केजरीवाल जी क्या “आप”के स्वराज की यही परिभाषा है?
केजरीवाल जी क्या “आप”के स्वराज की यही परिभाषा है?
राजनीति में निर्लज्जता का नया सितारा “आप”
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले दिनों दिल्ली में “आप” की सरकार बनने से पहले हमने लिखा था कि “आप” का गुब्बारा तीन माह में फूट जाएगा। उस लेख पर देश भर से पक्ष-विपक्ष में काफी प्रतिक्रियाएं आईं और कई पाठकों के फोन भी आए और उनसे लम्बा विमर्श भी हुआ। मैं धन्यवाद दूँगा श्रीयुत् अरविन्द केजरीवाल जी को कि उन्होंने मेरे आकलन को और भी कम समय एक माह में ही सत्य साबित कर दिया। “आप” का गुब्बारा तो 20 दिन में ही फूट गया अब तो कलई उतर रही है और केजरीवाल और उनकी “आप” का असल भगवा-कॉरपोरेटी चेहरा सामने आना प्रारंभ हो गया है।
केजरीवाल की आँखों के तारे दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की कथित महिलाविरोधी व नस्लवादी हरकत के विरोध में उठ रही आवाजों का गला घोंटने के लिए जिस निर्लज्जता के साथ अरविन्द केजरीवाल धरने पर बैठे और अपने पिछले अनशन की तरह बिना किसी परिणाम के उठ भी गए, उसने साबित कर दिया कि “आप” भी किसी भी सूरत में किसी अन्य राजनीतिक दल से कम निर्लज्ज नहीं है। रही-सही कसर तब पूरी हो गई जब सोमनाथ भारती को इस प्रकरण में नोटिस जारी करने वाली दिल्ली राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह को बर्खास्त कर वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा को आयोग का अध्यक्ष बनाने के लिए केजरीवाल सरकार ने उपराज्यपाल से संस्तुति कर दी जबकि बरखा सिंह का कार्यकाल अभी तक बाकी है। यानी अगर अशोक चक्रधर राज्य साहित्य अकादमी से त्यागपत्र नहीं देते तो उनके साथ भी केजरीवाल यही सुलूक कर सकते थे ?
महत्वपूर्ण यह है कि बरखा सिंह अपने पद से हटना नहीं चाहतीं और मीडिया में आई खबरों के मुताबिक वे उपराज्यपाल से मिलकर इस पर चर्चा करेंगी। बरखा सरकार पर आरोप लगा रही हैं कि सोमनाथ भारती को सम्मन भेजे जाने के बाद से उन्हें परेशान किया जा रहा है, दूसरी ओर केजरीवाल कह रहे हैं कि वे यहां कांग्रेस की राजनीति कर रही हैं और तटस्थ नहीं हैं।
क्या याद है यह तर्क देते वक्त केजरीवाल भूल गए कि जब पिछले दिनों सरकार ने यूजीसी एक्ट के नियम-6 (अयोग्यता, सेवानिवृत्ति, सदस्य की सेवा शर्ते) में निहित अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए “आप” के सिद्धांतकार योगेंद्र यादव को यूजीसी सदस्य पद से बर्खास्त कर दिया था। तब यादव ने कारण बताओ नोटिस के जवाब में सवाल उठाया था कि क्या वह कांग्रेस पार्टी में शामिल होते तो भी सरकार उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करती ? उनका एक तर्क यह भी था कि पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सोशलिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद आचार्य नरेंद्र देव को यूजीसी का सदस्य बनाया था।
आज यही सवाल बरखा सिंह के सवाल पर खड़ा है। केंद्र सरकार ने तो बाकायदा नियम-कानून के तहत योगेंद्र यादव को बर्खास्त किया था जबकि केजरीवाल तो खुल्लमखुल्ला कह रहे हैं कि बरखा कांग्रेस की नेता हैं इसलिए हटाया गया। योगेंद्र यादव को सरकार ने बर्खास्त करने से पहले कारण बताओ नोटिस जारी किया था जबकि बरखा सिंह के प्रकरण में इस विधायी प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया गया। केजरीवाल जी क्या “आप” के स्वराज की यही परिभाषा है? क्या योगेन्द्र यादव अब पंडित नेहरू और आचार्य नरेंद्रदेव का उल्लेख नहीं करेंगे ?
प्रश्न है क्या बरखा सिंह की बर्खास्तगी पर कोई जनमत संग्रह कराया गया? जनमत संग्रह छोड़िए, क्या अपने सहयोगी दलों कांग्रेस और जद (यू) से भी उन्होंने कोई मशविरा किया। फिर बिन्नी को “आप” से बर्खास्त करने के बाद अल्पमत में आए केजरीवाल ने किस नैतिकता के आधार पर यह फैसला लिया ? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि केजरीवाल ने कहा था फैसले जनता से पूछकर लिए जाएंगे। क्या यह सही नहीं है कि बरखा सिंह की बर्खास्तगी सोमनाथ भारती को नोटिस जारी करने की वजह से ही हुई? क्या यह संवैधानिक संस्थाओं और आयोगों को सरकारी भौंपू बनाने की भाजपा-कांग्रेस की प्रवृत्ति का ही अनुसरण नहीं है? फिर वह कौन सी साफ सुथरी राजनीति है जिसको करने का दावा केजरीवाल कर रहे थे?
क्या कारण बताया जा सकता है कि सोमनाथ भारती राज्य महिला आयोग के नोटिस पर अपना पक्ष रखने के लिए हाजिर क्यों नहीं हुए ? क्या केजरीवाल जी से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे नैतिकता का परिचय देते हुए उन कारणों का भी खुलासा करेंगे जिसके चलते निवर्तमान अध्यक्ष बरखा सिंह का कार्यकाल शेष होने के बावजूद छुट्टी कर दी गई ? मुझे लगता है केजरीवाल जी से किसी नैतिकता की आशा करना बेमानी है... क्योंकि अभी भी बरखा सिंह राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष हैं लेकिन केजरीवाल के आदेश पर आयोग की वेबसाइट से उनका नाम और चित्र हटा दिया गया है। क्या यही साफ-सुथरी राजनीति है केजरीवाल की ?
सिर्फ बरखा सिंह को बर्खास्त करने ही नहीं बल्कि मैत्रेयी पुष्पा का नाम प्रस्तावित करने में भी केजरीवाल ने ओछा राजनीतिक हथकण्डा प्रयोग किया। फेसबुक पर जनवादी कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने लिखा- “Maitreyi Pushpa जी के दिल्ली महिला आयोग का अध्यक्ष नामित होने की ख़बर सुबह ही आ गयी थी. मैंने फोन करके बधाई दी तो वह बोलीं कि अभी तो मुझे भी टीवी से ही ख़बर मिल रही है.” यानी मैत्रेयी जी का नाम प्रस्तावित करने से पहले कोई जनमत संग्रह, सहयोगियों से राय छोड़िए स्वयं मैत्रेयी जी को भी विश्वास में नहीं लिया गया। दरअसल आनन-फानन में मैत्रेयी जी का नाम इसलिए प्रस्तावित किया गया क्योंकि उसी दिन सुबह-सुबह खबर आ रही थी कि विभूतिनारायण राय, महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से समय पूरा होने पर अपना कुलपति पद का कार्यभार सौंपकर चले गए। चूँकि श्री राय की एक टिप्पणी पर काफी विवाद हुआ था और मैत्रेयी जी ने उस पर राय के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चा खोला था इसलिए राय के वर्धा से जाने की खबर आते ही मैत्रेयी जी का नाम प्रस्तावित कर दिया गया ताकि फिर एक नए विवाद से माइलेज लिया जा सके और “आप” परिवार पर भगवा संस्कारी होने व सांस्कृतिक आतंकवादी होने के जो आरोप लग रहे हैं उनसे पल्ला झाड़ा जा सके और अगर मैत्रेयी जी न बन पाएं तो अपमान मैत्रेयी जी का हो और केजरीवाल जी फिर एक धरने पर बैठ जाएं। लेकिन ऐसी हरकत करते वक्त केजरीवाल भूल गए कि श्री राय ने अपनी उस टिप्पणी पर अपनी सफाई भी दी थी और बचाव भी किया था लेकिन केजरीवाल की आँखों के तारे सोमनाथ भारती ने अपनी हरकत पर न तो माफी माँगी, न इंकार किया बल्कि केजरीवाल और पूरी दिल्ली सरकार भारती के साथ निर्लज्जता के साथ न सिर्फ खड़ी रही बल्कि भारती तो अपनी हरकत को जायज ठहराने के लिए पीड़िताओं के खिलाफ सीडी भी जारी कर रहे थे। इसलिए मैत्रेयी जी की नियुक्ति की संस्तुति केजरीवाल और “आप” के अपराधों को कम नहीं कर देगी।


