अभी दो दिन पूर्व फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया ( एफटीआईआई ) के छात्रों की एक सभा में जाने का मौका मिला। सभा का आयोजन विहान सांस्कृतिक संगठन ने किया था। उस दिन पुणे के इस ख्याति प्राप्त संस्थान में छात्रों की हड़ताल का 56वां दिन था।
जैसा कि सभी जानते हैं छात्रों की यह हड़ताल गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति के विरोध में चल रही है। चौहान की नियुक्ति को लेकर लगभग सभी क्षेत्रों में असंतोष देखा जा रहा है क्योंकि जिस संस्थान के शीर्ष पद के लिए सरकार ने उनका चयन किया है उस पद के योग्य उन्हें कोई नहीं मानता।
बात केवल छात्रों की नहीं है बल्कि फिल्म विधा से जुड़े सभी प्रमुख लोगों का मानना है कि उस पद पर किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाना चाहिए जो राष्ट्रीय और विश्व सिनेमा के बारे में एक अच्छी समझ रखता हो। अच्छी समझ की तो बात ही छोड़ दें, गजेन्द्र चौहान को सामान्य जानकारी भी नहीं है। ऐसा उनके इस दौरान आए विभिन्न साक्षात्कारों को देखने के बाद दावे से कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति में छात्रों की राय को अगर दरकिनार कर भी दें तो फिल्म विशेषज्ञों की राय का सम्मान करते हुए सरकार को इस मुद्दे पर संजीदगी से विचार करना चाहिए था।
अफसोस है कि सरकार ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। गजेन्द्र चौहान चूंकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं इसलिए सरकार को लगता है कि अगर उनकी नियुक्ति पर पुनर्विचार किया गया तो इससे संगठन कमजोर साबित होगा। लिहाजा 56 दिनों की हड़ताल के बावजूद सरकार की तरफ से अभी तक हड़ताली छात्रों के साथ किसी तरह के संवाद की संभावना नहीं दिखायी दे रही है।
संवाद तो दूर इन छात्रों के खिलाफ धमकियों और ब्लैकमेल का सहारा लिया जा रहा है। इतने लंबे समय तक चलने वाली ऐसे गिनी-चुनी हड़तालें ही होंगी जिसमें हड़ताल करने वाले पक्ष की ओर से किसी तरह की आर्थिक मांग मसलन स्कॉलरशिप बढ़ाना, फीस कम करना या हॉस्टल में सुविधाओं में वृद्धि करना जैसी कोई मांग न रखी गयी हो।
सभा में एफटीआईआई के कुछ पूर्व छात्र भी शामिल थे जिन्होंने मौजूदा आंदोलन के समर्थन में अपनी बात कहीं। सरकार ने छात्रों को धमकी दी है कि अगर उनका आंदोलन लंबे समय तक जारी रहा तो संस्थान की बागडोर किसी निजी कंपनी को सौंप दी जाएगी। जाहिर है कि ऐसी हालत में वहां पढ़ने वाले छात्रों पर लगभग 10 गुना आर्थिक बोझ बढ़ जाएगा। सरकार को लगता है कि इस हथकंडे से आंदोलन को तोड़ा जा सकता है।
सरकार के अड़ियल रवैये को देखते हुए ऐसा लगता है कि सरकार ने मन बना लिया है कि यह संस्थान और इसकी सारी परिसंपत्ति किसी अडानी अथवा अंबानी को सौंप दी जाय और इसके लिए वह कोई न कोई बहाना ढूंढ रही है।
छात्रों के सामने मुश्किल यह है कि इस साजिश को समझने के बावजूद पीछे नहीं हट सकते क्योंकि उन्होंने बुनियादी तौर पर गजेन्द्र चौहान अथवा उनके साथ संचालक मंडल में आए पांच लगभग अज्ञात लोगों की योग्यता पर ही नहीं बल्कि इस चयन की समूची प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
ऐसी स्थिति में आज समय की मांग है कि छात्रों के समर्थन में देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय छात्र संगठन, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी और बुद्धिजीवी इकट्ठे हों और सामूहिक तौर पर आवाज उठाएं जिससे इस महत्वपूर्ण संस्थान को कॉरपोरेट की थैली में जाने से रोका जा सके।
आनंद स्वरूप वर्मा
आनन्द स्वरूप वर्मा, वरिष्ठ पत्रकर हैं। समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक हैं।