पुण्यतिथि है राजकपूर की
सुनील दत्ता
“ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना, ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना।” प्रकृति के सौन्दर्य बोध के साथ ही साथ उसके इन्द्रधनुषी रंगों की छटाओं को उसके कायनात के साथ ही उसके भिन्न- भिन्न पक्षों पर एक नन्हा सा मासूम अपनी आँखों में बचपन से ही सवारे था वो जाते हुए भी उन्ही रंगों में खोया- खोया सा रहता और आँखे बंद करके नींद में भी वो उन्हीं रंगों को सजाये कल्पनाओं की दुनिया में उड़ने लगता। 14 दिसम्बर 1924 को पेशावर में पृथ्वीराज कपूर के घर जन्म लेता है एक कोहिनूर, जो सम्वेदनाओं, संस्कृति, साहित्य में रचा बसा। जिसका नाम रखते हैं- राजकपूर। राजकपूर मैट्रिक परीक्षा में एक विषय में फेल हो गये उन्होंने अपने पिता से कहा कि अब मैं पढ़ूँगा नहीं मैं फिल्मो में काम करना चाहता हूँ | राजकपूर ने अपने पिता से कहा कि मैं अभिनेता बनना चाहता हूँ, जिन्दगी की राहें तो राजकपूर को बुला रही थीं। अपने पिता से सहमति मिलने के बाद राजकपूर फ़िल्मी दुनिया से जुड़ गये | पृथ्वीराज कपूर ने राजकपूर को केदार शर्मा की यूनिट में क्लैपर बॉय के रूप में काम करने की सलाह दी | राजकपूर ने भारतीय सिनेमा में बाल कलाकार के रूप 1939 में फिल्म इन्कलाब में काम किया था | जो जगत बाहर है उसकी खोज; जो अज्ञात है जो अनजान है उसे जन लेने की यात्रा पर निकल पड़े राजकपूर। वो जो अज्ञात है उसे जान लेने के लिए राजकपूर फिल्म के शूटिंग के समय वह अक्सर आईने के सामने चले जाते थे और अपने बालों में कंघी करने लगते थे | कैलेप देते समय इस कोशिश में रहते कि किसी तरह उनका भी चेहरा कैमरे के सामने आ जाए | एक बार फिल्म " विषकन्या" की शूटिंग के दौरान राजकपूर का चेहरा कैमरे के सामने आ गया और हड़बड़ाहट में चरित्र अभिनेता की दाढ़ी कैलेप बोर्ड में उलझकर निकल गयी | लोगों का कहना है कि केदार शर्मा ने राजकपूर को अपने पास बुलाकर जोर से थप्पड़ लगाया | हालाँकि केदार शर्मा को इसका अफ़सोस रात भर रहा | अगले दिन उन्होंने अपनी नयी फिल्म "नीलकमल" के लिए राजकपूर को साइन कर लिया | राजकपूर अपने फिल्मों के साथ नया कुछ कर गुजरने की चाह रखते थे। वर्ष 1948 में उन्होंने आर. के. फिल्म्स की स्थापना की और फिल्म आग का निर्माण किया | वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म " आवारा" ने राजकपूर को बतौर अभिनेता स्थापित कर दिया भारतीय फिल्म इतिहास में "आवारा हूँ आसमान का तारा हूँ" | फिल्म की सफलता ने राजकपूर को देश- विदेश में लोकप्रिय बना दिया | राजकपूर के साइन करियर में उनको सबसे सफल जोड़ी नर्गिस के साथ रही। दोनों सबसे पहले 1948 में फिल्म "बरसात" में नजर आये इसके बाद 'अंदाज़' जान - पहचान ' आवारा' अनहोनी, आशियाना, अम्बर, आह, धुन, पापी, श्री चार सौ बीस, जागते रहो और चोरी- चोरी जैसी बहुत सी फिल्मों में उन लोगों ने साथ- साथ काम किये | याद आती है श्री चार सौ बीस की जिसमें बारिश में एक छाते के नीचे फिल्माए गये गीत "प्यार हुआ इकरार हुआ' में नर्गिस और राजकपूर के प्रेम प्रसंग के अविस्मर्णीय दृश्य को सिनेमा के दर्शक शायद ही भूल पाए | उनकी सहजता इसी बात से लगाई जाती है जब वो बोल पड़ते हैं "मेरा जूता है जापानी मेरा पैन्ट इंग्लिशतानी सर पर लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी"। राजकपूर जी ने अपनी बनाई फिल्मों के माध्यम से नयी प्रतिभाओं को उचित स्थान दिया, इनमें संगीतकार शंकर- जयकिशन, गीतकार नौशाद, हसरत जयपुरी और गायक मुकेश इसके साथ ही उनके प्रिय कविराज शैलेन्द्र को | वर्ष 1949 में राजकपूर निर्मित फिल्म 'बरसात' के जरिये राजकपूर ने शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी और संगीतकार के रूप में शंकर- जयकिशन को अपना कैरियर शुरुआत करने का मौक़ा दिया | वर्ष1970 में राजकपूर ने फिल्म 'मेरा नाम जोकर' बनाया। मेरा नाम जोकर में राजकपूर ने जीवन के फलसफे को बड़े बेहतरीन तरीके से पेश किया पर दुर्भाग्य इस देश की आवाम उस फिल्म को समझ न सकी और वो फिल्म बुरी तरह पिट गयी | इस फिल्म को लेकर राजकपूर को बड़ी आशायें थीं वो टूट गयी | उन्हें काफी आर्थिक नुक्सान भी हुआ | राजकपूर ने अपने फ़िल्मी कैरियर में मान- सम्मान बहुत पाए | वर्ष 1985 में राजकपूर निर्देशित अंतिम फिल्म "राम तेरी गंगा मैली" बनाई। इसके बाद राजकपूर अपनी महत्वाकाक्षी फिल्म 'हिना' के निर्माण में व्यस्त हो गये लेकिन उनका यह सपना साकर नहीं हुआ, उस फिल्म को बाद में अन्य लोगों ने पूरा किया | 2 जून 1988 को इस सिनेमा के कैनवास का जादूगर हमेशा के लिए यह कहते हुए सो गया " एक दिन बिक जायेगा माटी के मोल जग में रह जायेंगे प्यारे तेरे बोल"।
सुनील दत्ता, लेखक स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक हैं। हस्तक्षेप टीम के सदस्य हैं।