कैग रिपोर्ट और सत्ता का खेल : चिंता करना जनता का काम है मीडिया का नहीं
कैग रिपोर्ट और सत्ता का खेल : चिंता करना जनता का काम है मीडिया का नहीं
उदय चे
आज समाचार पत्रों की मुख्य खबर ये थी कि संसद में कैग ने रिपोर्ट पेश की और संसद को बताया कि अगर आज युद्ध होता है तो भारत सिर्फ 10 दिन ही लड़ पायेगा।
ये खबर उस समय आ रही है जब भारत के दो पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और चीन मीडिया की खबरों के अनुसार भारत से 20-20 खेलने सीमाओं पर आ डटे हैं।
इस खबर ने पूरे देश के अवाम को हिला कर रख दिया है क्योंकि अब पड़ोसी मुल्क सीमा पर आ डटा है तो देश का मीडिया युद्ध तो करवाकर ही रहेगा इसलिए गोला बारूद का न होना बड़ा चिंता का विषय है।
चिंता करना जनता का काम है मीडिया का नहीं मीडिया का काम युद्ध करवाना है वो ये करवाकर रहेगा। वैसे जनता चिंता करेगी तभी तो गोला बारूद खरीदने का माहौल बनेगा। खूब चिंता करो - मीडिया का अमर संदेश
पिछले कुछ दिनों से देश में डर का माहौल बनाया जा रहा है। युद्ध के नाम पर डराया जा रहा है। अवाम जितना डरेगा उतना बचाव के उपाय सोचेगा। बचाव हथियार खरीदने में है। हथियार खरीदने में मोटी दलाली है। दलाली सत्ता के गलियारों में बंटती फिरेगी। इस माहौल को बनाने में मीडिया अहम भूमिका निभा रहा है। क्योंकि मीडिया को सरकार ने 11 अरब रूपये इसी काम के लिए दिए हैं कि अवाम को डराओ अब अवाम जितना ज्यादा डरेगा वो सत्ता की छतरी के नीचे आता जायेगा। छतरी के नीचे कभी कमला आती थी अब अवाम को आना पड़ेगा। ऐसी किसी भी छतरी के नीचे आने से कमला को भी नुकसान होता था अवाम को तो होना ही है। अवाम अपनी छतरी खरीद ले।
इस माहौल के कारण अवाम भी डरा हुआ। मीडिया ने अवाम के दिमाग में बैठा दिया है कि पाकिस्तान और चीन भारत के खिलाफ गठजोड़ किये हुए हैं वो कभी भी देश पर हमला कर सकते हैं। कुछ धार्मिक ताकतें इसके साथ में एक और डर जनता में बैठा रही है कि मुस्लिम तो पाकिस्तान समर्थक हैं ही साथ में ये कम्युनिस्ट, ये तो पहले भी चीन के साथ थे अब भी उनके साथ है। इसलिए इनको भी मिटाना जरूरी है।
अब ये खबर तो हार्ट फेल करने वाली है कि सामान 10 दिन का भी नहीं है और बात कर रहे हैं विश्व जीतने की।
वहीं हमारी सरकार तो पहले ही घोषणा कर चुकी है कि भारत सरकार ढाई मोर्चो पर युद्ध लड़ने की तैयारी में है। एक मोर्चा पाकिस्तान, दूसरा मोर्चा चीन और आधा मोर्चा रोटी मांगने वाला देश का अवाम, रोटी काजू के आटे वाली नहीं गेहूं के आटे की काजू के आटे की रोटी हुक्मरान खाता रहे।
अब लोग सरकार की आलोचना करेंगें कि सरकार बड़ी निक्कमी है। सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी इस आलोचना में जुट भी गए हैं। वो आलोचना कर रहे है कि क्यों सरकार ने पुख्ता इंतजाम नहीं किये।
भारत की सता भी तो ये ही चाहती है कि आम जनता डरे फिर वो दबाव बनाए कि जंग होने वाली है तो हथियार क्यों नहीं खरीद रहे हो। मरवाओगे क्या फोकट में।
फ़ोकट से याद आया कि फोकट में तो पीने के लिए पानी भी नहीं मिलता तो गोला बारूद कहाँ से मिलेगा।
अब सरकार भी कहेगी ठीक है हमने तो पहले ही अडानी, अंबानी को ठेके दिए हुए हैं व इजराइल और अमेरिका को भी ऑर्डर दिए हुए हैं। हमारे प्रधानमंत्री इजराइल, अमेरिका गोल-गप्पे खाने थोड़े ही गये थे। वो ये करार करने ही तो गये थे। डरने की जरूरत नहीं भारत सरकार ने पुख्ता इंतजाम किये हुए हैं कुछ कमी है उसको भी पूरी कर लिया जायेगा।
लेकिन अब बहुत जरूरी है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानी, मजदूरी के बजट को घटाकर देश के लिए रक्षा बजट बढ़ाया जाए। सरकारी खजाना जो खाली है उसको भरने के लिए जितना जल्दी हो सरकारी सम्पति स्कूल, अस्पताल से लेकर रेल, जहाज, खादान तक बेचनी पड़ेगी ताकि कुछ रुपया इस आपात घड़ी में मिल जाये जिससे गोला बारूद की कमी को पूरा किया जा सके।
आप भी सत्ता की हाँ में हाँ मिलाओगे। धीरे-धीरे आप सत्ता के जाल में फँसते जाओगे।
लेकिन कल ही संसद में एक रिपोर्ट पेश की गयी थी जिस को अख़बरो ने छापना अपने मालिक की महफ़िल में गुस्ताखी समझा। रिपोर्ट अनुसार सरकार के स्वास्थ्य मंत्री ने माना कि आज भारत में 1000 व्यक्तियों पर 0.62 डॉक्टर हैं। जबकि WHO के निर्देश अनुसार पिछड़े से पिछड़े देश में ये 1000 पर 1 तो जरूरी है ही। शायद स्वास्थ्य मंत्रालय ने उन झाड़फूंक करने वाले बाबाओं की गिनती नहीं की जिनको सरकार ने डॉक्टर से भी बड़ा माना है। गिनती की होती तो ये आंकड़ा 1000 पर 100 का हो जाता।
कल ही एक खबर ये भी आ रही थी कि हरियाणा में एक दम्पति को एम्बुलेन्स नहीं मिली बाइक पर अपनी गर्भवती पत्नी को ले जाना पड़ा, रास्ते में बाइक पर ही बच्चा हो गया।
एक खबर ये भी थी कि एक व्यक्ति की बेटी मर गयी एम्बुलेन्स नहीं मिली बच्ची की लाश को बाप गोद में उठाकर ले गया, वैसे ये एम्बुलेन्स समय पर कभी मिलती ही नहीं इससे पहले भी कभी किसी ने लाश को साईकिल पर बांध कर के ले जाना पड़ा तो किसी ने घसीट कर ले जाना पड़ा।
एक खबर ये भी थी कि एक महिला मरीज को खाना जमीन पर ही परोस दिया गया। बीमारी से कोई मरता है तो मरे, सीवर की सफाई करते हुए कोई मरे तो मरे वो इंसान थोड़े ही है दलित जो है। कोई गरीब अपने बच्चे, भाई, बाप, पत्नी, माँ-बहन की लाश चाहे साईकिल पर ढोए, चाहे सर पर या चाहे घसीटते हुए ले जाये उसको एम्बुलेन्स नहीं मिलेंगी। क्योंकि देश की सीमाओं पर दो देश जो आ डटें हैं। युद्ध-युद्ध खेलने के लिए इसलिए देश हित गोला बारूद खरीदने में है। एम्बुलेन्स की मांग करना ही देशद्रोह है। इन एम्बुलेन्स को बेच कर अच्छा हो गोला बारूद ही खरीद लिया जाये। देशद्रोही कही के.... पहले तो मुस्लिम और कम्युनिस्ट ही देशद्रोही थो अब ये एम्बुलेंस मांगने वाले भी देशद्रोही हैं।
देश में इतने लोग युद्ध या आतंकवादी हमलों में नहीं मारे गए होंगे जितने हर साल भुखमरी, गरीबी, चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में मारे गए हैं। जातीय और धार्मिक दंगों, पूंजीपतियों-सामन्तों के शोषण की वजह से मारे गये है। पिछले 15 से 20 साल में लाखों लोगो ने कैंसर के कारण दम तोड़ दिया। लाखों किसान आत्महत्या कर गये। सरकार के आंकड़ों के अनुसार देश में 80% लोग 20 रूपये से भी कम में गुजारा कर रहे हैं। नोट बन्दी ने लाखों मजदूरों का रोजगार छीन लिया। हजारो छोटे उद्योगपतियों को तबाह कर दिया। किसान संसद पर नंगा होकर प्रदर्शन कर रहा है। छात्र शिक्षा बचाने के लिए सड़कों पर लाठियां खा रहे है। लेकिन हमारी सरकारें स्कूल-कॉलेज, अस्पताल खोलने की बजाए, रोजगार पर खर्च करने की जगह ज्यादा से ज्यादा हथियार खरीदने पर खर्चा कर रही है। लोगों का ध्यान उनकी बुनियादी जरूरतों से हटाकर देश मे युद्धोन्माद भड़काया जा रहा है।
आज देश बड़े ही नाजुक दौर से गुजर रहा है। लेकिन देश के हुक्मरान पड़ोसी देशों के साथ युद्ध-युद्ध खेलना चाहते हैं। पड़ोसी देशों में भी ये सभी समस्याएं मुँह बायें खड़ी है। इसलिए अवाम की मुलभुत समस्यायों से पीछा छुड़ाने के लिए वो भी युद्ध का उन्माद फैला रहे है। एक युद्ध ही है जो सत्ता में बैठे हुक्मरानों की मुक्ति का रास्ता है।
लेकिन अवाम को सत्ता के जाल में फंसने की बजाए सत्ता की चाल को समझने की जरूरत है ये भारतीय सत्ता की बहुत बड़ी चाल है। ये सरकार सैनिक सत्ता की तरफ बढ़ रही है। अब अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, किसानी, मजदूरी के बजट बढ़ाने की बात करोगे तो आपको देशद्रोही साबित कर दिया जायेगा। क्योकि जंग के समय सिर्फ जंग की बात हो। जंग से अलग कोई मांग करेगा तो वो देशद्रोही है।
अब बजट बढ़ेगा तो सिर्फ रक्षा में क्योकि युद्ध के हालात जो बने हुए हैं।


