केन्द्रीय बजट : गरीबों के लिए आफत, कारपोरेटों के लिए राहत
केन्द्रीय बजट : गरीबों के लिए आफत, कारपोरेटों के लिए राहत
रायपुर, 01 फरवरी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने आज मोदी सरकार द्वारा पेश बजट को ‘जनविरोधी, दिशाहीन और भारतीय योजना की विदाई’ वाला बजट करार देते हुए कहा है कि बजट में गरीबों के लिए आफत और कार्पोरेटों के लिए राहत के सिवा औरे कुछ नहीं है.
आज यहां जारी एक बयान में माकपा राज्य सचिव संजय पराते ने कहा है कि नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था में गिरावट को आर्थिक सर्वे में स्वीकार करने के बावजूद मांग, उपभोग और क्रयशक्ति बढ़ाने के लिए सार्वजनिक व्यय बढ़ाने के बजाए संकुचनकारी बजट ही पेश किया गया है. नतीजा यह है कि कृषि, मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आंगनबाड़ी, मध्यान्ह भोजन आदि में आबंटित बजट मुद्रास्फीति को गणना में लेने के बाद पिछले वर्ष किये गए व्यय से कम ही बैठता है. आयकर में 20 हजार करोड़ रुपयों की जो छूट मध्यम वर्ग को दी गई है, वह अप्रत्यक्ष करों में 75 हजार करोड़ रुपयों की वृद्धि करके छीन ली गई है.
माकपा ने कहा है कि योजना व्यय और गैर-योजना व्यय को अलग न करने का नतीजा यही होने वाला है कि देश के अनियोजित और असंतुलित विकास को बढ़ावा मिलेगा, जो पूरी तरह कारपोरेटों के पक्ष में ही जाएगा. बजट में जो ‘आवास गुब्बारा’ फूलाया गया है, उससे वास्तव में रीयल एस्टेट कारोबारियों व कार्पोरेटों के ही पौ-बारह होने जा रहे हैं, जबकि किसानों से उनकी जमीन छीने जाने का खतरा और बढ़ गया है. इससे देश में किसान आत्महत्याएं और बढ़ेगी.
उन्होंने कहा कि नोटबंदी के बाद बैंकों की बढ़ी हुई आर्थिक क्षमता का उपयोग किसानों की कर्जमाफी, उन्हें स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार फसलों की लागत मूल्य पर 50% वृद्धि के साथ लाभकारी मूल्य देने और बेरोजगारों के लिए रोजगार सृजन के लिए होना चाहिए था, लेकिन ऐसा न करने से न केवल देश के विकास दर में और गिरावट आएगी, बल्कि मानव विकास सूचकांक में भी भयंकर गिरावट आने वाली है.
उन्होंने कहा कि दलित-आदिवासियों के उत्थान की बात करने वाली सरकार ने इस तबके के लिए बजट का केवल 3.92% ही आबंटित किया है, जबकि देश में उनकी आबादी कुल जनसंख्या का एक-चौथाई है. इसी प्रकार देश की 50% महिला आबादी के लिए बजट के केवल 5.3% का ही प्रावधान किया गया है.
माकपा नेता ने कहा कि राजनैतिक पार्टियों द्वारा 2000 रुपयों से ज्यादा का चंदा कैश में न लेने के फैसले से राजनैतिक भ्रष्टाचार पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि इसका असली स्रोत कार्पोरेट फंडिंग और चुनावों में राजनैतिक पार्टियों के खर्चे पर कोई पाबन्दी न होना है, जिस पर रोक लगाने का इस सरकार का कोई इरादा नहीं है.
माकपा ने रेल बजट को आम बजट में मिलाने की भी आलोचना की है और कहा है कि अब भारतीय रेल के निजीकरण का रास्ता साफ़ हो जायेगा, लेकिन आम यात्री की सुरक्षा और ज्यादा खतरे में पड़ जायेगी.


