इरोम शर्मिला आप हारीं तो अकेले नहीं हारेंगीं
इरोम शर्मिला आप हारीं तो अकेले नहीं हारेंगीं
इरोम शर्मिला-असंवेदनशील सरकारों के दौर में अनशन प्रतिरोध के हथियार के रूप में असफल हो चुका है? जे एन यू से मणिपुर तक लगता तो यही है।
अशोक कुमार पाण्डेय
इरोम शर्मिला का अनशन ख़त्म करना उनका निजी फैसला है। पर प्रतीक बन चुके किसी व्यक्ति का कोई फ़ैसला निजी फ़ैसला मात्र होता है?
उनका संघर्ष, उनकी जिजीविषा, उनका समर्पण पिछले पन्द्रह सालों से सम्माननीय रहा है, रहेगा ताउम्र।
मेरे सवाल दूसरे हैं। उनसे (इरोम शर्मिला से) ज़्यादा ख़ुद से हैं।
अनशन भारत के राजनीतिक इतिहास में गाँधी लेकर आये थे। सामाजिक जीवन में पहले से था। एक उदाहरण दूँ कि कश्मीर में पंडित अपने सामाजिक अधिकारों पर आँच आने पर अनशन पर बैठ जाते थे और तब तक बैठे रहते थे जब तक उनकी बात मान न ली जाए। ब्रह्म हत्या का पाप कौन लेता ...तो अक्सर सफ़ल होता था।
कैकेयी का कोप भवन भी एक अनशन ही था। पर दशरथ के प्रेम या राजा के भय के बिना इन अहिंसक प्रतिरोधों का क्या हश्र होना था। गाँधी नहीं सबसे लंबा अनशन जतिन बाबू ने किया था और शहीद हुए दो महीने से अधिक अनशन के बाद। कोई अँगरेज़ उनका अनशन तुड़वाने नहीं आया।
सत्ताएं अपने शत्रु भी खुद चुनती हैं।
इन सोलह सालों में सरकारें बदलीं पर इरोम के प्रति रुख नहीं बदला। अन्ना हीरो हो गए। केजरीवाल तख़्तनशीं हो गए पर इरोम दिल्ली आईं तो भी ख़ाली हाथ लौटीं, मणिपुर तो कोई क्या जाता। यह आफ्सपा हटाने की उनकी माँग का जवाब था सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा।
तमाम मनोरमाएं दमन की चक्की में पिसती रहीं, आफ़्सपा बदस्तूर जारी है।
असंवेदनशील सरकारों के दौर में अनशन प्रतिरोध के हथियार के रूप में असफल हो चुका है? जे एन यू से मणिपुर तक लगता तो यही है। लोकतन्त्र ने अपनी उदारता की सीमाएं बहुत स्पष्ट खींच दी हैं। ऐसे में इरोम शर्मिला का यह संघर्ष मुझे असफल ही लग रहा है। नहीं जानता उनकी राजनीतिक समझ क्या है। गांधीवादी तो वह हैं, कृष्ण भक्त हैं, उनकी कविताएँ एक भावुक स्त्री की कवितायेँ हैं, यह निर्णय भावुकता से उपजा है, हताशा से या फिर किसी नए संकल्प से यह देखना होगा।
मेरा तो मानना है यह निर्णय कम से कम पांच साल पहले ले लेना था।
खैर, जो युद्धभूमि में है निर्णय वही लेगा। जानता भी वही है अधिक। हम ड्राइंगरूम कलमघसीटों का क्या कुछ भी लिख सकते हैं। तो शुभकामनाएं उन्हें। ढेरों सलाम और बस बहुत अदब से इतना सा कहना है, इरोम अब आप प्रतीक है आफ़्सपा के ख़िलाफ़ संघर्ष की। आप हारीं तो अकेले नहीं हारेंगीं।


