मधुवन दत्त चतुर्वेदी
हाल ही में पाकिस्तान में सताए जा रहे हिन्दुओं के उस दल को मोदी सरकार ने पनाह देने से मना कर वापिस लौटा दिया था, जो शरण की आस लगाये आये थे। कल मोदी के सहयोगी विहिप नेता प्रवीन तोगड़िया ने कहा है कि बंगलादेश से आ रहे मुसलमान घुसपैठियों को वापिस भेजा जाये क्योंकि वे भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। उन्होंने लगे हाथ यह भी कहा कि जो हिन्दू वहाँ से आ रहे हैं वे वहाँ के सताए हुये हैं इस लिए उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया जाये।
यों तो यह बयान चुनाव प्रचार के दौरान पूर्वोत्तर के हिन्दुओं को बरगलाने के लिए स्वयं मोदी ने भी दिया था, जब घुसपैठ पर बोलते हुये उन्होंने भारत को 'दुनिया भर के हिन्दुओं का होम लैंड' कहा था। लेकिन पाकिस्तानी हिन्दुओं को शरण न देकर मोदी ने साबित कर दिया कि वे इस तरह के बयानों से जनता को बस भरमा रहे थे और वैमनस्य की खाई को चौड़ा रहे थे। यही निहितार्थ तोगड़िया के बयान का है। कथनी और करनी का बड़ा अंतर, समुदायों में परस्पर घृणा और अविश्वास को बढ़ाना तथा इस स्थिति का राजनैतिक लाभ लेना यही संघियों की नीति रही है।
यों विश्व का कोई देश मोदी के उपरोक्त कथन के अनुसार किसी खास धर्म के लोगों का 'होम लैंड' नहीं रहा है, भारत भी नहीं। इधर दोमुंहेपन का एक और बयान सामने है जिसमें जेटली पाकिस्तान से कहते हैं कि वह तय करे, उसे भारत से बात करनी है या अलगाववादियों से। जब आप पड़ोस के कथित रूप से सताए हुये हिन्दुओं की हिमायत की नीति पर बल देंगे तो पड़ोसियों को कथित रूप से भारत में सताए मुसलमानों से हमदर्दी जताने से कैसे रोक सकते हैं ? क्या पड़ोस के देशों से पलायन कर आने वाले वहाँ के अलगाववादी नहीं हैं ? क्या ऐसे अलगाववादियों का धार्मिक वर्गीकरण उचित है ? वस्तुतः संघियों को मदद न हिन्दुओं की करनी है और न मुसलमानों की, इन्हें किसी भी काल्पनिक खतरे के बहाने दोनों समुदायों में बस घृणा और हिंसा फैलानी है तथा ऐसे खतरे के नाम पर अल्पसंख्यक मुसलमानों के दमन में तंत्र का प्रयोग करना है।
मधुवन दत्त चतुर्वेदी , लेखक ट्रेड यूनियन लीडर व वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।