क्या वैज्ञानिक संघ परिवार और मोदी जी को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं ?
क्या वैज्ञानिक संघ परिवार और मोदी जी को बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं ?
विज्ञान रैली : दिशा और संकेत
जुलूसों और रैलियों के दिन फिर लौट आए हैं। फिर अपनी अपनी मांगे लेकर लोग सड़कों पर उतरने लगे हैं। इनमें वे समूह शामिल हैं, जो वैश्विकीकरण की प्रक्रिया में हाशिये पर फैंके गए हैं (जैसे कि किसान और मजदूर), और वे भी, जो विकास के मौजूदा दौर में अपने आप को वंचित महसूस करते हैं (आरक्षण की मांग करने वाले जाति विशेष)। अभिव्यक्ति की आज़ादी के सवाल को लेकर लेखक और कलाकार भी जुलूस निकाल रहे हैं। अपने देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में लोगों की रास्ते पर उतरने की प्रक्रिया जारी है।
हाल ही में अपने देश में महा मोर्चा और विराट रैलियों के बीच निकले एक छोटे से, लेकिन महत्वपूर्ण जुलूस को माध्यमों ने अनदेखा कर दिया।
नौ अगस्त (अगस्त क्रांति दिन) को देश के प्रमुख शहरों तथा कुछ कस्बों में निकली विज्ञान रैली अनूठी तो थी ही, साथ ही साथ देश और विश्व में चल रही प्रक्रिया का वह एक अभिन्न हिस्सा भी थी। आएँ, हम उसे और उससे उपजे सवालों को समझने की कोशिश करें।
देश के इतिहास में पहली वैज्ञानिक, शोध कर्मी तथा विज्ञान के छात्र रास्ते पर उतार आयें, यह बात अपने आप में महत्व रखती है। वह कौन सी मजबूरी थी जो इस सम्पन्न, सुविधा-भोगी और अंतर्मुख समूह को अपनी ‘ऊंची अटरिया’ से उठाकर रस्तों पर ले आई? मीडिया के एक तबके ने पूछा भी – इन को कॉंग्रेस के जमाने में जुलूस निकाल ने की क्यों नहीं सूझी? किसी ने जवाब में कहा - यह सब संघ परिवार और मोदी जी को बदनाम करने की साजिश है। क्या वाकई यह संसदीय राजनीति के शतरंज की एक चाल है, या वह भारत में विज्ञान की दिशा, वैज्ञानिकों की सोच तथा अंतिम जन के विकास को लेकर कुछ नया करने की संभावनाएं जगाती है?
अनुसंधान और शिक्षा पर अधिक व्यय हो
रैली की पहली मांग थी कि देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीडीपी) का 3% विज्ञान-प्रौद्योगिकी के अनुसंधान पर खर्च किया जाएँ। कई सालों से भारत सरकार जीडीपी का महज 0.9% अनुसंधान पर खर्च कर रही है, जब कि अन्य देश – जो सुपर पावर बनने का दावा भी नहीं करते - इस से कई गुना अधिक खर्च उस पर करते रहे हैं (जापान – 3.47%, द. कोरिया – 4.1%, स्वीडन – 3.16%)। विज्ञान-प्रौद्योगिकी के इस युग में निरंतर अनुसंधान यही सफलता की कुंजी है। भारत सरकार द्वारा खर्च किए जानेवाली इस अपर्याप्त राशि में भी अनुसंधान का भार वहन करने वाली डी एस टी तथा सी एस आई आर के हिस्से में कुल राशि का महज 14.5% हिस्सा आता है। सातवें वेतन आयोग द्वारा वेतन में जो वृद्धि की गयी है, उस के लिए भी बजट में प्रावधान नहीं किया गया। इस का मतलब अनुसंधान पर होने वाले वास्तविक व्यय में कटौती की जा रही है। इस का सीधा विपरीत असर राष्ट्रीय प्रयोग शालाएँ तथा अनुसंधान केन्द्रों से लेकर आई आई टी, एन आई टी और विश्वविद्यालयों में होने वाले अनुसंधान पर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों की जमात यह मांग करते वक़्त इस राशि के समुचित उपयोग की नैतिक ज़िम्मेदारी भी उठाने के लिए तैयार है। वह पिछले सरकार की अकर्मण्यता को भी उजागर कर रही है। इन तथ्यों को कोई अनदेखा कर वैज्ञानिकों पर पक्षपात का इल्ज़ाम लगाना ज्यादती है।
विज्ञान रैली के आयोजकों की दूसरी मांग थी कि राज्य तथा केंद्र मिल कर शिक्षा पर जीडीपी का 10% हिस्सा खर्च करें।
वैश्विकीकरण के इस दौर में सारी सरकारें शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जिम्मेदारियों से मुंह फेर रही हैं। भारत में शिक्षा का समूचा क्षेत्र निजी क्षेत्र को सौगात के रूप में भेंट चढ़ाया जा रहा है। फलस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र के शिक्षा संस्थान बिखर रहे हैं। आज जब आई आई टी तथा आईएसआर जैसी नामवर संस्थाओं के सामने भी संरचना के गंभीर सवाल खड़े हैं, तब ज़िला परिषद के प्राथमिक विद्यालयों की हालत क्या होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
विकसित देशों ने अपने विकास के प्राथमिक चरण में शिक्षा पर भारी-भरकम राशि की लागत की। आज उन के पास पुख्ता और कार्यक्षम संरचनाएँ हैं। फिर भी वे जी डी पी का अच्छा-खासा हिस्सा आज भी शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं और अन्य देश उसी दिशा में बढ़ रहे हैं (अमरीका- 6.6%, नॉर्वे- 6.5%, न्यूजीलैंड – 6.9%, क्यूबा – 12.4%) / ऐसे में भारत में जीडीपीका महज 3% शिक्षा पर खर्च होना यह सरासर अन्याय नहीं, तो क्या है?
विज्ञान बनाम छद्म-विज्ञान
वैज्ञानिकों द्वारा उठाया गया तीसरा मुद्दा वाजिब तो है, लेकिन कईयों को परेशान करने वाला है।
सवाल है जनता में वैज्ञानिक सोच को मजबूत बनाने का। विज्ञान यह केवल ज्ञान संचय नहीं है; वह है सोचने तथा विश्लेषण करने की पद्धति, ज़िंदगी के हर पहलू को परखने का अंदाज़।
हम किसी बात को इसलिए कबूल नहीं करेंगे, कि किसी व्यक्ति, किताब, विचारधारा ने वैसा कहा है; बल्कि जो बात प्रयोग द्वारा परखी जा सकती है, तर्क के आधार पर जो टिकी है, उसी को हम अपनाएँगे, इसका नाम है विज्ञान। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51-ए हमें बताता है कि यह दृष्टिकोण हर भारतीय के मन में बोना यह हम सब का कर्तव्य है। लेकिन 21 वी सदी में भी हम अंधविश्वास और कुरीतियों को गले लगाए बैठे हैं। कभी किसी को टोना करने के संदेह से मार दिया जाता है, तो किसी लड़की के बालों में गांठें हो जाने से उसे देवदासी बनाकर ईश्वर के नाम पर नर राक्षसों के हाथों सौंपा जाता है। ग्रहण और औरतों के आर्तव (मासिक) चक्र को लेकर पढे-लिखे भारतियों के मन में भी कितनी सारी गलत धारणाएँ जड़ जमा कर बैठी हैं। इस पृष्ठभूमि में गत कुछ वर्षों से अपने देश में जो घटनाएँ घट रही हैं उन्हें देख कर कई वैज्ञानिक सोचते हैं कि वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के बजाय उसे उखाड़ कर फेंकने की, उस की जगह छद्म-विज्ञान को प्रतिष्ठित करने की योजनाबद्ध कोशिशें अब हो रही हैं।
अगर युवा मस्तिष्क वैज्ञानिक ढंग से सोचने लगे, तो वे ज़िंदगी की हर चीज़ को परखने लगेंगे, हर रूढ़ि-परंपरा पर सवाल खड़ा करेंगे यह ड़र आज के आकाओं के मन में जा बैठा है। इसलिए वे हर परंपरा तथा मिथकों को छद्म-विज्ञान का जामा पहना रहे हैं। इसलिए अब हाथी के सर वाले गणेश जी का जन्म यह विश्व की पहली प्लास्टिक सर्जरी है, ऐसा प्रचार किया जा रहा है। सौ कौरवों का जन्म यह जेनेटिक अभियांत्रिकी की मिसाल बन गयी है। ये बातें अब केवल सोशल मीडिया द्वारा फैलायी नहीं जाती, बल्कि वे अब आदरणीय नेताओं के व्याख्यानों, स्कूल-कॉलेज के पाठ्य पुस्तकों और वैज्ञानिक गोष्ठियों का हिस्सा बन चुकी है।
गत वर्ष इंडियन नेशनल कांग्रेस में ‘प्राचीन भारत में विमान विद्या’ नाम का एक शोधनिबंध पढ़ा गया, जो किसी स्कूल के विज्ञान क्लब में पढ़े जाने के स्तर का भी नहीं था।
हाल ही में म. प्र. सरकार ने अस्पतालों में चिकित्सकों के साथ ज्योतिषियों को बिठा कर रोगी व्यक्ति की कुंडली के आधार पर उस की चिकित्सा करने की घोषणा की है।
पंचगव्य को लेकर सरकार द्वारा उच्च स्तरीय अनुसंधान समिति का निर्माण करना यह बात भी कई वैज्ञानिकों को खटक रही है। इसलिए वैज्ञानिक सोच बढ़ाने की अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी का एहसास सरकार तथा जनता को कराना उन्हों ने आवश्यक समझा।
इसीलिए विज्ञान रैली कि तीसरी मांग थी कि पाठ्य-पुस्तकों में लिखी जाने वाली बातें और देश के विकास के लिए बनाई जानेवाली योजनाएँ इन सब का आधार प्रमाणाधारित विज्ञान (evidence-based science) हो।
कुछ सावधानियाँ
हालांकि विज्ञान रैली के आयोजकों की भूमिका सराहनीय है, अपनी भूमिका लोगों तक पहुँचने में उन्हें कुछ सावधानियाँ बरतनी होगी।
हम इस बात को समझ लें कि वैज्ञानिक नजरिये की बात करनेवाले लोग आज अल्पमत में हैं। सारा राजनैतिक-सांस्कृतिक माहौल भी तर्क और विवेक की जगह भावना, आवेग और जल्प को तूल देनेवाला है। ऐसे में विज्ञान की बात करने वाले लोग भारतीय परंपरा के विरोधी हैं, पश्चिमी सभ्यता के नुमाइंदे हैं ऐसा हौआ खड़ा कर लोगों को वैज्ञानिक सोच से दूर ले जाना बहुत आसान है। इस तरह से वातावरण बनाने की कोशिशें भी की जा रही हैं।
इसलिए पहले हम इस बात को स्वीकार और प्रसारित करें कि मामला भारत बनाम पश्चिम ऐसा नहीं है; वह परंपरा बनाम आधुनिकता का भी नहीं है। क्योंकि, विज्ञान किसी बात को इस रवैये से नहीं देखता।
हमारा झगड़ा परंपरा से नहीं, बल्कि अवैज्ञानिक, अमानवी, गलत रूढ़ियों से हैं।
परंपरा में अगर कोई बात वैज्ञानिक, तर्कसंगत तथा जनहित में है, तो उसे स्वीकार करने में हमें कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। जिज्ञासा, शोध, किसी भी मसले पर नए और अनूठे सवाल उठाना यह विज्ञान की जड़ है। हमारे प्राचीन ग्रन्थों में भी ‘अथाS तो ब्रह्म जिज्ञासा’, अर्थात ब्रह्म जानने की जिज्ञासा को अहम महत्व दिया है। यह जिज्ञासा केवल अध्यात्म के रास्ते से ही नहीं, बल्कि जड़ जगत का निरीक्षण, अनुसंधान, प्रयोगों के निष्कर्षों पर बहस और उस आधार पर सिद्धांतन इस रास्ते से भी आगे जाती थी। इसीलिए, धातुविज्ञान, कृषिविज्ञान, आयुर्वेद आदि ज्ञानशाखाओं में हम ने काफी प्रगति की थी। किसी जमाने में, खास कर जब तर्क और विवेक पर आधारित बौद्ध परंपरा मजबूत थी, तब अपने देश में भी वैज्ञानिक विमर्श बड़े स्तर पर होता था। आयुर्वेद के सवालों पर परिषदों का आयोजन किया जाता था, जिस में केस स्टडीज़, उपचार पद्धतियाँ, औषधि विशेष आदि पर घमासान बहस होती थी, जिस में देश के विभिन्न प्रदेशों से आये विशेषज्ञ शामिल होते थे। लेकिन कालांतर से यह परंपरा खंडित हुई। पुरोहितों का वर्चस्व बढ़ा, ज्ञान के नाम पर सिर्फ रटना जारी रहा। वह भी उच्च वर्ण के पुरुषों तक सीमित रहा। ‘संशयात्मा विनष्यति’ कहा कर हम ने सवाल उठाने पर पाबंदी लगा दी। सारे दुनिया से व्यापार करनेवाले देश में समुद्र लांघने को महापाप घोषित कर दिया गया। इस कारण बहस, विमर्श, ज्ञान निर्मिति – सब ठप्प हो गये। अंधविश्वास मजबूत हुए। सामाजिक-सांस्कृतिक तथा आर्थिक विकास की धार कुंज हो गयी। अगर इस इतिहास को समझ कर हम दूसरों को समझाएँगे, तो हम पर भारतीयता का विरोधी होने का आरोप नहीं लगेगा। हम फिर जन सामान्य को यह बात समझा पाएंगे कि इतिहास का अभिमान रखना गलत नहीं है, लेकिन उस का वृथा अभिमान ढोना गलत है।
गोमूत्र से लेकर पुष्पक विमान तक जो दावे किए जा रहे हैं, उन्हें हम आधुनिक विज्ञान के पैमानों पर परख कर देखें। अगर उन में कुछ तथ्य निकले, तो हम उन्हें अपनाएँगे, वरना इतिहास का अंश मानकर छोड़ देंगे, ऐसी भूमिका हम ले सकते हैं। साथ ही साथ हम उन्हें यह समझा दे कि बिना विज्ञान के, प्रौद्योगिकी बढ़ नहीं सकती। इसलिए जिस समाज में गुरुत्वाकर्षण तथा गतिकीय सिद्धान्त तक की समझ निर्माण नहीं हुई, उस में भला विमान विद्या कैसी विकसित हो सकती है?
अगर विमान बनाने के डिजाइन हमारे प्राचीन शास्त्रों में दिये गए हैं, तो उन के आधार पर कोई विमान बनाकर उड़ा कर दिखाएँ, तब हम उन्हें मानेंगे, वरना नहीं, यह बात हम स्कूली बच्चों को भी समझा सकते हैं। खुली, पूर्वग्रह और अभिनिवेश से मुक्त सोच यही हमारा लक्ष्य हो।
अनगिनत संभावनाएं
विज्ञान रैली का यह प्रथम कदम कई सारी संभावनाओं को जगाता है। एक तरफ वह देश के उन सब तबकों से वैज्ञानिकों का रिश्ता जोड़ता है, जो वैश्विकीकरण की गलत धारणाओं के कारण विनाशकरी विकास के बली चढ़ाए गए। दूसरी तरफ यह कदम वह विश्व भर में चल रहे वैज्ञानिकों के आंदोलन से उन्हें जोड़ता है। इसी वर्ष वसुंधरा दिन - 22 अप्रैल को दुनिया के सैंकड़ों शहरों में इसी तरह की विज्ञान रैली का आयोजन किया गया था, जिस में लाखों की तादाद में लोग शामिल हुए। उन की मांगें भी वहीं थी, जो भारत में उठाई गयी। क्योंकि, अनुसंधान तथा शिक्षा-स्वास्थ्य पर खर्च करने के बजाय कॉर्पोरेट कंपनियों कि जेबें भरना, ठोस वैज्ञानिक आधार पर साबित तथ्य नकार कर (मसलन वैश्विक तापमान वृद्धि) छद्म-विज्ञान की शरण लेना ये आज ट्रम्प की अमरीका में भी अहम मुद्दे हैं।
ग्लोबल तथा लोकल दोनों स्तर पर जुड़ने के माने हैं विज्ञान का लोकविज्ञान की ओर बढ्ना। अब तक जो विज्ञान केवल सत्ताधारी तबकों के हित में काम कर रहा था, उसे अगर सामान्य जन से और विश्व की समस्याओं से जुड़ना होगा तो उसे अपने आप को व्यापक करना होगा। इसलिए पहले वैज्ञानिकों को अपनी ‘ऊंची अटरिया’ से नीचे उतरना होगा, पूर्वग्रहरहित खुली दृष्टि से बिना प्रलोभन के काम करना होगा। आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी की सारी प्रतिभाएँ बाज़ार की मोहताज हैं। उन के अनुसंधान की प्राथमिकताएँ बाज़ार तय करता है, न कि समकालीन वास्तव। उन से लड़े बगैर विज्ञान खुद मुक्त नहीं हो सकता, न तो वह दूसरों की मुक्ति का साधन बन सकता है।
वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देते वक़्त हम वैज्ञानिकों के तानाशाही को बढ़ावा न दें। वरना, बी टी अन्न से लेकर परमाणु ऊर्जा और बड़े बांध जैसे लोगों से जुड़े सवाल पर ‘ये विशेषज्ञों की बातें हैं’ ऐसा कहकर लोगों की आवाज़ बंद कर दी जाएगी (जैसा कि अब तक होते आया है)। प्राकृतिक विज्ञान के साथ साथ सामाजिक विज्ञान और मानवीयकी को भी बढ़ावा देने की सख्त ज़रूरत है, वरना प्रौद्योगिकी के गलत उपयोग से पनपे प्रश्नों का समाधान हम कहाँ पर ढूँढेंगे?
विज्ञान का लक्ष्य है सर्व जन तथा प्रकृति का हित। उस का विकास खुले विचार के मुक्त अवकाश में ही हो सकता है। उस पर बंधन होगा तो सिर्फ विवेक की चौखट का। आशा है वैज्ञानिकों की रैली यह इस दिशा में उठा पहला कारगर कदम साबित होगा।


