उमेश चतुर्वेदी
किस्मत ने राजनीतिक रिपोर्टिंग का लम्बा मौका नहीं दिया। सिर्फ दस साल। उसमें से भी कई साल तो बचपने में गुजर गए। लेकिन लालू के जेल जाने के बाद रिपोर्टिंग के दौरान देखी कुछ घटनाएं याद आ रही हैं। 1995 के जाड़ों की एक सुबह। तब मैं एक अखबार में नया-नया रिपोर्टर लगा था। उस समय के मेरे ब्यूरो चीफ राकेश कोहरवाल ने मुझे अल्लसुबह अकबर रोड पर भेज दिया, शरद यादव के घर। शरद यादव ने दो-तीन दिन पहले ही जनता दल के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। हवाला घोटाले में नाम होने के बाद शरद यादव ने ना सिर्फ लोकसभा, बल्कि जनता दल अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद लालू यादव अध्यक्ष बने थे। मुझे याद है उस सुबह लालू यादव सफेद-कुर्ता पाजामे पर नीले रंग का अंगोरा का स्वेटर पहने थे। हम रिपोर्टर लोग जनता दल कार्यकर्ताओं के झुंड के बीच लालू का इंतजार कर रहे थे। लालू आए और अपने चिरपरिचित अंदाज में नारा लगाने लगे। शरद भैया संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।

यह बात और है कि बाद में तब शरद यादव को अपना नेता मानने वाले लालू ने उन्हें ठेंगा दिखाते हुए 1997 में अपना अलग राष्ट्रीय जनता दल बना लिया।

2009 अगस्त की बात है। मुंबई से दिल्ली अगस्त क्रांति एक्सप्रेस से एक राजनीतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेकर मैं और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी नेता भाई क्रांति प्रकाश एक साथ आ रहे थे। साथ में जनता दल यू के बिहार के अध्यक्ष रहे रामजीवन प्रसाद सिंह भी थे।

मैंने रामजीवन सिंह से लालू यादव के बारे में पूछा कि आप उनके बारे में क्या सोचते हैं। रामजीवन जी का जवाब था कि अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में बिहार में लालू यादव जैसा दूसरा नेता नहीं देखा, जिसे प्रचंड जनसमर्थन मिला हो। उन्होंने कहा कि उनके एक इशारे पर लोग पागलों की तरह बिहार में जुट जाते थे। रामजीवन को याद थी बिहार के जहानाबाद के किसी गांव की नरसंहार की घटना। तब लालू नये-नये मुख्यमंत्री बने थे। उस सरकार में रामजीवन सिंह बतौर कृषि मंत्री शामिल थे।

रामजीवन बाबू के मुताबिक लालू और उन्होंने जब नरसंहार वाले गांव का दौरा किया तो लोगों का गुस्सा भड़क उठा। लालू पर पथराव हुआ। गांव की गलियों से जब वे गुजरने लगे तो किसी ने उन पर थूक भी दिया था। इसे देख वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों ने लालू पर थूकने और पथराव करने वालों पर लाठियां भांजनी शुरू कर दी। तब लालू सत्ता मद में चूर नहीं हुए थे। उन्होंने पुलिस वालों को हड़काया और कहा कि अगर तुम्हारे घर लाशें बिछी होंगी तो क्या तुम नाराज नहीं होगे?

सौ में साठ के नारे के साथ पिछड़ा वर्ग के उत्थान का प्रतीक बना यह मसीहा तब तक अपने मसीहपन के गुरूर में नहीं डूब पाया था। बाद में वही लालू राज्य के मुख्य सचिव से चपरासी और पुलिस महानिदेशक से दरबान जैसा व्यवहार करने लगे थे। इसी गुरूर में वे भूलते गए कि लोकतंत्र की भी अपनी मर्यादा होती है। ये मर्यादा जैसे-जैसे तार-तार होती गई, उनके हाथ लगातार गर्त में डूबते गए। प्रचंड जनसमर्थन के दम पर जो सामाजिक बदलाव वे ला सकते थे उसकी बजाय उनका ध्यान और तरफ रहा। वे समझते रहे कि प्रचंड समर्थन के सामने उनकी करतूतें भी ढँक जाएगीं, लेकिन दुर्भाग्यवश यह सोच उन्हीं पर भारी पड़ी। उसी का असर हुआ कि अब वे जेल में हैं।

काश कि लालू जनता के समर्थन को समझ पाए होते... लेकिन अफसोस इस बात का है कि पिछड़ा वर्ग का यह मसीहा समाज में वह बदलाव नहीं ला पाया, जिसका सपना डॉक्टर लोहिया ने देखा था और जिसकी आधारभूमि बिहार में कर्पूरी ठाकुर और रामानंद तिवारी जैसे नेताओं ने तैयार की थी।

(स्रोत-एफबी)