कौन कहता है कि आपातकाल लागू करने के लिए उसकी घोषणा जरूरी है?
कौन कहता है कि आपातकाल लागू करने के लिए उसकी घोषणा जरूरी है?
राजनाथ सिंह जी किसी बनाना रिपब्लिक के गृहमंत्री हैं या भारत जैसे महान राष्ट्र के?
नागपुर हेडक्वार्टर और रायसीना के बीच की दूरियां भी खत्म हो गई हैं।
गृहमंत्री का काम देश में लगी आग को बुझाना है न कि उसे और भड़काना।
लोकतंत्र है या पुलिस स्टेट?
राजनाथ सिंह जी किसी बनाना रिपब्लिक के गृहमंत्री हैं या भारत जैसे एक बड़े, आधुनिक और महान राष्ट्र के? जेएनयू मामले में हाफिज सईद प्रकरण के बाद यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा है।
राजनाथ जी ने उस कुर्सी को कलंकित कर दिया है, जिस पर कभी बैठ कर सरदार पटेल ने देश के राजे-रजवाड़ों से लोहा लिया था, पंडित पंत ने उसे एक नई गरिमा और ऊंचाई दी थी। चौधरी चरण सिंह जी ने इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया था। उन्होंने उस कुर्सी का इस्तेमाल ना केवल नारा लगाने वाले दो छात्रों के खिलाफ किया है, बल्कि उसके लिए उन्हें पाक आतंकी हाफिज सईद और उसके फर्जी ट्विटर का सहारा लेना पड़ रहा है।
मोदी जी को तो फेंकू माना ही जाता था, लगता है अब उनकी कैबिनेट भी उसी रास्ते पर चल पड़ी है। जूठ और फरेब सरकारी नीति और कामकाज का हिस्सा बन गया है। यह बात आज पता चली है, लेकिन देश के गृहमंत्री को यह बात शोभा नहीं देती। राजनाथ जी आप किसी बनाना रिपब्लिक के गृहमंत्री नहीं हैं। आप उस महान राष्ट्र के गृहमंत्री हैं जिसकी 5000 सालों की एक लंबी विरासत है। सत्य और अहिंसा जिसके अस्तित्व का आधार रहा है। ऐसे में आपको अपनी न सही लेकिन उस पद की गरिमा का ख्याल जरूर रखना चाहिए था। इतना बड़ा सफेद झूठ देश का कोई गृहमंत्री कैसे बोल सकता है? गृहमंत्री का काम देश में लगी आग को बुझाना है न कि उसे और भड़काना।
दरअसल मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राजनाथ सिंह ने पाक आतंकी हाफिज सईद के एक ट्विटर हैंडल का हवाला देते हुए जेएनयू के छात्रों को उसका समर्थन हासिल होने की बात कही है। जबकि सच यह है कि यह हाफिज सईद का ट्विटर हैंडल फर्जी है। दरअसल हाफिज सईद के इस ट्विटर हैंडल पर 2010 में ही पाबंदी लग गई थी। यह कार्रवाई तब हुई थी जब हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय आंतकी घोषित किया था। ऐसे में नकली ट्विटर हैंडल के ट्वीट के सहारे गृहमंत्री कैसे कोई बयान दे सकते हैं?
बात यहीं खत्म नहीं हुई। दिल्ली पुलिस ने तत्काल उसका हवाला देते हुए देश भर की पुलिस को अलर्ट जारी कर दिया। यह न केवल सरकारी आधिकारिक मानदंडों का खुल्ला उल्लंघन है, बल्कि दिल्ली पुलिस जैसी सरकारी एजेंसी की साख पर भी बट्टा लगाता है। भविष्य में क्या कोई इन दोनों महकमों पर भरोसा कर पाएगा? अगर यह भूल-वश हुआ है तो गृहमंत्री और दिल्ली पुलिस को तत्काल इसे वापस लेकर देश से माफी मांगनी चाहिए, लेकिन अगर पूरे होशो हवाश में ऐसा किया गया है तो इससे खतरनाक बात कोई दूसरी नहीं हो सकती है। देश का गृहमंत्रालय अगर इस तरह की साजिशों में शामिल है, तो मुल्क के लिए यह बेहद चिंता का विषय है।
ऐसा गृहमंत्री जो देश को झूठे तरीके से आतंकियों के साथ जोड़ने का काम करे उसे अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, लिहाजा उसे तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए। लेकिन इस घटना से एक बात साबित हो गई है कि फर्जी बयानों और फोटोशाप का जो खेल भक्तों तक सीमित था उसे अब सरकार ने भी अपना लिया है। इसके साथ ही नागपुर हेडक्वार्टर और रायसीना के बीच की दूरियां भी खत्म हो गई हैं।
हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि देश के बड़े नेताओं पर सरेराह हमले हो रहे हैं। कल जेएनयू में राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता आनंद शर्मा के साथ जो हुआ उसने आपातकाल को भी बौना कर दिया है। कांग्रेस का कहना है कि हमला संघ के वीर बालकों ने किया है। उम्मीद थी कि राजनाथ सिंह आज इस पर कुछ बोलेंगे या फिर मामले में जांच या कार्रवाई के आदेश देंगे। लेकिन उन्होंने इसका जिक्र तक करना जरूरी नहीं समझा। ऊपर से पूरे जेएनयू प्रकरण को एक नया मोड़ दे दिया। लेकिन राजनाथ सिंह जी को समझना चाहिए कि वह आग से खेल रहे हैं। इससे देश मजबूत होने की जगह अंदर से और कमजोर होगा। जिसकी जवाबदेही से वो नहीं बच सकेंगे। इसका नतीजा ये न हो कि सरदार पटेल को अगर देश को एक करने वाले गृहमंत्री के तौर पर देखा जाता है तो राजनाथ सिंह को देश को सबसे ज्यादा कमजोर करने वाले गृहमंत्री के रूप में देखा जाने लगे।
दिल्ली के भीतर एक और घटना घटी है जिसका जिक्र करना बहुत जरूरी है। शनिवार को सांस्कृतिक संगठन संगवारी के तीन सदस्यों को संसद मार्ग थाने की पुलिस ने सड़क पर चलते हुए उठा लिया। न ही उन्हें हिरासत में लेने का कारण बताया गया और न ही इसकी जरूरत समझी गई। पुलिस ने उनसे पूछताछ में ऐसे-ऐसे सवाल पूछे जिसे आज के दौर में किसी युवक का अभिभावक भी नहीं पूछने की हिमाकत करेगा। मसलन तुमने दाढ़ी क्यों रखी है? तुम जेएनयू वाले हो क्या? तुम डेमोक्रेसी वाले हो क्या? तुम ढपली क्यों रखते हो? ढपली न हुई मानों एके-47 हो गई। अब जेएनयू जैसा दिखना और गीत गाना भी देश के लिए खतरनाक हो गया है। डेमोक्रेसी वाला होना तो उससे भी ज्यादा खतरनाक है। यह सब कुछ कहीं और नहीं बल्कि देश की राजधानी में संसद की नांक के नीचे हो रहा है। यह लोकतंत्र है या पुलिस स्टेट? कौन कहता है कि आपातकाल लागू करने के लिए उसकी घोषणा जरूरी है?


