क्या हमें आज आजादी का उत्सव मनाना चाहिए या गंवाए गए मौकों पर दुख जताना चाहिए?
क्या हमें आज आजादी का उत्सव मनाना चाहिए या गंवाए गए मौकों पर दुख जताना चाहिए?
नई आवाज की दरकार
15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को उम्मीद की जो किरण पैदा हुई थी, वह आज मद्धम पड़ गई है. हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आजादी को हमारी साझी तकदीर से सामना कहा था. वहीं संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष भीमराव अंबेडकर ने नए गणराज्य को यह कहते हुए चेताया था कि अंतर्विरोधों का जीवन है, जहां राजनीतिक समानता की गारंटी दी जा रही है नागरिकों को सामाजिक और आर्थिक अधिकार दिए बगैर. महात्मा गांधी ने नोआखली में जाकर कम्युनिस्टों की भाषा में कहाः ये आजादी झूठी है.
Dr. Syama Prasad Mookerjee never-never participated in the anti-colonial freedom struggle.
आजादी को लेकर इस तरह के विरोधी विचार पिछले 70 साल में लगातार सुनाई देते रहे हैं. उत्सव मनाने को बहुत कुछ है. हम लोकतंत्र बने रहे और इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि करोड़ों लोग आज के 70 साल पहले के मुकाबले अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के मामले में अधिक स्वतंत्र हैं. लेकिन दूसरी तरफ यह भी एक सच है दलित सीवर साफ करते हुए मर रहे हैं, महिलाओं पर हमले हो रहे हैं और मुसलमानों को पीट-पीटकर मार दिया जा रहा है. हमने चुनाव आयोग और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान जैसे कई संस्थाओं को खड़ा तो किया लेकिन देश की सेहत के लिए जरूरी कई संस्थाओं को बैठा भी दिया. हमने विविधता और सहनशीलता को बनाए रखा. इसके बावजूद हमने एक ऐसी सरकार को चुना जो धर्मनिरपेक्षता की सरकारी नीति को खत्म करने और बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देने में लगी है.
तो क्या हमें आज आजादी का उत्सव मनाना चाहिए. या फिर हमें गंवाए गए मौकों पर भी दुख जाहिर करना चाहिए और मौजूदा चुनौतियों पर सोचना चाहिए?
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आजादी की व्याख्या के विरोधाभासों का एक सकारात्मक पहलू भी है. इसने राजनीतिक और अकादमिक बहस को जन्म दिया. जिससे सभी का ज्ञानवर्धन हुआ. इस जर्नल ने इस काम में अपनी भागीदारी निभाई. इसमें लिखने वाले लोगों की संख्या और उनका फलक काफी व्यापक है. एक तरह से सामाजिक विज्ञान और लोक नीति को लेकर विमर्श और शोध बढ़ा है. इसके बावजूद अकादमिक क्षेत्र और लोक नीति व राजनीति में दूरी बढ़ी है. नीतियों के निर्धारण में अकादमिक क्षेत्र की नहीं सुनी जा रही है और सरकार में शामिल लोगों को अकादमिक क्षेत्र से कोई लेना-देना नहीं है.
आजादी के बाद के दशकों में सामाजिक विज्ञान से जुड़े जानकार राष्ट्र निर्माण की चुनौती से जूझ रहे थे. इसलिए यह कोई संयोग नहीं है कि संसाधनों की कमी के बावजूद सामाजिक विज्ञान भारत में बढ़ा. भारतीय विश्वविद्यालय में वैश्विक स्तर की सोच और प्रतिभाओं का सृजन किया. यह भी कोई संयोग नहीं था कि भारत के विकास के माॅडल पर वैश्विक छाप थी. साम्राज्यवादी शासन से मुक्त हुए देशों में भारत के अकादमिक प्रतिभाओं ने अपनी ऐसी पहचान बनाई जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता था. संक्षेप में कहें तो भारत ने सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी स्थिति बनाई जिसका असर लोक नीति और राजनीति पर पड़ा.
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1980 के दशक से भारत में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ. साक्षरता की बढ़ती दर और सामाजिक बदलावों की वजह से लाखों नए छात्र भारतीय कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में आए. यह विस्तार सिर्फ इंजीनियरिंग, विज्ञान और प्रबंधन में नहीं बल्कि सामाजिक विज्ञान और मानविकी में भी दिखा. इससे पैदा होने वाली मांग को पूरा करने में सरकारी धन हमेशा कम पड़ा. निजी शिक्षण संस्थानों का सामाजिक विज्ञान से कोई मतलब नहीं रहा. कम से कम दो पीढ़ियां ऐसी बड़ी हो गई हैं जिनका सामाजिक विज्ञान और मानविकी की शिक्षा से कोई संबंध नहीं रहा. इस खाई को टेलीविजन और आजकल वाट्सएैप भरने का काम कर रहा है. इस आधार पर राजनीतिक क्षेत्र को यह समझना चाहिए कि इस तरह की शिक्षा का क्या परिणाम हो सकता है.
सामाजिक विज्ञान और मानविकी की उपेक्षा से कई समस्याएं पैदा हो रही हैं. इन क्षेत्रों में ऐसे लोग आ गए हैं जो सरल से सरल चीज को जटिल बना देते हैं. इससे सामाजिक विज्ञानियों के लिए समाज को समझ पाना मुश्किल हो गया है और यह काम सरकार पर निर्भर होकर रह गया है.
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भारत आज के तीन या दो दशक पहले वाला नहीं है. लिखने-पढ़ने वालों की संख्या, काम और घूमने के लिए यात्रा करने वालों की संख्या, संपत्ति रखने वालों की संख्या, पेशे और आय में हुए बदलाव, ये सभी आजादी के वक्त के भारत या इंदिरा गांधी के तुरंत बाद के भारत से काफी अलग हैं.
लेकिन इस भारत को समझाने के लिए नए सिद्धांत और नई पद्धति कहां है? आज के भारत को समझाने वाले मॉडल कहां हैं? नए भारत और अकादमिक दुनिया की खाई की वजह से न तो अचंभित करने वाले चुनाव परिणामों को समझा जा सकता है और नोटबंदी के अनापेक्षित नतीजों को. ऐसे ही और भी कई अनसुलझे विषय हैं.
DR SYAMA PRASAD MOOKERJEE ORGANIZED RECRUITMENT CAMPS FOR THE BRITISH ARMY
आजादी के 70 साल बाद हम ऐसे देश में रह रहे हैं जिसकी पहचान करना न सिर्फ उनके लिए संभव नहीं है जो आजादी के लिए लड़े थे बल्कि इस जर्नल में लिखने वालों के साथ बहुत अन्य लोगों के लिए भी संभव नहीं है.
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स्वतंत्रता दिवस एक ऐसा मौका है जब अपने काम के प्रति फिर से प्रतिबद्धता दोहराई जाए. इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली और इसका पुराना अवतार इकॉनोमिक वीकली भारत की आत्म-जागृति में गर्व से शामिल रहा है. एक ऐसे समय में जब खोज की भावना को मजबूत करने की जरूरत है, हम अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहना चाहते हैं कि हम संवाद, बहस और अनसुने लोगों को आवाज देने के प्रति प्रतिबद्ध रहेंगे. जिन लोगों को साम्राज्यवाद का अनुभव नहीं है उनकी जरूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए नई आवाज का उदय जरूरी है.
इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली का संपादकीय
(Economic and Political Weekly, वर्षः 52, अंकः 31, 5 अगस्त, 2017)


