प्राकृतिक संसाधनों को तेज़ी से खत्म कर रहे हैं नए बिज़नेस मॉडल : IPBES रिपोर्ट
वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि जैव विविधता ह्रास की कीमत पर हुई है-IPBES रिपोर्ट ने चेताया। 7.3 ट्रिलियन डॉलर प्रकृति-विरोधी गतिविधियों में निवेश।

प्राकृतिक संसाधनों का संकट
IPBES रिपोर्ट: बिज़नेस की कमाई, प्रकृति की क़ीमत और वैश्विक अर्थव्यवस्था का सिस्टमेटिक रिस्क
- मैनचेस्टर से आई चेतावनी: IPBES की Business and Biodiversity Assessment Report क्या कहती है?
- 7.3 ट्रिलियन डॉलर बनाम 220 बिलियन: वित्तीय प्रवाह का असंतुलन
- जब प्रकृति ‘फ्री रिसोर्स’ बन जाती है: कॉरपोरेट मॉडल की संरचनात्मक समस्या
- रिपोर्टिंग का संकट: क्यों 1% से कम कंपनियाँ जैव विविधता प्रभाव का उल्लेख करती हैं?
- आदिवासी भूमि और औद्योगिक विस्तार: विकास बनाम संरक्षण का द्वंद्व
- समाधान का ढांचा: सरकार, वित्तीय संस्थान और निवेशकों की संयुक्त भूमिका
- बोर्डरूम से कैबिनेट तक: क्यों यह सिर्फ पर्यावरण नहीं, आर्थिक स्थिरता का प्रश्न है?
दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस प्रकृति पर टिकी है, वही तेज़ी से कमजोर हो रही है। IPBES की नई रिपोर्ट बताती है कि मुनाफ़े की दौड़ अब वित्तीय स्थिरता के लिए भी खतरा बन चुकी है। सवाल साफ़ है कि क्या प्रकृति के बिना क्या कोई बिज़नेस टिक पाएगा?
बिज़नेस की कमाई, प्रकृति की क़ीमत.
IPBES रिपोर्ट ने खोल दी वैश्विक अर्थव्यवस्था की नाज़ुक हक़ीक़त
नई दिल्ली, 13 फरवरी 2026. दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस ज़मीन पर खड़ी है, वह ज़मीन धीरे.धीरे खिसक रही है। और यह सिर्फ जंगलों, नदियों या जैव विविधता की कहानी नहीं है। यह सीधी-सीधी कारोबार, निवेश और मुनाफ़े की कहानी बन चुकी है।
मैनचेस्टर से जारी इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लेटफ़ॉर्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज, यानी IPBES की नई रिपोर्ट एक साफ़ चेतावनी देती है। हर बिज़नेस प्रकृति पर निर्भर है। और हर बिज़नेस किसी न किसी रूप में प्रकृति को नुकसान भी पहुंचा रहा है।
तीन साल में 35 देशों के 79 विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई यह Business and Biodiversity Assessment Report बताती है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि भारी जैव विविधता ह्रास की क़ीमत पर हुई है। अब यही नुकसान बिज़नेस और फाइनेंशियल सिस्टम के लिए एक सिस्टमेटिक रिस्क बन चुका है।
रिपोर्ट के मुताबिक़, कंपनियां चाहे टेक सेक्टर की हों या मैन्युफैक्चरिंग की, वे सीधे या परोक्ष रूप से प्रकृति की सेवाओं पर निर्भर हैं। पानी की उपलब्धता, बाढ़ से सुरक्षा, कच्चा माल, जलवायु स्थिरता, यहां तक कि पर्यटन और सांस्कृतिक मूल्य भी। लेकिन समस्या यह है कि अधिकतर कंपनियां अपने पर्यावरणीय नुकसान की असली आर्थिक कीमत नहीं चुकातीं।
आंकड़े इस असंतुलन को और साफ़ करते हैं। साल 2023 में करीब 7.3 ट्रिलियन डॉलर की सार्वजनिक और निजी फाइनेंसिंग ऐसी गतिविधियों में गई जिनका सीधा नकारात्मक असर प्रकृति पर पड़ा। इसके मुक़ाबले जैव विविधता संरक्षण और बहाली के लिए सिर्फ़ 220 बिलियन डॉलर खर्च हुए। यानी नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले पैसों का सिर्फ़ तीन प्रतिशत।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि आज की कारोबारी व्यवस्था में प्रकृति को नुकसान पहुंचाना अक्सर ज़्यादा मुनाफ़े वाला सौदा दिखता है। बड़ी सब्सिडी, कमजोर नियम और तिमाही मुनाफ़े का दबाव मिलकर ऐसे बिज़नेस मॉडल बनाते हैं जो प्राकृतिक संसाधनों को तेज़ी से खत्म कर रहे हैं।
एक और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि सार्वजनिक रूप से रिपोर्टिंग करने वाली कंपनियों में से एक प्रतिशत से भी कम अपनी रिपोर्ट में जैव विविधता पर अपने प्रभाव का ज़िक्र करती हैं। जबकि कई देशों के सेंट्रल बैंक अब यह आकलन करने लगे हैं कि फाइनेंशियल सिस्टम की स्थिरता प्रकृति पर कितनी निर्भर है।
IPBES रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि इंडिजिनस समुदायों की ज़मीन सबसे ज़्यादा खतरे में है। दुनिया की करीब 60 प्रतिशत आदिवासी भूमि औद्योगिक विकास से प्रभावित हो रही है। लेकिन इन्हीं समुदायों के पास प्रकृति संरक्षण का सबसे गहरा स्थानीय ज्ञान भी है, जिसे अब तक बिज़नेस निर्णयों में नज़रअंदाज़ किया गया।
रिपोर्ट किसी एक समाधान का दावा नहीं करती। इसके बजाय यह बताती है कि अलग.अलग स्तरों पर अलग.अलग टूल्स की ज़रूरत है। साइट लेवल पर स्थानीय डेटा और भागीदारी जरूरी है। वहीं कॉर्पोरेट और वैल्यू चेन लेवल पर लाइफ साइकिल एनालिसिस और बड़े आर्थिक मॉडल मददगार हो सकते हैं।
IPBES का साफ़ संदेश है। बिज़नेस अकेले यह बदलाव नहीं ला सकते। सरकारों, फाइनेंशियल संस्थानों, सिविल सोसाइटी और निवेशकों को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा जहां मुनाफ़ा और प्रकृति संरक्षण एक दूसरे के खिलाफ़ न हों।
रिपोर्ट में सरकारों और फाइनेंशियल सेक्टर के लिए 100 से ज़्यादा ठोस कार्रवाइयों की सूची दी गई है। बेहतर नियम, हानिकारक सब्सिडी का ख़ात्मा, पारदर्शी रिपोर्टिंग और प्रकृति-आधारित निवेश को बढ़ावा। ये सब उस बदलाव का हिस्सा हैं जिसकी अब टालना संभव नहीं।
IPBES के शब्दों में, प्रकृति कोई दूर का पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रही। यह आज हर बोर्डरूम और हर कैबिनेट की मेज़ पर बैठा सवाल है। सवाल यह नहीं है कि बिज़नेस पर्यावरण के पक्ष में होंगे या विरोध में। सवाल यह है कि प्रकृति के बिना कोई बिज़नेस टिक भी पाएगा या नहीं।
डॉ. सीमा जावेद
पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ
क्या है Intergovernmental Science-Policy Platform on Biodiversity and Ecosystem Services
Intergovernmental Science-Policy Platform on Biodiversity and Ecosystem Services (IPBES) एक अंतर-सरकारी संस्था है जो जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर वैज्ञानिक ज्ञान को नीति निर्माताओं तक पहुँचाने के लिए बनाई गई है। इसे अक्सर “जैव विविधता के लिए IPCC” कहा जाता है क्योंकि इसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर प्रकृति की स्थिति का मूल्यांकन करना और निर्णयों को वैज्ञानिक आधार देना है। IPBES की स्थापना 2012 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जैव विविधता की गिरावट पर बढ़ती चिंता के जवाब में की गई थी। इसका प्राथमिक उद्देश्य वैज्ञानिक, तकनीकी और पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत कर सरकारों को नीतिगत निर्णयों के लिए ठोस साक्ष्य उपलब्ध कराना है।


