इन सवालों के जवाब भी दीजिये पीएम साहब!
इन सवालों के जवाब भी दीजिये पीएम साहब!
चन्दन राय,
लाचार हूँ, पर इस्तीफा नहीं दूंगा
उतना दोषी नहीं, जितना दिखाया गया
एक मजबूत देश का लाचार प्रधानमंत्री। जिसे सरकार में हो रहे घोटालों की भी
जानकारी नहीं। कैग रिपोर्ट के बाद सहयोगियों की कारगुजारी का पता चलता हो।
सवाल है कि पीएम को संपादक वार्ता की जरूरत ही क्यों पडी? दूसरा, अगर इतने
लाचार हैं, तो इस्तीफा क्यों नहीं दे देते? क्या पीएम महोदय जवाब देंगे...
प्रधानमंत्री की लाचारगी देखकर सचमुच देशवासियों को उन पर तरस ही आ रहा
था। दरअसल, वे कांग्रेस के लिए ऐसी ढाल साबित हो रहे हैं, जिनकी आड़
में तमाम गुनाहों को छिपाया जा सके। देश में पहली ऐसी सरकार बनाने का
गौरव उन्हें हासिल है, जिसके समय में इतने घोटाले सामने आए हों। विपक्ष
का लगातार हमला जारी है। संसद नहीं चलने देने की धमकी भी दी जा रही है।
यही कारण है कि पीएम को आगे कर मैडम सोनिया ने सरकार की विश्वसनीयता
बरकरार रखने की असफल कोशिश की है। जनता इसे प्रधानमंत्री की मासूमियत
नहीं, बेचारगी ही समझ रही है और वो भी सरकार बचाने की। गठबंधन सरकार
तो दूसरे राज्यों में भी चल रही हैं, लेकिन वहां मुखिया कभी इतना लाचार
नहीं दिखा। अगर सहयोगियों के आगे समर्पण ही करना हो, तो फिर सरकार की
जरूरत किसे है? क्यों ना मध्यावधि चुनाव हो जाए और जनता तय करे कि मजबूत
निर्णय लेने वाले और सहयोगियों पर नियंत्रण रखने वाले मुखिया के
हाथों बागडोर सौंपी जाए।
पीएम कहते हैं कि द्रमुक ने मंत्री पद के लिए दो नाम सुझाए थे . लोग जानना
चाहते हैं कि सरकार कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही है या द्रमुक के। क्या
पीएम को इतना भी अधिकार नहीं कि वे मनपसंद मंत्रियों की टीम खड़ी कर
सकें? अगर दो लोगों को मंत्रिपद देना था, तो नाम तय करने का अधिकार तो
पीएम के पास ही था। गठबंधन सरकार की दुहाई देकर गुनाहों को नहीं
छुपाया जा सकता। देश की जनता इतनी भोली नहीं कि प्रधानमंत्री की मासूमियत
पर फिदा हो जाए। वे पीएम को इतना लाचार देखकर आक्रोश में होंगे कि
क्यों उन्होंने एक बेचा को चुना, जो मंत्रियों के विभाग तय करने का अधिकार
तक नहीं रखता। क्या पांच साल तक सरकार का चलते रहना इतना जरूरी है कि तमाम घोटालोबाजों को भी साथ लेकर चला जाए।
पीएम का दूसरा बयान भी चौंकाने वाला है, वो कहते हैं कि उन्होंने कभी
अंतरिक्ष विभाग के काम में हस्तक्षेप नहीं किया। सवाल उठता है कि अगर नहीं
किया, तो गलती किसकी है? जब संयुक्त परिवार का मुखिया कहे कि उसे
निर्णयों के बारे में जानकारी ही नहीं थी, तो जरा बताइए, फिर आप ऐसे
जिम्मेदार पद पर बैठे ही क्यों? करोड़ों -अरबों के सौदे हुए और पीएम को इसकी
जानकारी तक नहीं दी गई। दो ही कारण हो सकते हैं, या तो उन्होंने रुचि
नहीं ली, या फिर अपने लोगों पर ज्यादा विश्वास कर लिया। दोनों मामलों में
तो देश की जनता ही छली गई। आम लोगों के पैसे का हेर-फेर किया गया।
महात्मा गांधी सार्वजनिक संपत्ति के दुरुपयोग को देश के लिए सबसे बड़ी गद्दारी मानते थे ? क्या संयुक्त परिवार के मुखिया इस बात से सहमत हैं?
पीएम का कहना है कि वे अभी इस्तीफा देने के बारे में नहीं सोच रहे। उनके
मुताबिक, मुझे अपनी जिम्मेदारी का एहसास है। पीएम महोदय, अगर एहसास है, तो फिर आपको मुखिया होने के नाते सहयोगियों के कुकृत्यों की भी जिम्मेदारी
लेनी होगी। वे कहते हैं कि वे उतने बड़े गुनहगार नहीं, जितना कि दिखाया
जा रहा है, तो पीएम महोदय ही बताएं कि कौन है इन घोटालों के लिए
जिम्मेदार?
ए राजा ने अगर पारदर्शिता का भरोसा दिलाया, तो आपने विश्वास किया ही
क्यों? जब जनता के करोड़ों रुपए दांव पर लगे थे, तो आपने रुचि क्यों नहीं
ली? ये बात तो जाने ही दें कि क्यों ए राजा को दूरसंचार मंत्री बनाया गया?
हालांकि इसके लिए भी आपकी जिम्मेदारी बनती है? गठबंधन धर्म निभाने की
मजबूरी थी या फिर सरकार बचाए रखने की- इसका जबाव तो आपको ही देना
होगा। केवल भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई की बात करते रहने से ही अब जनता
नहीं माननेवाली। सचमुच सरकार को र्कावाई करते हुए दिखना होगा। विपक्ष
का रवैया चाहे जो हो, लेकिन उसे चिल्लाने के लिए प्लेटफॉर्म तो आपने ही
उपलब्ध कराया ना। अब जो नंबर जनता को देना था, वो भी आपने ही दे दिया।
अगर दस में से सात फैसले सही करते, तो फिर जनता महंगाई, बेरोजगारी,
गरीबी के बोझ तले दबी क्यों होती?
जनता चाहती है कि गठबंधन धर्म की आड़ में गुनाहों को न छुपाए सरकार। वह
जानती है कि अगर बजट सत्र चलाने की मजबूरी न होती, या आनेवाले पांच
राज्यों के चुनाव न होते, तो शायद पीएम भी सात रेस कोर्स में टेलीविजन के
संपादकों को न्योता देने पर मजबूर न होते।
लेखक युवा पत्रकार हैं, फिलहाल हिन्दी दैनिक स्वाभिमान टाइम्स में वरिष्ठ उप सम्पादक हैं.


