आइए मिलिए उस जिन्नाह से जिसने फिरंगी हुकूमत को बताया भगत सिंह कुचले जा रहे करोड़ो हिन्दुस्तानियों की बगावत की आवाज़ था
आइए मिलिए उस जिन्नाह से जिसने फिरंगी हुकूमत को बताया भगत सिंह कुचले जा रहे करोड़ो हिन्दुस्तानियों की बगावत की आवाज़ था
मुहम्मद अली जिन्ना उस सेंट्रल असेम्बली में मौजूद थे जिसमें भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने "बहरों को सुनाने के लिए" बम फेंका था.
बहरों के कानों पर बम बेकार साबित हुए।
जेल में भगत सिंह और उनके साथियों ने अपने साथ किये जा रहे अपमानजनक व्यवहार के खिलाफ भूख हडताल कर दी.
जबरदस्ती खाना खिलाने की हर सरकारी कोशिश नाकाम हो गई. क्रांतिकारियों की सेहत इतनी गिर गयी कि वे अदालत में पेश किये जाने लायक न रहे।
नियमों के अनुसार उनकी पेशी के बगैर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था।
सरकार ने सेन्ट्रल एसेम्बली में एक ऐसा संशोधन प्रस्ताव पेश किया, जिससे उसे कैदियों की गैरहाजिरी में ही मुकदमा चलाने का अख्तियार मिल जाए।
जिन्ना ने अपने धारदार भाषण से इस प्रस्ताव की धज्जियां उड़ा दीं। उनका विस्तृत भाषण तर्कों, प्रमाणों और उदाहरणों के अलावा तीखे बारीक व्यंग्य से चुना हुआ था।
उन्होंने सदन को और सत्ता को भी मजबूर कर दिया कि वे देखें कि भगत सिंह कोई साधारण अपराधी नहीं, बल्कि कुचले जा रहे करोड़ो हिन्दुस्तानियों की बगावत की आवाज़ था।
एक ही भाषण से उन्होंने सरकार को आतताई और मूर्ख दोनों साबित किया।
सरकारी प्रस्ताव नामंजूर हो गया।
मुकदमा चलाने के लिए सरकार ने अध्यादेश के जरिये एक ट्रिब्यूनल बनाया। इस ट्रिब्यूनल की उम्र केवल चार महीने थी। खत्म होने के महज छः दिन पहले इस ट्रिब्यूनल ने सुनवाई शुरू की।
जाहिर है, उसके पास न तो कुल साढ़े चार सौ गवाहों के बयान दर्ज करने का समय था, न भगत सिंह का पक्ष सुनने का।
इस तरह इस ट्रिब्यूनल ने फांसी की जो सजा सुनाई वह नैतिक और विधिक दोनों ही आधारों पर पूरी तरह खोखली थी।
पिछले साल इम्तियाज़ रशीद कुरैशी नाम के एक पाकिस्तानी नागरिक ने लाहौर हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया है कि भगतसिंह और साथियों को सुनाई गयी वह अवैध सजा निरस्त की जाये और उन्हें निर्दोष घोषित किया जाये।
(09 अगस्त 2014 की एक पोस्ट)
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