अलविदा ऐ हंगामी वर्ष !
अलविदा ऐ हंगामी वर्ष !
एक संख्या के तौर पर 2011 एक 'प्राइम नम्बर' है। सबसे अनोखा और अलग। और मानो अपनी इसी विशेषता को साकार करता हुआ, इस संख्या से निरुपित वर्ष ने भी, जिसके समाप्त होने में अभी कुछ ही दिन बचे हैं, विश्व इतिहास में एक 'विद्रोह के वर्ष' के रूप में अपनी जगह सुरक्षित कर ली है। इस वर्ष में पूरी दुनिया के पैमाने पर जिस प्रकार आन्दोलनों का तूफ़ान फूट पड़ा और इसके नतीजे के तौर पर जैसे परिवर्तन घटित हुए उससे लेनिन का यह कथन याद आता है कि "दशकों बीत जाते हैं और कुछ भी नहीं होता है और कुछ सप्ताह ऐसे होते हैं जिनमें कई दशकों का घटनाक्रम घटित हो जाता है।" इस वर्ष पर भी यह उक्ति चरितार्थ होती है।
इस घटनाबहुल, हंगामी, शोरगुल और उथल पुथल भरे वर्ष के अन्त में पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका से लेकर यूरोप, लातिन अमेरिका, एशिया और यहाँ तक की स्वयं संयुक्त राज्य अमेरिका तक लगभग पूरी दुनिया आज एक विश्वव्यापी प्रतिरोध की लहर के चपेट में हैं। अभूतपूर्व आर्थिक, सामाजिक, राजनितिक और पर्यावरणीय संकट के दरपेश विभिन्न देशों में श्रमजीवी जनता और कार्यकर्ता न्याय, समानता और युद्ध के समाप्ति की मांगों को लेकर सड़क पर उतरने को बाध्य हुए। इसीलिए हमलोगों की पत्रिका 'श्रमजीवी पहल' ने इस वर्ष को "श्रमजीवी वर्ग की नयी पहलकदमी का वर्ष" की संज्ञा दी है।
विगत 15 अक्तूबर को अक्युपाई वाल स्ट्रीट के आह्वान पर आयोजित अन्तरराष्ट्रीय प्रतिरोध दिवस के अवसर पर पूरी दुनिया के 82 देशों के लगभग 1,000 शहरों में प्रदर्शन हुए जो इस बात का द्योतक था कि एक नया अन्तरराष्ट्रीय आन्दोलन और संभवतः, नए प्रकार का आन्दोलन जन्म ले रहा है।
यहाँ तक की 'टाइम' मैगजीन को भी इस तथ्य को स्वीकृति देनी पड़ी जब उसने इस वर्ष 2011 के लिए 'पर्सन ऑफ़ दी इयर' का सालाना ख़िताब किसी एक व्यक्ति को न देकर "दी प्रोटेस्टर" यानी एक आम प्रदर्शनकारी को दिया।
इस वर्ष की शुरुआत ट्युनिसिया और मिस्र में निरंकुशता के खिलाफ उन शानदार विद्रोहों से हुई जिन्होंने उन देशों में दशकों से काबिज तानाशाहों को चलता कर दिया और इसकी समाप्ति काहिरा के सडकों पर एक बार फिर संघर्ष की वापसी से हो रही है। इस के बीच के महीनों में अरब बसंत ने लीबिया, यमन, बहरीन और सिरिया जैसे उस क्षेत्र के अनेक देशों में जनता के संघर्षों को शक्ल लेते या शक्ल लेने की कोशिश करते हुए देखा। इसके बावजूद कि साम्राज्यवादी शक्तियों और स्थानीय प्रतिक्रियावादी ताकतों की दखलन्दाजी ने इन आन्दोलनों की शक्ल बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, वहाँ न अभी जनता का गुस्सा ही शान्त हुआ है और न ही परिवर्तन की प्रक्रिया को ही पूर्ण हुआ समझा जा सकता है।
पूरे इलाके में क्रान्तिकारी सम्भावनायों से परिपूर्ण जनउभार जैसी स्थिति को सामने देख कर अमेरिका और उसके यूरोपीय साझेदारों ने इन संघर्षों को अगवा कर लेने के की अपनी कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने बहरीन में विद्रोह को निर्ममतापूर्वक कुचलने के लिए वहाँ के राजतन्त्र को हरी झण्डी दी और देश छोड़ कर भाग चुके यमन के शासक अली अब्दुल्ला सालेह को लोकतान्त्रिक सत्ता परिवर्तन का नाटक खेलने के लिए वापस भेजा।
अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी सैन्य गटबंधन ने लीबिया में दखलन्दाजी की, हजारों बेगुनाह नागरिकों का कत्लेआम किया और मुअम्मर गद्दाफी की अत्यन्त ही नृसंसता के साथ हत्या की। इसके पहले उसने गद्दाफी का विरोध कर रहे लीबिया के विरोधी पक्ष के ईमानदार तत्वों को किनारे किया, सबसे ख़राब तत्वों को घूस और धमकियों से अपने अनुसार ढला और इलाके के तमाम प्रतिक्रियावादी शासकों के साथ मिली भगत से लीबिया में दखलन्दाजी की भूमिका तैयार की। अब वह सीरिया में भी इसी खेल को दुहराने की साजिश रच रहा है और अरब लीग के झण्डे तले इकठ्ठा इलाके कें तमाम प्रतिक्रियावादी शासक उसे इस काम में मदद कर रहे हैं और उसके 'अग्रिम चौकी' का काम कर रहे है। इन साम्राज्यवादी चालबाजियों को समझ कर सीरियाई जनता भी उस बशर अल-असद के शासन के पीछे लामबन्द हो गयी है, जिसका कुछ दिन पहले तक वह विरोध कर रही थी।
इस बीच, अमेरिका ने मिस्र में उस सैन्य तन्त्र का समर्थन करना जारी रखा जो होस्नी मुबारक के निरंकुश शासन की रीढ़ था और जो अब एन केन प्रकारेण जनता की क्रान्तिकारी आकाँक्षाओं का गला घोंट देने पर आमादा था। ऐसा लगता था की यह रणनीति सफल हो जाएगी लेकिन नवम्बर में इस सैन्य तन्त्र के लोकतान्त्रिक नियन्त्रण के मातहत रहने की अनिच्छा और साथ ही आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर इसकी पूर्ण असफलता के खिलाफ दसियों लाख लोग पुनः मिस्र की सड़कों पर उतर आये।
अरब विद्रोह आज सभी मुल्कों में कठिन चुनौतियों का सामना कर रहा है और यही हाल मिस्र में भी है जहाँ यह सबसे अधिक परवान चढ़ा है। साम्राज्यवादी शक्तियों और इलाकाई प्रतिक्रियावादी हुक्मरानों की तमाम कोशिशों के बावजूद इन मुल्कों में विद्रोह की यह आग अभी बुझी नहीं है। सिर्फ अरब बसंत के चलते जिसने दशकों से सत्ता पर कुण्डली मार कर बैठे तानाशाहों के तख्तो-ताज को हवा में उछाल दिया, 2011 को अब तक के इतिहास के सबसे क्रान्तिकारी वर्षों में शुमार किया जाता। लेकिन दावानल की तरह विद्रोह की यह आग जनतन्त्र के उस तथाकथित हृदयस्थली तक यानी पश्चिमी यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका तक भी पहुँच गयी जहाँ आज जनतन्त्र के नाम पर निगमों के सर्वग्रासी वर्चस्व वाली एक अपादमस्तक जनविरोधी व्यवस्था कायम है।
यूनान में बैंकरों और नौकरशाहों द्वारा थोपी गयी मितव्ययिता से विगत दो वर्षों से अधिक समय से लड़ रहे वहाँ के मजदूरों ने अपने लगातार जारी प्रदर्शनों और आम हड़तालों से यूरोप में संघर्षों का आगाज पहले से ही कर रखा था। राजधानी एथेंस के संसद भवन के बाहर चौक पर और देश के अन्य शहरों पर धरना देकर बैठे हुए नौजवानों के जस्बे ने उनकी हौसला अफजाई की। इन प्रदर्शनकारियों ने स्पेन के "इन्दिग्नदोस" आन्दोलन के नौजवानों से प्रेरणा ग्रहण की थी जिन्होंने बढ़ती बेरोजगारी और समाज कल्याण में कटौती के खिलाफ वहाँ के तमाम छोटे और बड़े शहरों के प्लाजाओं पर कब्ज़ा किया हुआ था।
स्पेन के युवा प्रदर्शनकारियों ने अपने आन्दोलन की यह तरकीब मिस्र में तहरीर चौक को दखल किये जाने से सीखी थी। और वहीँ से विनकानसिन के युवा मजदूरों ने भी यूनियन विरोधी कानूनों के खिलाफ अपने संघर्ष में तीन सप्ताह तक लगातार धरना देने की नीति सीखी थी।
युवा विद्रोह ब्रिटेन में भी विरोध का मुख्य स्वर बना रहा जहाँ नस्लवादी पुलिस हिंसा के खिलाफ अगस्त के महीने में एक स्वतःस्फूर्त बगावत फूट पड़ा। और 30 नवम्बर को वहाँ ब्रिटिश सार्वजनिक क्षेत्र के दसियों लाख कर्मचारियों ने पेनशन को बचाए रखने के सवाल पर प्रदर्शन किया जिसे 1930 के बाद की सबसे बड़ी विरोध कार्रवाई माना गया।
नौजवानों ने चिले में भी अपनी आवाज बुलन्द की। चिले को पिछले तीन दशकों में अमेरिका द्वारा थोपे गए मुक्त बाजार वाले "नवउदारवादी" आर्थिक नीतियों की सफलता के एक उदहारण के रूप में पेश किया जाता था। सिर्फ एक दशक पूर्व भयानक सैन्य शासन से बाहर आये इस देश में हजारों हजार छात्रों ने जनवादी और सर्वसुलभ शिक्षा की माँग पर अपना जुझारू आन्दोलन एक महीने तक जारी रखा। छात्रों की यह बगावत निकटवर्ती कोलम्बिया में भी फ़ैल गयी जहाँ वामपंथी लड़ाकों और यूनियनकर्मियों को आये दिन "आतंकवादी" का लेबल चस्पा कर मौत के घाट उतरा जाता है।
और फिर उर्जा का यह सतत प्रवाह ऐन वित्त की वैश्विक राजधानी न्यू यार्क में भी आ पहुँचा। अमेरिका में भी नौजवानों ने ही मोर्चा सम्हाला और आक्युपाई वाल स्ट्रीट और उसके बाद देश के अन्य शहरों में इसके समर्थन में एक के बाद एक पैदा हो गए दखल के कार्यक्रमों की नीव बने। आर्थिक विनाश के घटित होने तीन वर्ष बाद आखिरकार अर्थव्यवस्था के हालत में बहुत धीमे सुधार, बढ़ती बेरोजगारी, घटते तनख्वाह और सामाजिक खर्चों में कटौती से तंग आकार अमेरिकी जनता भी सड़कों पर उतरने को मजबूर हुई।
संगठित श्रमिकों ने भी राष्ट्रपति ओबामा की वादाखिलाफी और असफलताओं से निराश और मालिकान के लगातार और अधिक हमलावर होते रूख से त्रस्त होकर आक्युपाई आन्दोलन के कन्धे से कन्धा मिलाया और जिसके परिणामस्वरुप अमेरिका के दशकों के इतिहास के मजदूरों के सफलतम विरोध प्रदर्शन की कई मिसाल कायम किये गए।
निगमों के जरखरीदों और मीडिया विशारदों ने जब आक्युपाई आन्दोलन का इस बात के लिए उपहास किया की इसकी कोई माँग नहीं है तो वे महापंडित इस बात को देखने से चूक गए की इसके निशाने पर क्या है? जाहिरा तौर पर यह थी - व्यवस्था, यानी 'पूँजीवाद'। इसीलिए यह आन्दोलन दुनिया भर में फ़ैल गया और इसीलिए यह संघर्ष किसी न किसी रूप में जारी रहेगा।
इस वर्ष अरब को छोड़ कर बाकी एशिया अपेक्षाकृत शान्त ही रहा। और क्यों न हो, आखिर इसमें शामिल चीन और भारत ही तो इस गतिरुद्ध वैश्विक व्यवस्था के इंजन हैं। इन इंजनों में से एक के हम वासी है और वह भीतर से यह कितना पोला है हम जानते हैं। यहाँ पोस्को से लेकर मारुति सुज़िकी तक हर जगह सुनायी देने वाले आने वाले वक्त की आहट को अगर कोई सुन न सके तो, उसे बहरा ही कहा जायेगा। लेकिन वर्ष के ख़तम होते होते चीन में वाकून और शेनजेन वगैरह से प्रतिरोध की जैसी खबरें मिल रही है और वहाँ के श्रमिक असंतोष का जो हाल पता चल रहा है वे वैश्विक ट्रेंड के ही अनुरूप हैं। वे सभी उन्ही "नवउदारवादी" आर्थिक नीतियों के ही परिणाम है जिन्होंने उस विश्वव्यापी विदोह की लहर को जन्म दिया है जिसकी हम यहाँ चर्चा कर रहे हैं।
इस विश्वव्यापी विद्रोह की लहर के पीछे, दरअसल, वैश्विक व्यवस्था का एक बहुआयामी संकट है। 2008 के आर्थिक संकट ने उन देशों में भी जहाँ अर्थव्यवस्था का विस्तार जारी था वर्तमान वैश्विक व्यवस्था की अनेकानेक विसंगतियों मसलन, असमानता और वर्गीय ध्रुवीकरण में वृद्धि की दीर्घकालिक प्रवृत्ति को सतह पर ला दिया।
हालाँकि यूरोप के राजनेताओं को उनके पश्चिमी एशिआई भाई-बन्दों की नियति का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन संकट के नतीजे के तौर पर उन्हें भी काफी कुछ सहना पड़ा। आईसलैंड , आयरलैंड , इटली, स्पेन और यूनान में सरकारों का पतन हो गया और लगभग हर देश में उनकी लोकप्रियता रसातल में पहुँच गयी। और अब यूरोप में लगातार गहराते ऋण संकट से वैश्विक अर्थव्यवस्था के गिरावट के एक और भँवर में फँसने की सम्भावना लगातार बलवती होती जा रही है और इस से राजनीतिक संकट और गहरा ही होगा।
वर्त्तमान संकट पर दुनिया के शासक वर्गों की प्रतिकिया उपलब्ध सीमित राजनीतिक विकल्पों को और अधिक सीमित करने की है।
यूनान और इटली पर अब "टेक्नोक्रेटिक" सरकारों का शासन है जो मतदाताओं की जगह बैंकरों और यूरोपीय संघ के नौकरशाहों के प्रति जबाबदेह हैं। लेकिन यही बात एक अन्य रूप में अमेरिका में भी लागू हो रही है और मिशिगन राज्य एक नए विधायक के माध्यम से आपातकालीन वित्तीय मैनेजरों को बहाल कर रही है जो संकटग्रस्त नगरपालिकाओं में चुने हुए प्रतिनिधियों को दरकिनार करने और यूनियन समझौतों को फाड़ देने के अधिकार से लैस होगी। और राजधानी वाशिंगटन में राजनेता संविधान को धता बताते हुए मितव्ययिता के उपायों को लागू करने की कोशिश की जब उन्होंने एक "सुपरकमेटी" को ही बजट बनाने का अधिकार दे दिया था।
लेकिन अगर यह सब किसी को पसन्द न हो तो क्या करना है इस बारे में भी दुनिया के शासक वर्गों की एकता है। अरब से अमेरिका आज तक हर जगह सिर्फ शासक वर्गों की नीतियाँ ही एक नहीं हैं बल्कि जनता से निपटने के उनकर तरीके भी सामान हैं।लाठी, गोली आँसूगैस और मिर्चे के स्प्रे का इस्तेमाल सिर्फ एशिया में ही नहीं हो रहा है बल्कि अमेरिका और यूरोप में भी हो रहा है और इस वर्ष को अमेरिका में लम्बे समय तक मिर्चे के स्प्रे के लिए भी याद किया जायेगा।
भविष्य की दृष्टि से इस "विद्रोह के वर्ष" की क्या प्रासंगिकता है और यह क्यों अस्तित्व में आया, जैसे ढेरों सवाल बहस के लिए खुल गए है। प्रासंगिकता पर हम पहले कही गयी अपनी बात को ही दुहराते हैं "दुनिया कभी इस तरह जुड़ी नहीं थी। इसके पहले दुनिया कभी एक विश्वव्यापी व्यवस्था द्वारा और लगभग एकसमान नीतियों द्वारा ढाई-तीन दशकों तक लगातार लूटी भी नहीं गयी थी। सबसे आश्चर्य की बात है कि इस विश्वव्यापी प्रतिरोध के पीछे पूँजीवाद के विरोध या वैकल्पिक व्यवस्था की कोई सुचिन्तित या सुनिश्चित विचारधारा या राजनीति नहीं है। लेकिन यदि पूँजीवाद के विरोध का पूँजीवाद के विरोध की विचारधारा से मेल हो जाये तो फिर कमीं ही किस बात की रह जायेगी? इतिहास इतिहास बनाने वालों की इच्छाओं के अनुसार नहीं चला करती है। बल्कि इतिहास बनाने की इच्छा रखने वालों को उसकी टेढ़ी-मेढ़ी और अबूझ गतियों को पकड़ना पड़ता है।
"एक विश्व्यापी व्यवस्था ने पूरी दुनिया को एक कर दिया है। मुनाफे की उसकी न बुझने वाली प्यास अब उसके खिलाफ प्रतिरोध को भी एकजुट कर रही है।" एक व्यापक दृष्टि से इन सभी प्रतिरोधों को देखना और इस पर विचार करना कि पूँजीवाद के विरोध का पूँजीवाद के विरोध की विचारधारा से किस प्रकार मेल कराया जाये यह आज दुनिया भर के क्रान्तिकारी शक्तियों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। और उससे भी अधिक यह एक चुनौती है, एक ऐसी चुनौती जिसे देश औए दुनिया के पैमाने वे एक बहुत ही खुला दृष्टिकोण अपना कर और संकीर्णतावाद , जड़सूत्रवाद और अवसरवाद जैसी अपनी पुरानी बिमारियों से निजात पा कर ही पूरी कर सकते हैं।
आज यदि हम कहें कि आनेवाले वर्ष शानदार संघर्षों की सम्भावनाओं से परिपूर्ण है तो यह पुराने 'स्टाइल' थोपा हुआ आशावाद नहीं होगा। पूँजीवाद के संकट का और गहरा होना तय है और उसी के साथ तय है प्रतिरोध का और तीखा होना। आइये उसके लिए तैयारियों में जुट जाएँ।
साभार -Red Tulips


