खालिद के इंसाफ की लड़ाई में उतरी महिलायें- रिहाई मंच
गोरखपुर बम धमाका काण्ड की पुनर्विवेचना आवश्यक- रिहाई मंच

कल रिहाई मंच जारी करेगा गोरखपुर बम धमाका काण्ड की विवेचना पर रिपोर्ट
क्रमिक उपवास पर आज बैठी मल्लिका शोएब, रशीदा और नाजिया
खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस व आईबी अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिये पैतीसवें दिन भी विधान सभा लखनऊ पर जारी रहा रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना
लखनऊ, 25 जून। खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी, निमेष आयोग की रिपोर्ट पर तत्काल अमल करने और आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को छोड़ने की माँग के साथ चल रहा रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना आज 35वें दिन भी जारी रहा जिसमें खास तौर से महिलाओं ने भागीदारी की। आज क्रमिक उपवास पर मल्लिका शोएब, रशीदा और नाजिया बैठीं। इस दौरान धरने में शामिल लोगों ने बाहों पर काली पट्टी बाँधकर 1975 में आज के ही दिन इंदिरा गाँधी द्वारा लगाये गये आपातकाल को भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास का काला दिवस बताया। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि सपा सरकार ने सूबे में आज जो हालात पैदा किये हैं, वह 1975 के आपातकाल की याद को ताजा कर देता है।

रिहाई मंच के प्रवक्ताओं ने कहा कि सरकार द्वारा मुकदमा वापसी के सम्बंध में जो प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया है उससे हम सहमत नहीं हैं क्योंकि उसमें सम्पूर्ण तथ्यों का उल्लेख नहीं है। सरकार द्वारा बेगुनाहों की रिहाई को लेकर जिस प्रकार से न्यायालय के समक्ष कार्यवाही की जा रही है वह दोषपूर्ण है। उचित यह था कि गोरखपुर काण्ड की पुनर्विवेचना के आदेश किसी अन्य एजेन्सी द्वारा कराये जाने के आदेश दिये जाते जो उन सभी तथ्यों और साक्ष्यों की पड़ताल करती जिनके आधार पर यह साबित होता है कि अभी तक की गयी विवेचना दोष पूर्ण है, जिसमें न केवल तारिक कासमी बल्कि अन्य को भी झूठा फँसाया गया है। इस सम्बन्ध में रिहाई मंच गोरखपुर बम धमाका काण्ड की विवेचना पर रिपोर्ट जारी करेगा जिसमें हिन्दुत्ववादी संगठनों की संलिप्तता रही है।

धरने को सम्बोधित करते हुये अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (एपवा) की प्रदेश अध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि ये लड़ाई सिर्फ खालिद मुजाहिद की नहीं, बल्कि बेगुनाह किसानों, मुसलमानों, मजदूरों व आदिवासियों की भी है क्योंकि यह लड़ाई उन हुकूमतों और खुफिया एजेन्सियों के खिलाफ है जो देश के अल्पसंख्यकों और वंचित तबकों को आतंकवादी और माओवादी बताकर जनसंहार कराती हैं ताकि जनविरोधी और फासिस्ट साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया पर कब्जा जमाये रहें। उन्होंने कहा कि खालिद मुजाहिद की हत्या या इनके जैसे मुस्लिम नौजवानों की आतंकवादी बताकर की जा रही हत्यायें इस बात की गवाह बन गयी हैं कि हमारी सरकारें किस हद तक अमेरिकी साम्राज्यवाद के एजेण्डे को बढ़ाने की वाहक बन गयी हैं। उन्होंने कहा कि खालिद की हत्या के खिलाफ चल रहा यह आन्दोलन सिर्फ खालिद के हत्यारे पुलिस अधिकारियों को जेल भेजवाने का ही नहीं, बल्कि आतंकवाद के नाम पर की जा रही मुस्लिम विरोधी राजनीति को भी बेनकाब कर रहा है। ताहिरा हसन ने कहा कि रिहाई मंच शुरू से कहता रहा है कि आतंकवाद से निबटने के नाम पर की जा रही मुसलमानों की हत्याओं में खुफिया एजेन्सियों की भूमिका भी रही है जिसको आज इशरत जहाँ फर्जी मुठभेड़ मामले में न्यायालय तक कहने लगा है और वह दिन दूर नहीं है जब इशरत जहाँ की हत्या में शामिल आईबी के वरिष्ठ अधिकारी राजेंद्र कुमार जेल की सलाखों के पीछे होंगे। ताहिरा हसन ने कहा कि उनका संगठन राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद की घटनाओं में खुफिया एजेन्सियों की भूमिका की जाँच के लिये समाज में जनजागरण करेगा।

धरने के समर्थन में आई एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एण्ड लीगल इनीशिएटिव (आली) की प्रतिनिधि और अधिवक्ता रिशा सैय्यद ने कहा कि आतंकवाद के मामलों में बन्द मुस्लिम नौजवान जिस तरह 15-15 साल बाद बेगुनाह साबित होकर छूट रहे हैं या छूटने के दहलीज तक पहुँच जाने वाले खालिद मुजाहिद की हत्या यह साबित करती है कि देश में आतंकवाद के नाम पर पिछले बीस साल से जो राजनीति चल रही है, उसका मकसद सिर्फ मुसलमानों को बदनाम करना है। खालिद की हत्या की जाँच पर सरकार के रुख पर टिप्पणी करते हुये अधिवक्ता रिशा सैय्यद ने कहा कि जिस तरह खालिद की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को बिना देखे उन्होंने कह दिया कि खालिद की मौत स्वभाविक है, उससे साबित हो जाता है कि सरकार की तरफ से जो भी जाँच करवायी जा रही है, उसमें खालिद की हत्या को स्वाभाविक मौत बताया जायेगा और हो सकता है हफ्ते दस दिन में ऐसी कोई रिपोर्ट सरकार जारी कर दे लेकिन अखिलेश यादव को यह नहीं भूलना चाहिये कि खालिद के जिश्म पर जख्म के निशान, उनके कान और नाक से बहते खून के धब्बों के निशान, खून से सनी हुयी चादर और जो केस प्रॉपर्टी हैं, उनको गायब करने को पूरी दुनिया ने देखा है और सच्चाई से वाकिफ है। लिहाजा सरकार की इज्जत बचाने के लिये यही होगा कि सरकार इस पूरे मामले की सीबीआई जाँच कराये, वरना 2014 में सपा का काम तमाम हो जायेगा।

धरने को सम्बोधित करते हुये महिला नेता आइशा सिद्दीकी और अम्मारा फारुकी ने कहा कि आतंकवाद के नाम पर जो बेकसूर नौजवान पकड़े गये हैं उनके परिवार में महिलायें, बच्चे और बूढ़े सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। कई ऐसे उदाहरण हैं जहाँ मानसिक तनाव न झेल पाने के कारण कई लोगों की मृत्यु भी हो चुकी है। बच्चों की मानसिक स्थिति और शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। मासूम बच्चों के सवाल बार-बार महिलाओं के जख्म को ताजा करते हैं। समाचार माध्यमों के द्वारा किये जाने वाले कुप्रचार उन जख्मों पर नमक का काम करते हैं। ऐसे में रिहाई मंच द्वारा इस विषय पर किया जाने वाले आन्दोलन उनके लिये आशा की एक उम्मीद बनकर सामने आया है। आज जिस तरह से महिलाओं ने बाहर निकल कर इस धरने का समर्थन किया है, वह आगे भी जारी रहेगा।

धरने को सम्बोधित करते हुये सपा हुकूमत में सीतापुर से आतंकवादी होने के आरोप में पकड़े गये मोहम्मद शकील और बसीर हसन के परिवार से आये सालिहा खातून और रुखसाना खातून ने कहा कि समाजवादी पार्टी ने विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों को छोड़ दिया जायेगा लेकिन हमारे परिजन को इसी हुकूमत में पकड़ा गया और सपा के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी से मिलने के बावजूद हमें सिर्फ आश्वासन दिया गया जिससे सरकार का झूठ बेकनाब हो जाता है कि वह मुसलमानों की हमदर्द है। महिलाओं ने कहा कि यही दो शख्स घर में कमाने वाले थे। उनको फँसा दिये जाने के बाद आज हमारे घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गयी है। इसलिये हम लोगों ने तय किया है कि अब इस वादाखिलाफ पार्टी को 2014 में सबक सिखाया जायेगा।

इस मौके पर मशहूर समाजसेविका मल्लिका शोएब ने कहा कि सरकार ने निमेष आयोग की रिपोर्ट को कैबिनेट में मंजूरी तो दे दी लेकिन साथ में एक्शन टेकेन रिपोर्ट न लाकर विधानसभा के पटल पर रिपोर्ट को रखने तक इसे टाल दिया जबकि ऐसी कोई वैधानिक रुकावट नहीं थी। अब ये सरकार विधानसभा सत्र समय पर न बुलाकर अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को दबाने के लिये अपने दलाल उलेमाओं और पार्टी के मुस्लिम चेहरों को और समय देना चाहती है। लेकिन सरकार की ये चाल कामयाब नहीं होने वाली है। अवाम अब सपा के असली चेहरे को पहचान चुकी है। उन्होंने सवाल किया कि मुसलमानों से जुड़ी घटनाओं पर छुट्टी की घोषणा करके उन्हें खुश करने का नाटक करने वाली ये सरकार विधानसभा सत्र को रमजान के महीने में क्यों चलाना चाहती है।

आली की नीतिका विश्वनाथ, सुभांगी सिंह, स्नेहा और स्वाति त्रिपाठी ने कहा कि आली ने अपना प्रतिनिधित्व मंडल आजमगढ़ समेत कई ऐसे जनपदों में भेजे हैं जहाँ आतंकवाद के नाम पर कई गिरफ्तारियाँ हुयी हैं। हमारी तहकीकात में जो बात सामने आयी है, वह एक सभ्य समाज के लिये अत्यन्त दुःखद है। कई घरों में बूढ़ी औरतें हाइपरटेंशन और डाइबिटीज जैसी बीमारियों की शिकार हो गयी हैं। कई महिलाओं का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।

धरने का संचालन रिहाई मंच के नेता हरे राम मिश्र ने किया। धरने को आइसा की सीमा, आमिना खातून, सूबिया खान, रागिनी सिंह, राजनंदिनी सिंह, मो0 नईम सबा, प्रगतिशील लेखक संघ के शकील, नेशनल पीश फेडरेशन इसराउल्ला सिद्दिकी, सोशलिस्ट फ्रंट के मो0 आफाक, शुएब, जैद अहमद फारुकी, एसएफआई के अरुण शाहिल, आजमगढ़ रिहाई मंच के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी, शिवदास प्रजापति, योगेन्द्र सिंह यादव, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, अंकित चौधरी, भंते विजयशील, मौलाना कमर सीतापुरी, पिछड़ा महासभा के एहसानुल हक मलिक, शिवनारायण कुशवाहा भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोइद अहमद, फैजान मुसन्ना, दिनेश सिंह, फैज, शाहनवाज आलम आदि शामिल हुये।