अब वैदिक जी को क्या कहूँ, जब हाफ़िज़ सईद ही उन्हें कुछ नहीं कह पाया!
अब वैदिक जी को क्या कहूँ, जब हाफ़िज़ सईद ही उन्हें कुछ नहीं कह पाया!
अब वैदिक जी को क्या कहूँ,
जब हाफ़िज़ सईद ही उन्हें कुछ नहीं कह पाया!
1965 में, जब जेएनयू की स्थापना भी नहीं हुयी थी, तब ऐसी क्रान्ति वैदिक ही कर सकते थे
वरिष्ठ और फेंकू पत्रकार वेद प्रताप वैदिक का दावा मित्र सुभाष त्रेहन की फेसबुक पोस्ट पर देख रहा हूँ कि किस तरह उन्होंने 1965 में जेएनयू में हिंदी के समर्थन में क्रान्ति कर दी थी। 1965 में, जब जेएनयू की स्थापना भी नहीं हुयी थी, तब ऐसी क्रान्ति वैदिक ही कर सकते थे।
सबको याद होगा, कि किस तरह वैदिक ने कुछ समय पूर्व पाक उग्रवादी हाफ़िज़ सईद के साथ अपना फ़ोटो सोशल मीडिया पर डाल डींग हाँकी थी कि उन्होंने कुख्यात को उग्रवाद छोड़ने की आज्ञा दी। मुझे पूरा विश्वास है कि वैदिक ने उग्रवादी के कान में कहा होगा - दाढ़ी आप पर बहुत फबती है, और इसी बीच सेल्फ़ी ले ली होगी।
हाल के वर्षों में एक दिन वैदिक मुझे दिल्ली में मिले और रहस्योद्घाटन किया –
“तुम्हारे पिता सुंदर लाल बहुगुणा जब नव भारत टाइम्स के संवाददाता थे और खबर भेजने में देरी करते थे, तो मैं फोन कर टोकता था - जल्दी करो बहुगुणा जी।“
वैदिक जी की उम्र का लिहाज़ करते हुए मैं उस वक़्त चुप रहा, लेकिन सचाई यह है कि मेरे पिता जब आज से 35 साल पहले तक अखबारों के स्ट्रिंगर रहे, उस वक़्त मोबाइल फोन तो था ही नहीं, लेकिन तब उनके पास कोई लैंड लाइन फोन भी नहीं था। वह प्रायः वनों या सुदूर पहाड़ी गाँवों में रहते थे और पोस्ट कार्ड पर खबर भेजते थे।
... लेकिन अब वैदिक जी को क्या कहूँ, जब हाफ़िज़ सईद ही उन्हें कुछ नहीं कह पाया!
सुभाष त्रेहन की फेसबुक पोस्ट
Trehan Subhash
मैं सन् १९६५ के दौरान जे एन यू में सबसे ज्यादा स्कॉलरशिप पाने वाले स्कॉलर था। विश्व विद्यालय के एक समारोह में जब व्याख्यान हिन्दी में करवाने के लिए मैं विश्व विद्यालय प्रशासन से भिड़ गया तो मुझे विश्व विद्यालय से बाहार निकाल दिया। मेरी स्कॉलरशिप रोक दी गयी। अगर मैं चाहता तो आत्महत्या कर सकता था, लेकिन मैने ऐसा नही किया। मैने डट कर मुक़ाबला किया जिसका परिणाम यह हुआ कि संसद तक ठप हो गयी। हार कर विश्व विद्यालय प्रशासन को मेरा निलंबन वापिस लेना पडा और मेरी बक़ाया स्कॉलरशिप देनी पडी।
-वेद प्रताप वैदिक


