ग़ाज़ा में रमदान: युद्ध, बेघरपन और महंगाई के साये में पवित्र महीने की जद्दोजहद
इज़राइल-हमास युद्ध के बाद ग़ाज़ा में रमदान तंगी, विस्थापन और दोगुनी कीमतों के बीच मनाया जा रहा है। OCHA के अनुसार 21 लाख में से 14 लाख लोग बेघर हैं और अस्थायी तंबुओं में जीवन गुज़ार रहे हैं।

Ramadan in Gaza: Struggling to celebrate the holy month under the shadow of war, homelessness and inflation
युद्ध के बाद बदला ग़ाज़ा का सामाजिक परिदृश्य
- मलबे के पास तंबू: बेघर परिवारों की त्रासदी
- बिजली-पानी का संकट और रमदान की तैयारी
- ऐतिहासिक ज़ाविया बाज़ार में महंगाई की मार
- सजावट और लालटेन की दोगुनी कीमतें
- विस्थापन का आँकड़ा: United Nations Office for the Coordination of Humanitarian Affairs की रिपोर्ट
- धार्मिक एकजुटता और उम्मीद की लौ
युद्ध, अर्थव्यवस्था और मानवीय संकट का व्यापक असर
युद्धग्रस्त ग़ाज़ा में रमदान इस बार उत्सव का नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। बढ़ती महंगाई, बिजली-पानी का संकट और व्यापक विस्थापन के बीच परिवार परंपराओं को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। OCHA के आंकड़े बताते हैं कि लाखों लोग अब भी बेघर हैं...
नई दिल्ली, 19 फऱवरी 2026. ग़ाज़ा की गलियों में रमदान की रौशनी इस बार धुंधली है। जहां कभी परिवार बाज़ारों में सजावट और मिठाइयाँ खरीदते थे, वहीं अब मलबे के पास लगे तंबू ही उनका आशियाना हैं। युद्ध की तबाही, दोगुनी होती कीमतें और बुनियादी सुविधाओं का अभाव, इन सबके बीच लोग पवित्र महीने की रूह को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र समाचार की इस ख़बर से जानिए रमज़ान में ग़ाज़ा के हालात
ग़ाज़ा में रमदान: तंगी, बेतहाशा क़ीमतें और बेघर होने की मुश्किलें
एक फ़लस्तीनी बुज़ुर्ग वालिद अल-असी अपनी नन्ही सी पोती को दुलार करते हुए और उसके साथ खेलते हुए नज़र आते हैं. उन्होंने वादा किया था कि वो अपनी पोती को रमदान का पवित्र महीना आने पर, ग़ाज़ा शहर के बाज़ार में घुमाने के लिए ले जाएंगे, जैसा कि उनका परिवार अतीत में करता रहा था, मगर इसराइल-हमास युद्ध के बाद अब हालात बहुत बदल चुके हैं.
वालिद अल-असी अपने परिवार के साथ, ग़ाज़ा शहर के केन्द्रीय इलाक़े में अल-ज़रका मोहल्ले में रहते हैं जो उनके घर के मलबे के बगल में ही है और कपड़े व प्लास्टिक चाहतों से बना एक तम्बू ही उनका आशियाना है.
जिस जगह अब मलबा बचा है वहाँ किसी समय उनका घर होता था, जहाँ वे “ख़ुशी से” रहते थे और अच्छा खाना खाते थे, जिसमें रमदान की ख़ास - क़तायेफ़ जैसी मिठाइयाँ भी शामिल होती थीं.
वालिद अल-असी ने यूएन न्यूज़ के साथ बातचीत में, दो वर्ष के युद्ध के दौरान इसराइली हमलों से हुई भीषण तबाही का मंज़र बयान करते हुए कहा, “अब सब कुछ बदल गया है.
“हम इन सब चीज़ों से महरूम हो गए हैं. आज, मैं दुकानों में सामान देखता हूँ, तो उनकी तरफ़ से मुँह फेर लेता हूँ क्योंकि उन्हें ख़रीदने के लिए मेरे पास रक़म नहीं हैं."
"मैं एक ऐसा आदमी हूँ जिसे उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) और डायबिटीज़ है, और मैं चल - फिर नहीं सकता. जो लोग तम्बू में रह रहे हैं, उनकी मदद करने की ज़रूरत है.”
‘हम मुसीबत में जी रहे हैं’
विस्थापितों के लिए बनाए गए एक और तम्बू में, अमल अल-समरी और उनके पति रमदान के महीने के लिए माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं, भले ही वो प्रतीकात्मक नज़र आता है.
वह अपने तम्बू को सही सलामत रखने और पवित्र रमदान महीने की तैयारी में व्यस्त रहे हैं. ऐसे में भी अमल अल-समरी के थके हुए चेहरे पर मुस्कान सदैव बनी रहती है, और उनके तीन बच्चों ने रमदान महीने के मौक़े पर जो कपड़े पहने हैं, वो नए जैसे नज़र आते हैं.
वो कहती हैं, युद्ध से पहले, “हमारी ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत थी.”
वह रिश्तेदारों से मिलने जाती थीं, अपने परिवार और भाइयों से मिलने जाती थीं, घर के लिए बाज़ार से तरह-तरह की चीज़ें ख़रीदती थीं, और लटकने वाली लालटेनों व सजावट के ज़रिए रमदान का माहौल बनाती थीं. “आज, वैसा कुछ भी नहीं है.”
“हम मुसीबत में जी रहे हैं. बिजली व पानी नहीं है. हमें अपने घरों से हटकर, बार-बार विस्थापित और बेघर होना पड़ा, और एक जगह तो, समुद्र का पानी भर गया था और हमारे तम्बू बह गए थे.”
आसमान छूती क़ीमतें और सामान की भारी कमी
बेहद मुश्किल हालात, चुनौतियों, लगातार तकलीफ़, सामान की कमी और तबाही ने इस इलाक़े में गहरे निशान छोड़े हैं. इन सबके बावजूद रमदान के पवित्र महीने का माहौल और इसका ख़ास सामान, ग़ाज़ा शहर के ऐतिहासिक ज़ाविया बाज़ार तक पहुँच ही गया है.
छोटी-बड़ी दुकानों में अलग-अलग आकार के लालटेन और अपने सामान की नुनाइस करने व पवित्र महीने का स्वागत करने वाले विज्ञापन व सन्देश भी नज़र आते हैं.
कुछ परिवार, चीज़ों की ज़्यादा क़ीमतों के बावजूद अपने बच्चों के लिए लालटेन ख़रीद पा रहे हैं.
रमदान की लालटेन की क़ीमतें दोगुनी
रमदान की सजावट का सामान बेचने वाली एक दुकान के मालिक लुआय अल-जमासी बताते हैं कि अलबत्ता, बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो बिना कुछ ख़रीदे ही बाज़ार से गुज़र जाते हैं क्योंकि ज़्यादा कीमतों और सामान की कमी को देखते हुए, उनके पास चीज़ें ख़रीदने के लिए पर्याप्त धन नहीं है.
अल-जमासी ने कहा, “बहुत से लोग रमदान की सजावट इसलिए नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि वो बिजली से वंचित हैं.”
“साथ ही, रमदान की सजावट की चीज़ों की क़ीमत बहुत बढ़ गई है क्योंकि पिछले कुछ समय में इस सैक्टर में और पर्याप्त सामान नहीं आया है.”
अल-जमासी अपने हाथ में एक लालटेन थामे हुए कहते हैं, “इस लालटेन की क़ीमत पहले 30 शेकेल हुआ करती थी, लेकिन अब इसकी क़ीमत 60 शेकेल तक पहुँच गई है. देश में सामान नहीं आने की वजह से क़ीमतें दोगुनी हो गई हैं.”
‘हम बहुत मुश्किल समय से गुज़रे हैं’
अलबत्ता, कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनमें अपने तरीक़े से जश्न मनाने और रमदान की ख़ुशियाँ ज़ाहिर करने वालों के साथ एकजुटता दिखाने का पक्का इरादा नज़र आता है. इनमें एक ईसाई फ़लस्तीनी नागरिक माहेर तारज़ी भी हैं, जो ज़ाविया बाज़ार में टहल रहे थे.
उन्होंने धीमी और मीठी आवाज़ में, रमदान से जुड़ा एक गीत गाया, जिसके बोल हैं: “सुहानी और ख़ुशनुमा रातें आ गई हैं, रातें जो आ रही हैं और रातें जो जा रही हैं, जिनमें हमेशा सच्चाई मौजूद रहती है, और उनकी रौशनी ऊँचाइयों से चमकती है.”
माहेर तारज़ी कहते हैं, “लोग ख़ुश रहना चाहते हैं. हम मुश्किल समय के दौरों से गुज़रे हैं, और यह अच्छा है कि हम अब भी जीवित हैं.”
‘हमने कितनी मुसीबतें झेली हैं?’
माहेर तारज़ी कहते हैं, “लोग आस-पास देखते हैं और सोचते हैं, हम यह सब कैसे झेल पाए?”
“फिर वे अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करते हैं और बाज़ारों में आते हैं. लेकिन, ख़रीदने की ताक़त के मामले में अब चीज़ें पहले जैसी नहीं हैं.”
वैसे तो, ग़ाज़ा में अब भी बहुत से लोग बेहद मुश्किल हालात में जीवन जी रहे हैं, जिनमें से ज़्यादातर अब भी बेघर हैं. इसके बावजूद रमदान का पवित्र महीना आने की ख़ुशी में, ग़ाज़ा शहर के कुछ इलाक़ों में रात में, लालटेन और लैंप से उजाला किया जाता है.
संयुक्त राष्ट्र के आपदा राहतम समन्वय कार्यालय (OCHA) ने बताया कि, अनुमान के मुताबिक़, ग़ाज़ा की कुल आबादी - 21 लाख में से लगभग 14 लाख लोग, विस्थापित होकर लगभग 1,000 स्थानों पर रह रहे हैं, जहाँ वे बेघर हैं, वहाँ बहुत ज़्यादा भीड़ है और ऐसे तम्बुओं में रह रहे हैं, जहाँ बहुत कम निजता और कमज़ोर सुरक्षा के हालात है.


