केजरीवाल घाघ नेता है, मोटी खाल के नेताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता, बार-बार वहीं करेंगे, कुछ गड़बड़ हो जायेगी तो बेशर्मी के साथ माफी माँग लेंगे
दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिये हैं और इससे अधिक केजरीवाल से क्या उम्मीद की जा सकती थी, हो सकता है आम जनता को इस तथाकथित आम आदमी से बहुत आशायें रही हों लेकिन प्रारम्भ से ही कहता आ रहा हूँ कि केजरीवाल से भारतीय राजनीति को एक धोखे से सिवा कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। मैं इसलिये यह बात नहीं कहता आाया हूँ कि मैं भविष्यवाणी करने वाला पोंगा पंडित हूँ मैं यह बात इसलिये कहता आया हूँ कि केजरीवाल ने राजनीति में जो भी स्थान हासिल किया है वह दूसरे दलों की नाकामियों का प्रतिफल था तथा केजरीवाल ने सोशल मीडिया का वेजा इस्तेमाल कर हिन्दुस्तान की, विशेषकर दिल्ली की, जनता को वेबकूफ बनाने का कार्य किया है। राजनीति इतनी आसान नहीं होती है हम राजनीतिज्ञों को चुटकियों में खारिज का देते हैं उनकी मजबूरियों को समझे बगैर उनका व उनकी राजनीति का पोस्टमार्टम कर डालते हैं।
केजरीवाल ने बहुत सस्ते में दिल्ली की गद्दी पा ली है पिछले दो महीने से आम आदमी पार्टी में जो घमासान मचा है उससे स्पष्ट है कि अब जनता की हमदर्दी का दावा करने वाली इस पार्टी में सत्ता सुख के लिये नेताओं के बीच अन्य पार्टियों की तरह घमासान मचा है, चाहे कुछ भी योगेन्द्र यादव प्रशान्त भूषण कहें, चाहे जितने आदर्श बघारें, लेकिन सच है कि अब तो सत्ता का सुख लेने के लिये संघर्ष प्रारम्भ हो गया है। केजरीवाल, अन्य राजनीतिज्ञों की तरह, जो कहते हैं उससे उल्टा करते हैं। उन्होंने दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद कहा था कि वह अगले पाँच साल केवल दिल्ली को ही संभालेंगे फिर दिल्ली में किसानों की रैली की क्या आवश्यकता पड़ गयी थी ? और आप पार्टी के रैली के दिन दुनिया ने जो भी देखा वह मानवता के लिये शर्मनाक था। एक किसान ने देखते-देखते फाँसी लगा कर प्राण त्याग दिये और केजरीवाल भाषण देते रहे...... देते रहे......... देते रहे और वह भी मौत के 75 मिनट बाद तक। केजरीवाल की अन्य राजनैतिज्ञों की तरह भावनायें मरी हुई हैं जब उन्हें अहसास दिलाया गया तो मक्कार राजनीतिज्ञ की तरह बेशर्मी के साथ माफी मांग ली और यह भी कह डाला कि उस किसान की मौत की वजह से उन्हें सारी रात नींद नहीं आई।
केजरीवाल ! यह सफेद झूठ है जिस किसान की मौत पर तुम्हें पूरी रात नींद नहीं आई, उस किसान की मौत को आँखों से देखने के पश्चात भी तुम्हारा भाषण 75 मिनट तक क्यों चलता रहा ? क्या तुम अपनी संवेदनायें घर छोड़ कर आये थे ?
दिल्ली से मुझे बहुत हमदर्दी है इस दिल्ली ने तैमूर लंग, नादिर शाह, अहमदशाह अब्दाली जैसे आतिताइयों की बर्बरता को झेला है। जब दिल्ली में मोहम्मद शाह रंगीले बादशाह हुआ करते थे तब नादिर शाह ने दिल्ली में ‘‘कत्ले आम’’ का ऐलान किया था दिल्ली की सड़कें लाशों से पट गयी थीं। दिल्ली ने ऐसे दुर्दिन भी देखे हैं। दिल्ली केजरीवाल को भी बर्दाश्त कर लेगी दिल्ली का दिल बड़ा है किन्तु दिल्ली आहत अवश्य होगी। जनता से चुने प्रतिनिधियों से ऐसी अपेक्षायें नहीं होती है किन्तु शासक तो शासक ही होता है। आने वाले साढ़े चाल वर्ष तक के लिये केजरीवाल की मूर्खताओं को झेलने के लिये दिल्ली को तैयार रहना पड़ेगा। अब इस तरह के वाकये होते ही रहेंगे।
चहुतरफा किसान राजनीति हो रही है। कांग्रेस को विरोध के लिये मुद्दे मिल गये हैं भूमि अधिग्रहण का मामला किसानों से जुड़ा हुआ है। किसान दैवीय आपदा का सामना कर रहा है, रवी की फसल पूरी तरह बरबाद हो चुकी है, गर्मियों में लगातार बारिस के कारण मानसून के कमजोर होने की संभावनायें बढ़ गयी हैं। इस प्रकार किसान का वर्तमान व भविष्य अन्धकार मय है। देश में लगभग दो तिहाई जनसंख्या किसान है। देश व राज्य की सरकारों के सामने बहुत बड़ी चुनौती है कि इतनी बड़ी जनसंख्या का किस प्रकार पुर्नवास किया जाये। किसान टूट चुका है, टूटने की वजह एक यह भी है कि अधिक उत्पादन की लालशा में किसान की खेती महंगी हो गयी है और यदि फसल खेत में जमींन्दोज हो जाये तो लगाये गये पैसे की वापसी कैसे होगी ? किसान के लिये यही बहुत बड़ी चुनौती है जिसका सामना वह कर रहा है। कुछ ऐसे किसान भी हैं जो इन चुनौतियों का सामना नहीं कर पा रहे हैं। फलतः आत्महत्याओं का सिलसिला भी जारी है। सभी राजनैतिक दलों, स्वयंसेवी संस्थाओं को आगे आकर किसान के इस दुख में शरीक होना चाहिये। किसानों को आश्वस्त करने की आवश्यकता है कि वे अकेले नहीं है। यद्यपि किसान अकेले होने का दर्द सदियों से झेलता आया है यदि देश का शासक वर्ग उसके साथ कदम से कदम मिलाकर खड़ा होगा तो किसानों को बहुत बड़ी राहत मिलेगी। किसानों को लड़ना आता है उनकी आवश्यकतायें भी अधिक नहीं होती है बस किसानों की एक गुजारिश नेताओं से अवश्य होगी कि रैलियाँ व आम संभायें कर उनके जले पर नमक न छिड़कें।
वैसे केजरीवाल ने शायद सबक ले लिया हो लेकिन केजरीवाल घाघ नेता है, मोटी खाल के नेताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता, बार-बार वहीं करेंगे, कुछ गड़बड़ हो जायेगी तो बेशर्मी के साथ माफी माँग लेंगे। माफी मांगने में क्या जाता है ?
अनामदास