राम प्रकाश अनन्त

उत्तराखण्ड में बाढ़ ने जीवन तहस-नहस कर दिया है।केदार घाटी बारिश और बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुयी है। मित्रो से मिली जानकारी के मुताबिक़ उत्तराखण्ड में बेहद दर्दनाक मंज़र है। हज़ारों लोग लापता हैं। कितनी जानें गयी होंगी कुछ भी नहीं कहा जा सकता। मैं 2007-2008 में करीब डेढ़ साल गौरी कुंड में रहा। हादसे क्यों घटते हैं और कैसे घटते हैं उसका एक उदाहरण मैं देता हूँ।

अगस्त 2008 में गौरी कुंड अस्पताल के निचले हिस्से में शॉर्ट सर्किट से भयंकर आग लगी। यह अगस्त का महीना था इसलिये कोई कैसुअल्टी नहीं हुयी। अगर मई-जून होता तो पचास-सौ लोग इस घटना में मारे गये होते। मई-जून में गौरी कुंड में पैर रखने की जगह नहीं होती। जिसे जहां जगह मिलती है वहीं सो जाता है। अस्पताल भी गैलरी से लेकर चबूतरे तक पूरा भरा रहता है। मुख्य चिकित्साधिकारी को कई बार लिखा था कि अस्पताल में एमसीबी खराब है और यहाँ कभी भी हादसा हो सकता है। एक दिन स्वास्थ्य निरीक्षक गौरी कुंड आये हुये थे, केदार नाथ में जो साथी कार्यरत था उसने उनसे कहा कि वे स्वास्थ्य मन्त्री वाला पैसा निकलवा दें। दरअस्ल पिछले साल जब केदारनाथ के पट खुले थे तब तत्कालीन स्वास्थ्य मन्त्री निशंक भी आये थे और केदारनाथ में तैनात उस साथी ने उनकी टीम का खाने पीने का खर्च उठाया था। स्वास्थ्य निरीक्षक ने मुझे गुडविल में यह बात बतायी कि स्वास्थ्य मन्त्री का रुद्रप्रयाग से केदार नाथ का खर्च मुख्य चिकित्साधिकारी ने उठाया था और उसमें करीब एक लाख खर्च हुआ है। पता नहीं मुख्य चिकित्साधिकारी ने उसे सरकारी खजाने से कैसे एडजस्ट किया होगा। कितनी अजीब बात है कि मुख्य चिकित्साधिकारी पाँच सौ-हज़ार रु. के पीछे पचास-सौ लोगों की जान जाने जैसे हादसे की भी परवाह नहीं करता और स्वास्थ्य मन्त्री की सौ किलोमीटर की यात्रा पर एक लाख खर्च कर देता है। दरअसल शासन-प्रशासन का यही रवैया है जो आपको हर जगह दिखाई देगा ।

उत्तराखण्ड में विकास के नाम पर जो कुछ हो रहा है, आज के विनाश में उसका भी बहुत कुछ हाथ है। टेहरी में भारत का सबसे ऊँचा बाँध (260 मीटर) बाँध बनाया गया है जिसमें एक सौ पच्चीस गाँव डूब गये। अभी उत्तराखण्ड में करीब पाँच सौ बिजली परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इन परियोजनाओं के अनुसार पहाड़ों में अन्दर सुरंगें बनायी जा रही हैं, उनमें टर्बाइन चलाने के लिये नदियों का पानी छोड़ा जायेगा। जब मैं गौरीकुंड में था उस समय इन पर काम चल रहा था। सुरंगें बनाने के लिये डाईनामाईट से विस्फोट किये जाते थे उसकी भयंकर आवाजें देर तक केदार घाटी में गूँजती रहती थीं। गुप्त काशी के कई मकानों में दरारें पड़ गयी थीं।

मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि विकास नहीं होना चाहिये। उत्तराखण्ड बेहद खूबसूरत और पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। अगर यहाँ पर्यावरण असन्तुलित किया जायेगा तो उसका असर पूरे देश पर पड़ेगा। इसलिये कुछ भी करने से पहले काफी विचार करने की ज़रूरत है। अगर सरकार के पास कोई योजना है तो पहले उसे पर्यावरणविद व तकनीक विशेषज्ञों के साथ मिल कर उसके हर पहलू पर अध्ययन कराना चाहिये, गम्भीर विचार-विमर्श करने के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिये। पर ऐसा नहीं होता है। सरकारें अध्ययन कराना तो दूर उनकी बात को सुनती तक नहीं हैं। पिछली सरकार के एक मन्त्री ने विधान सभा में कहा था- अभी आप एक पेड़ काटेंगे तो सुन्दर लाल बहुगुणा आ जायेंगे। यह बात उन्होंने दो बार कही थी और इसके लिये उनकी काफी आलोचना हुयी थी। तो यह है हमारी सरकारों का रवैया।

ऊपर मैंने अस्पताल में घटी घटना और मुख्य चिकित्साधिकारी का ज़िक्र किया है, उसका तात्पर्य यह बताना था कि शासन और प्रशासन का दृष्टिकोण अपनी कमीशनखोरी और पूँजीपतियों के हित से नियन्त्रित होता है। बिजली चाहिये और फ़टाफ़ट चाहिये ।उसके लिये पहाड़ों को डाइनामाईट से उड़ाना पडेगा कोई बात नहीं हम उडायेंगे। उन्हें तहस-नहस करना पड़ेगा,हम करेंगे पर तुम्हें फ़टाफ़ट बिजली देंगे। हमारे पास इतना वक़्त नहीं है कि हम यह सोचें कि बेहतर विकल्प क्या हो सकता है। बिजली किसे चाहिये? इतनी बिजली बन रही है वह कहाँ जा रही है ? किसानों की फसलें सूख जाती हैं गाँवों में कई-कई दिन तक बिजली नहीं आती। कारखानों में कभी बिजली नहीं जाती। शहरों में पॉश इलाक़ों की तुलना स्लम कॉलोनियों से करें फिर सोचें किसे बिजली चाहिये। कोयला घोटाले में काँग्रेस कहती है पूँजीपतियों को कारखाने चलाने के लिये बिजली की ज़रूरत थी इसलिये उसने ओने पौने में कोयला लुटा दिया। भाजपा कहती है कोयला तो अभी खदानों में पड़ा है सरकार ने उसे फ़टाफ़ट कारखानों तक क्यों नहीं पहुँचाया। सभी पार्टियाँ देश का विकास करना चाहती हैं। विकास के लिये चौबीस घण्टे कारखानों का चलते रहना ज़रूरी है और उसके लिये बिजली बहुत ज़रूरी है। उसके लिये सरकारों को जो करना पड़ेगा, वे करेंगी। भले ही वह आम जनता का विनाश ही क्यों न हो।

राजस्थान में पानी का बेतहाशा दोहन करने वाली और उसके लिये कोर्ट तक से फटकार खाने वाली कम्पनी कोको कोला ने देहरादून की विकासनगर तहसील में एक विसाल प्लांट डाला है। इससे पानी के दोहन के अलावा प्लांट से निकलने वाला अपशिष्ट पहाड़ों पर क्या असर डालेगा इसकी परवाह किसे है। 2008 में पर्यावरणविदों की एक रिपोर्ट आयी थी जिसमें गोमुख पर भारी मात्रा में पहुँचने वाले कावड़ियों पर चिन्ता व्यक्त की गयी थी और बताया गया था कि इससे ग्लेशियर पर बुरा असर पड़ रहा है। गोमुख में अधिक मानवीय आवाजाही पर रोक लगाने की सिफारिश की गयी थी। पर उनकी कौन सुनता है। सरकारें वहाँ की भोलीभाली जनता में हमारी देव भूमि जैसी जड़ बातों का प्रचार कर रही हैं। वहाँ के लोगों के कठिन जीवन की ज़िम्मेवारियों से तो सरकारें भागती हैं और उनके अन्दर ऐसे घटिया विचारों का प्रचार करती हैं।

चार धाम यात्रा का इतना अधिक प्रचार किया जा रहा है कि हर साल लाखों लोगों की भीड़ बढ़ जाती है। अकेले केदारनाथ में मई=जून के महीने में पच्चीस-तीस हज़ार मज़दूर यात्रियों की डोली ढोने और खच्चर चलाने का काम करते हैं। साढ़े तीन हज़ार मीटर की ऊँचाई पर छः महीने तक आठ दस लाख लोग और चार-पाँच हज़ार खच्चर वहाँ ग़दर मचायेंगे उससे क्या वहाँ के पर्यावरण पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा ? लेकिन इन सब की किसे चिन्ता है।