आईबी को बचाने के लिये खालिद की जाँच से भाग रही है सीबीआई - रिहाई मंच
आईबी को बचाने के लिये खालिद की जाँच से भाग रही है सीबीआई - रिहाई मंच
आतंकी घटनाओं में पाक साफ नहीं है सुरक्षा एजेन्सियों की भूमिका
सपा और संघ परिवार के बीच गठजोड़ का सबसे अच्छा उदाहरण है अस्थान काण्ड
तैंतीसवें दिन भी जारी रहा खालिद के हत्यारों की गिरफ्तारी के लिये रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना
लखनऊ 23 जून। खालिद मुजाहिद के हत्यारोपी पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी, निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर अमल करने और आतंकवाद के नाम पर कैद मुस्लिम बेगुनाह नौजवानों को छोड़ने की माँग को लेकर रिहाई मंच का अनिश्चित कालीन धरना आज तैंतीसवें दिन भी जारी रहा। आज क्रमिक उपवास पर मौलाना कमर सीतापुरी बैठे।
धरने को सम्बोधित करते हुये रिहाई मंच के अध्यक्ष मो. शुएब एडवोकेट ने कहा कि खालिद की हत्या के सम्बंध में उनके चचा जहीर आलम द्वारा मुकदमा थाना कोतवाली बाराबंकी में धारा 302 और 120 बी में दर्ज कराया गया है। जिस पर विवेचना का अधिकार पुलिस अथवा सीबीआई को है। यही एजेन्सियाँ न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत कर सकती हैं। फैजाबाद मजिस्ट्रेट द्वारा की जा रही जाँच या सरकार द्वारा गठित किसी जाँच कमेटी का कोई विधिक महत्व नहीं हैं क्योंकि वे अदालत में आरोपपत्र दाखिल नहीं कर सकते और न ही उन्हें साक्ष्य के रूप में कहीं पढ़ा जा सकता है।
रिहाई मंच इलाहाबाद के प्रभारी राघवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि केन्द्र सरकार के अधीन काम करने वाली सीबीआई और उत्तर प्रदेश की सपा हुकूमत दोनों जान बूझ कर खालिद की हत्या की जाँच सीबीआई से नहीं कराना चाहती हैं इसीलिये जहाँ उत्तर प्रदेश सरकार ने खालिद की हत्या से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज सीबीआई को नहीं भेजे तो वहीं सीबीआई ने खालिद की हत्या पर उठ रहे सवालों, जो साबित करते हैं कि खालिद की मौत प्राकृतिक नहीं बल्कि उत्पीड़न से हुयी है, को जानबूझ कर नजर अंदाज़ करते हुये अखबारों में बयान दे दिया कि खालिद की मौत प्राकृतिक है इसलिये वो जाँच नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकारें दोनों ही सीबीआई जाँच से इस लिये भाग रही हैं क्योंकि अगर जाँच हुयी तो सिर्फ खालिद की हत्या में ही नहीं बल्कि सूबे में हुयी तमाम आतंकी घटनाओं में खुफिया और सुरक्षा एजेन्सियों की भूमिका उजागर हो जायेगी।
धरने को सम्बोधित करते हुये रिहाई मंच आजमगढ़ के प्रभारी मसीउद्दीन संजरी ने कहा कि खालिद की हत्या की सीबीआई जाँच न कराने के पीछे सीबीआई द्वारा दिया गया यह तर्क कि सीबीआई के पास पहले से ही उत्तर प्रदेश से जुड़े घोटालों की जाँच का अम्बार लगा है, निहायत ही गैरजिम्मेदाराना है क्योंकि सीबीआई या किसी भी जाँच एजेन्सी के लिये यह कोई लिखित नियम नहीं है कि वह इस आधार पर जाँच करने से इन्कार कर दे कि उसके पास पहले से जाँच का बोझ है। उन्होंने कहा कि दरअसल सीबीआई यह नहीं चाहती कि जिस तरह इशरत जहाँ फर्जी मुठभेड़ मामले में उसे आई बी की भूमिका की पड़ताल करनी पड़ रही है कहीं उसी तरह खालिद की हत्या में भी आई बी अधिकारियों की भूमिका की जाँच करनी पड़ जाय और आई बी की भूमिका उजागर हो जाय।
धरने को सम्बोधित करते हुये वरिष्ठ साहित्यकार राजेश कुमार ने कहा कि खालिद की हत्या और सरकार उनकी हत्या में शामिल पुलिस अधिकारियों को जिस तरह बचाने की कोशिश कर रही है उससे साफ हो गया है कि आतंकी घटनाओं में सुरक्षा एजेन्सियों की भूमिका पाक साफ नहीं है। उन्होंने कहा कि आज साहित्यकारों और संस्कृति कर्मियों को अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों केा निभाते हुये आतंकवाद के नाम पर हो रही इस राजनीति को बेनकाब करना होगा।
धरने के समर्थन में आये अधिवक्ता असद हयात ने कहा कि आज तेईस जून को अस्थान काण्ड का एक साल पूरा हो गया। जहाँ आज ही के दिन भाजपा और सपा हुकूमत में मन्त्री रहे रघुराज प्रताप सिंह के गुण्डों ने मुसलमानों के बावन घर लूटे और जला दिये थे। लेकिन आज एक साल पूरे हो जाने के बावजूद आज तक उन्हे इंसाफ नहीं मिला। उन्होंने कहा कि असथान काण्ड सपा और संघ परिवार के बीच गठजोड़ का सबसे अच्छा उदाहरण है क्योंकि सपा की कथित सेकुलर सरकार ने विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया जो अस्थान काण्ड के दूसरे अग्निकाण्ड तेईस जुलाई 2012 का मुख्य मास्टरमाइण्ड है जिसको विवेचना में क्लीन चिट दिलवा दी और किसी भी पीड़ित मुस्लिम का बयान भी दर्ज नहीं किया। दूसरी तरफ एक दलित लड़की के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के झूठे आरोप में चार निर्दोष मुसलमान लड़कों को ब्नदी बनाया गया और उन पर गैंगस्टर भी लगाया गया जिससे सपा का साम्प्रदायिक चेहरा बेनकाब हो जाता है। इस पूरे काण्ड पर रिहाई मंच जल्द ही जाँच रिपोर्ट जारी करेगा।
धरने को सम्बोधित करते हुये कानपुर से आये इंडियन नेशनल लीग के नेता हफीज अहमद ने कहा कि सपा जैसी सियासी पार्टियाँ मुसलमानों की सियासी नासमझी का फायदा उठाकर मुसलमानों को बेवकूफ बनाती आयी हैं। खालिद की हत्या पर सरकार और सरकार के मुस्लिम मन्त्रियों का रवैया इसका ताजा उदाहरण है। उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि सपा की मुस्लिम विरोधी नीतियों से जनता को अवगत कराया जाय और खुद भी नये इंसाफ पसन्द और तरक्की पसन्द विकल्प के बतौर आवाम को खड़ा किया जाय।
इस अवसर पर मुस्लिम मजलिस के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष खालिद साबिर और जैद अहमद फारूकी ने कहा कि चाहे जिसकी भी सरकार हो उन सबमें इस मसले पर आम सहमति है कि मुसलमानों को किस तरह आतंकवादी साबित किया जाय। इसीलिये मायावती की हुकूमत में जो निर्दोष बच्चे आतंकवाद के नाम पर पकड़े गये उन्हे सपा हुकूमत भी नहीं छोड़ रही है। साथ ही बसपा हुकूमत में इन बच्चों को फँसाने वाले अधिकारियों को मलाईदार ओहदे भी सपा सरकार दे रही है।
धरने को सोशलिस्ट फ्रंट के मो0 आफाक, भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोइद अहमद, शुऐब, आजमगढ़ रिहाई मंच के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी, इलाहाबाद रिहाई मंच के प्रभारी राघवेन्द्र प्रताप सिंह, शिबली बेग पूर्व सासद इलियास आजमी, राजेश कुमार, शहजादे मंसूर, मो यूनुस मुस्लिम मजलिस के जैद अहमद फारुकी, मौलाना कमर सीतापुरी, हरेराम मिश्रा, जुबैर जौनपुरी, फैज, शाहनवाज आलम और राजीव यादव आदि शामिल हुये।


