मसीहुद्दीन संजरी

बाबरी मस्जिद विध्वंस को अपराधिक साज़िश मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अडवाणी और जोशी समेत अन्य पर मुकदमा चलाने का आदेश दिया है।

खास बात यह कि निचली अदालत और हाईकोर्ट के अपराधिक साज़िश न मानने के बाद सीबीआई ने इस मामले की पैरवी सुप्रीम कोर्ट में बहुत मज़बूती से किया है।

ऐसे समय में जब आतंकवाद के मामले में सरकारी वकील रोहणी साल्यान ने एनआईए पर आरोप लगाया हो कि उसके एक बड़े अधिकारी ने उनसे मुकदमें की पैरवी में शिथिलता बरतने के लिए कहा था ताकि साध्वी को बचाया जा सके सीबीआई की मज़बूत पैरवी पर संदेह होना अस्वभाविक नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सीबीआई को डटे रहने का संदेश देकर इस मामले में एक तीर से कई शिकार किए गए हैं।

एक मज़बूत तर्क यह हो सकता है कि सरकार सीबीआई का गलत इस्तेमाल नहीं करती है। इसके अलावा पुराने कई हिसाब बराबर करने के साथ ही इन नेताओं के अंतिम दिनों में भविष्य की सभी संभावनाएं समाप्त कर दी गयीं।

वैसे अडवाणी जी भाजपा के दो दशक से अधिक समय तक सबसे बड़े रणनीतिकार (साजिशकर्ता) रहे हैं। आतंकवाद के नाम पर चलने वाले अभियान को मुस्लिम केंद्रित बनाने में उनका सबसे बड़ा योगदान रहा है। अक्षरधाम समेत कई आतंकी घटनाओं की जांच के रुख को मोड़ने में भी उनका नाम आता रहा है। उनकी रथ यात्राओं को कौन भूल सकता है? इतने दक्ष राजनेता को बहर हाल खुला नहीं छोड़ा जा सकता। भारतीय राजनीति में कई राजनेता ऐसे भी हैं जो चान्स नहीं लेते। यह गुण कई नेताओं ने अडवाणी जी से ही सीखा है। अब देखना है कि खुद अडवाणी जी के लिए राजनीति में कितना चान्स बचा है?