा है। बिजली कटौती और संचार अवरोध के बीच, यह रेडियो स्टेशन ग़ाज़ा के लोगों के लिए सूचना की नई जीवनरेखा बनकर उभरा है। पढ़िए संयुक्त राष्ट्र समाचार की यह ख़बर

बर्बादी के मलबे से उठी आवाज़: ग़ाज़ा में रेडियो स्टेशन की वापसी

ग़ाज़ा पट्टी में 'ज़मान एफ़एम' रेडियो स्टेशन की क्षतिग्रस्त इमारत के भीतर, प्रसारक रामी अल-शराफ़ी अपने लैपटॉप पर काम कर रहे हैं. इसराइली सैन्य बलों और हमास के बीच दो वर्षों तक जारी रहे युद्ध और उससे हुई तबाही के बीच यह प्रसारण, एक अप्रत्याशित लेकिन उम्मीद भरी वापसी का संकेत है.

रामी अल-शराफ़ी ने यूएन न्यूज़ को बताया कि ग़ाज़ा में युद्ध शुरू होने से पहले 23 स्थानीय रेडियो स्टेशन सक्रिय थे, लेकिन वो सभी युद्ध में तबाह हो गए और उनका प्रसारण बन्द हो गया.

“व्यापक विनाश के बाद आज ग़ाज़ा के भीतर एफ़एम पर प्रसारण करने वाला हमारा ही एकमात्र रेडियो स्टेशन बचा है.”

“हमें आशा है कि अन्य स्थानीय रेडियो स्टेशन भी अपने प्रसारण फिर से शुरू कर पाएंगे, ताकि ग़ाज़ा पट्टी के लोगों तक मीडिया सेवाएँ पहुँचाने के लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो सके.”

हर वर्ष 13 फ़रवरी को मनाए जाने वाले विश्व रेडियो दिवस से ठीक पहले यह प्रसारण, ऐसे समय में फिर शुरू हुआ है, जब ग़ाज़ा में स्थानीय मीडिया का ढाँचा अब भी गम्भीर संकट से गुज़र रहा है.

वहीं स्थानीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर यह मांग उठ रही है कि ग़ाज़ा के पुनर्निर्माण और पुनर्बहाली की प्रक्रिया में पत्रकारिता को महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

मलबे के बीच नई शुरुआत

ग़ाज़ा पट्टी के कुछ स्थानीय रेडियो स्टेशन, युद्ध के कारण लगभग दो वर्षों के अन्तराल के बाद, फिर से प्रसारण शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं.

इसराइली हमलों में बुनियादी ढाँचे और नागरिक संस्थानों को व्यापक क्षति पहुँची थी. ऐसे में, रेडियो की वापसी होना, युद्ध से बुरी तरह प्रभावित इलाक़े में मीडिया परिदृश्य को दोबारा खड़ा करने की एक धीमी लेकिन अहम कोशिश है.

ज़मान एफ़एम, ग़ाज़ा शहर के तल अल-हवा इलाक़े में स्थित है, जहाँ हमलों के बाद, अकाल जैसी स्थिति बनी और सड़कों पर मलबे के ढेर लग गए.

स्टेशन की दरकी हुई दीवारें भारी तबाही की गवाही देती हैं. अन्दर का दृश्य किसी सामान्य रेडियो स्टूडियो जैसा बिल्कुल नहीं है.

मलबे के बीच कर्मचारी, सीमित संसाधनों के साथ प्रसारण जारी रखने की कोशिश कर रहे हैं. उनके पीछे लगे पोस्टर, लोगों को जर्जर इमारतों के ख़तरों से आगाह करते हैं.

उम्मीद की आवाज़

ग़ाज़ा में मानवीय संकट अब भी जारी है. बिजली कटौती आम है और अन्य मीडिया तक पहुँच सीमित है. ऐसे हालात में स्थानीय रेडियो प्रसारण, लोगों के लिए जीवनरेखा बन जाता है. यही वह माध्यम है, जिसके ज़रिये ज़रूरी सूचनाएँ, स्वास्थ्य सलाह और उपलब्ध सेवाओं की जानकारी आम लोगों तक पहुँचती है.

रेडियो स्टेशन के निदेशक और सुबह प्रसारित होने वाले कार्यक्रम के प्रस्तुकर्ता रामी अल-शराफ़ी का कहना है कि बीमारियों के प्रसार, शिक्षा व्यवस्था की गिरावट और बुनियादी सेवाओं में रुकावट के बीच, ग़ाज़ा को पेशेवर स्थानीय रेडियो स्टेशनों की सख्त ज़रूरत है.

ऐसे स्टेशन जागरूकता सन्देश और मार्गदर्शन के लिए बुलेटिन प्रसारित करके, लोगों की मदद कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, “हमारा काम है लोगों तक सही जानकारी पहुँचाना और उन्हें उन सेवाओं के बारे में बताना जो बन्द हो गई थीं और अब धीरे-धीरे फिर से शुरू हो रही हैं. कठिन स्वास्थ्य हालात और बीमारियों के फैलाव को देखते हुए यह और भी ज़रूरी हो जाता है.”

रामी अल-शराफ़ी, चारों ओर तबाही के बीच अपने स्टेशन में धूल से ढँके माइक्रोफ़ोन के सामने बैठकर यही ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं.

वह ग़ाज़ा के लोगों को सुबह की शुभकामनाएँ देते हैं, ज़रूरी जानकारी और ताज़ा हालात से अवगत कराते हैं, और बर्बादी के बीच उम्मीद की आवाज़ बनकर उभरते हैं.

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