कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत क्या है ? यह बहुत पुरानी जीत है , कांग्रेस ने 1985 में अपना सौ साल पूरा होने के पहले ही यह विजय प्राप्त कर ली थी । कांग्रेस का 125 वर्ष पूरा होने पर भी इसका कोई बहुत मायने नहीं है कि कितने राज्यों में कांग्रेस की सरकार है या केंद्र की तथाकथित संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार कांग्रेसी सरकार है या मिली जुली सरकार है । यह एक बड़ी अजीब सी बात है कि 1947 की आजादी तक कांग्रेस का मतलब होता था देश की आजादी के लिए लड़ने वाला संगठन । 1947 के बाद कांग्रेस का मतलब ही सरकार हो गया है । यह भी कहा जाता है कि सरकार चलाना सिर्फ कांग्रेस ही जानती है । 1947 के 20 साल बाद 1967 में नौ या दस राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकार बनी थी । 30 साल बाद केंद्र में भी गैरकांग्रेसी सरकार बनी । कोई मुझे नहीं समझा पा रहा है कि कांग्रेसी और गैरकांग्रेसी सरकारों में क्या बुनियादी फर्क है । 1967 में राज्यों की गैरकांग्रेसी सरकार का मुख्य मंत्री भी कोई न कोई कांग्रेसी ही हुआ । केंद्र में भी चंद्रशेखर और अटलबिहारी वाजपेयी को छोड़ कर जितने प्रधानमंत्री हुए , वह कांग्रेसी ही थे । कांग्रेस पार्टी देश के हिंदू धर्म के समान है । महात्मा गांधी की बोली में कांग्रेस उन भारतीयों की पार्टी है जो इस भूमि पर बसते हैं , चाहे वह हिंदू , मुसलमान , ईसाइ , सिख या पारसी हों । आज की कांग्रेस में महात्मा गांधी सिर्फ उद्धरण भर हैं । व्यवहार में कांग्रेस ने आजादी के बाद राजपाट की एक संस्कृति बनाई । इस संस्कृति में परिवारवाद , भ्रष्टाचार , लोक लुभावन नारे और कारज धीरे होत हैं , काहे होत अधीर भी है । धीरे धीरे राजनीतिक दलों की भी वही संस्कृति हो गई जिस संस्कृति को कांग्रेस ने बनाया और अपनाया । कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट भी यही है कि अब यह अपनी बनाई संस्कृति से बाहर नहीं निकल सकती – देश भी नहीं निकल सकता है । 2010 कांग्रेस संस्कृति का एक और उदाहरण है । इसलिए कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस सरकार को अलग अलग देखना बड़ा मुश्किल काम है ।

2009 के लोकसभा चुनाव के बाद ही यह माना जा रहा है कि 2011 में जब पश्चिम बंगाल में चुनाव होगा तो मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी की हार तय है । माकपा ने तो 1977 से एक राज्य में अपना राजपाट चलाया , कांग्रेस 1947 से देश के किसी न किसी राज्य में अपना राजपाट चलाती रही है । घुमा फिरा कर यही कह सकते हैं कि केंद्र में भी इसका ही प्रशासन रहा है । कोई मुझे 1977 की गैरकांग्रेसी सरकार की एक उपलब्धि नहीं बता पाता । सिर्फ 1989 में बनी विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार की एक उपलब्धि है सामाजिक न्याय । 1996 की दोनों सरकारें कांग्रेस समर्थित सरकारें थीं । 1998 से 2004 के पूर्वाद्ध तक चली अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार की भी कोई एक उपलब्धि कोई मुझे बता नहीं पता । सच तो यह है कि 1991 में बनी पी वी नरसिंह राव के काल में बनी आर्थिक नीतियों को देश आज भी चला रहा है । यह एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है कि वह आर्थिक नीतियां गलत हैं या सही । अथवा वह नरसिंह राव की नीतियां थीं य़ा आज के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीतियां थीं । पर यह तो मानना ही पड़ेगा कि देश इंदिरा गांधी का नारा गरीबी हटाओ और नरसिंह राव का सोच उदारीकरण से बाहर नहीं निकला है ।

कांग्रेस पार्टी में आजादी के आंदोलन के समय भी असहमति का आदर था , बशर्ते की आप नेता से असहमत न हों । 1947 के पहले भी कांग्रेस में बंटवारा हुआ य़ा लोग कांग्रेस को छोड़ कर चले गए । इसका सबसे बढ़िया उदाहरण नेता जी सुभाषचंद्र बोस का महात्मा गांधी की असहमति के बाद भी कांग्रेस का अध्यक्ष का चुनाव जीतना और जीत के बाद कांग्रेस छोड़ना है । आज की कांग्रेस में भी नेता से असहमत हुए बिना कोई कांग्रेसी अपनी बात रखता है । कांग्रेस हमेशा एक व्यक्ति के नेतृत्व में चलने वाली पार्टी है । संयोग से सत्ताधारी पार्टी होने के बाद वह व्यक्ति प्रधानमंत्री हो गया । जिस किसी ने प्रधानमंत्री का विरोध किया उसे पार्टी से बाहर जाना पड़ा । चाहे वह आजादी के दिनों के बड़े नेता पुरुषोत्तम दास टंडन हों या आजादी के बाद 20 वीं सदी के साठे में समाजवादी चंद्रशेखर का कांग्रेस छोड़ना हो । कांग्रेस पार्टी में नेता होने की एक बुनियादी शर्त भी है कि वह जनमानस में लोकप्रिय है य़ा नहीं । इंदिरा गांधी को लोकप्रिय होने के लिए मेहनत करनी पड़ी । अपने अंतिम दिनों में जवाहरलाल नेहरु ने अपने काल के स्थापित नेताओं का मठपन खत्म करने के लिए कामराज योजना का सहारा लिया । उस काल में उन्होने एक अस्थापित नेता लालबहादुर शास्त्री को बढ़ावा दिया । 1964 में उनकी मृत्यु के बाद स्थापित नेताओं के समूह ने लालबहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया । शास्त्री जी ने अपने मंत्रिमंडल में इंदिरा गांधी को शामिल कर नेहरु परिवार की विरासत को राजपाट में बनाए रखा । 1966 में शास्त्री जी की मौत के बाद विरासत प्रधानमंत्री बनी । 1967 के चुनाव के समय विरासत की लोकप्रियता पर प्रश्नचिण्ह था । इंदिरा गांधी ने अपनी लोकप्रियता 1971 में साबित कर दी ।

आज की कांग्रेस इमरजेंसी जैसे मुद्दों पर इंदिरा गांधी की असीमित शक्तियों की आलोचना कर रही है । लेकिन वह सोनिया गांधी या राहुल गांधी की संयमित असीमित शक्तियों की सराहना करती है । कांग्रेस का एक संकट हिंदुत्व की शक्तियां भी हैं । इस शक्ति से निपटने के लिए वह स्वंय हिंदूवादी होते हुए धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करती है । जबकि भारत में मन और मानसिकता से हिंदूपन से मुक्त नहीं हुआ जा सकता । कांग्रेस ने आजादी के आंदोलन से ले कर सरकार चलाने के तरीके में यह हिंदूपन बनाए रखा है । फिर भी कांग्रेस अपने अंदर सरकार चलाने के तरीके में परिवर्तन लाने की कोशिश कर रही है । लेकिन कांग्रेस की बनाई अपनी संस्कृति ही उसे बदलने नहीं देगी । इसी का नतीजा है कि महंगाई या भ्रष्टाचार आज चरम सीमा पर दिखता है । इसे दिखाती भी कांग्रेस की सरकार ही है । हो सकता हे कि धीरे धीरे कांग्रेस देश भर में अकेली राजनीतिक शक्ति न रहे । यह भी हिंदूपन ही है क्योंकि यहां कोई एक पंथ या मठ या व्यक्ति नहीं है । जब किसी ने एक पंथ या व्यक्ति को प्रमुखता देने की कोशिश की उसका वही हाल हुआ जो आज अन्य दलों खास कर भारतीय जनता पार्टी का हो रहा है । समय के साथ राजनीतिक विचारधारा के ऊपर बाजार की शक्तियां हावी होंगी ही । बाजार सत्य है । बाजार अपनी आवश्यकता के लिए विकास भी करता है और नया माल बेचने के लिए पुराने माल को ही नए शक्ल में पेश भी करता है । कांग्रेस पार्टी यही कर रही है ।