सफदर हाशमी का जन्मदिन हम खूब मनाते हैं।
गिरदा की यादें भी अभी दफन हुई नहीं हैं।
गद्दर हमारे दिल में, दिमाग में हैं और हमारे पुराने साथी दिवंगत शिवराम हैं, लेकिन हम रंगकर्म की विरासत बचा नहीं पा रहे हैं।
जहूर आलम और रंगकर्म
जहूर आलम हमारे ऐसे मित्र हैं, जो फिल्म उद्योग की चकाचौंध में बह जाने को तैयार नहीं है और नैनीताल में युगमंच के लिए दिया बत्ती करने वाला वही बचा हुआ है।
इतना बड़ा कलाकार और सुबह से देर रात तक कपड़े की दुकान में बैठा हुआ पहाड़ का सारा रंग कर्म साधता है। रंग कर्म चूंकि बेहद प्रासंगिक माध्यम है क्योंकि इसके बिना शायद किसी और माध्यम में हम आगे बात चला सकें।
रंगकर्म का असली मूल्य
अब रंगकर्म का असली मूल्य हमारे सामने आ रहा है। हमारे गिरदा बड़े कवि थे। अंदर बाहर पारदर्शी थे।
गिरदा को जिनने नैनीताल फ्लैट्स पर कार्यकर्म एंकर करते नहीं देखा, वे सही मायने में असली गिरदा के दर्शन से वंचित है।
गिरदा रंगकर्मी थे। असली रंगकर्मी और पहाड़ में अलख शायद वे इसलिए जला सके।
आधुनिक भारतीय साहित्य में सामाजिक यथार्थ को प्रतिरोध का गुरिल्ला युद्ध बनाकर साहित्य लिखने वाले हाल में दिवंगत हमारे अति प्रिय नवारुण भट्टाचार्य भी भारतीय गण नाट्यसंघ के वारिस थे और रंगकर्म ही दरअसल उनका माध्यम था, जिसे उनने गद्य पद्य में स्थानांतरित किया।
गिरदा चिरकुट में लिखने वाले ठैरे
गिरदा चिरकुट में लिखने वाले ठैरे, राजीवदाज्यू ने कहा जब हमने भाभी को कापीराइट दिलाने के जुगाड़ के बारे में बात चलायी।
राजीव दा ने साफ-साफ कहा कि गिरदा मुखर बहुत थे लेकिन लिखा और लिखकर समेटा उनने बेहद कम है। उनका लिखा भी सारा का सारा उनके रंगकर्म में शामिल है।
भुलाये गये शिवराम, जहूर को पहचानते नहीं
हमारे लिए तो गद्दर के साथ ये दो नाम ही हैं, जो सीधे रंगकर्म से जुड़े हुए हैं और जनसरोकार ही जिनका वजूद रहा है।
हमारे मित्र शिवराम भी कुछ वैसे ही थे। लेकिन राजस्थान के कोटा से उनकी निरंतर सक्रियता का उतना नोटिस लिया नहीं गया है।
ठीक उसी तरह जैसे सर से पांव तक भले मानुष जहूर बाबू के भाव हमें ठीक से मालूम भी नहीं है।
बटरोही उवाच
बटरोही ने गिरदा की किताबें कोर्स में लगाने के बाबत चिढ़कर कहा कि कौन लगायेगा।
समझ लीजिये पहाड़ के विश्वविद्यालयों में क्या हो रहा है। गिरदा की विधवा हीरा भाभी को अपने दिवंगत पति पर गर्व जरूर होगा पर पूरा पहाड़ मिलकर भी उनके आंसू नहीं पोंछ सकते।
नैनीताल डीएसबी कालेज और हल्दवानी एमबी कालेज, रुद्रपुर महाविद्यालय, काशीपुर महाविद्यालय, अल्मोड़ा कालेज, गढ़वाल विश्वविद्यालय परिसर और उत्तराखंड के तमाम शिक्षा संस्थान कभी पर्यावरण चेतना और पर्यावरण आंदोलन के केंद्र होते थे, जिसकी पूंजी अब भी हमारी कुल जिंदगी है।
डिजिटल देश में हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों उपभोक्ता है और हमारा जीवन, पहाड़ और मैदान सिर्फ बाजार है। मुक्त बाजार।
नांदीकार नाट्य उत्सव में मणिपुर
आज ही कोलकाता में नांदीकार का राष्ट्रीय नाट्यउत्सव शुरु हुआ है अकादमी में। रुद्रप्रसाद सेनगुप्त जाहिर है कि अब भी जिंदा हैं।
इस बार भी मणिपुर से रतन थियाम की विरासत चली आयी है।
मणिपुर के बंगाल से स्थानांतरित वैष्णव आंदोलन, मातृसत्ता, शास्त्रीय नृत्य लाई हरोबा और मार्शल आर्ट के साथ मणिपुर का रंगकर्म विशेष सैन्यबल सशस्त्र कानून के प्रतिरोध में मणिपुरी जनजीवन की अभिव्यक्ति की निरंतरता है।
ग्लोबीकरण से हुए चौतरफा सर्वनाश पर केंद्रित
इस बार रतन थियाम का बेटा थओवई थियाम निर्देशक बतौर कोलकाता नाट्य उत्सव में पेश कर रहे हैं मणिपुर कोरस रिपोर्टरी थियेटर का नाटक वाकथाई। जिसकी कथा ग्लोबीकरण से हुए चौतरफा सर्वनाश पर केंद्रित है।
एक प्रकृति निर्भर जनसमुदाय के वजूद खो देने की व्यथा कथा है यह। मुक्त बाजार में वह जनसमुदाय अपना सब कुछ खो देता है। अपनी पहचान, आत्म सम्मान, आजीविका, विरासत, संस्कृति लोक, अपनी भाषा तक। यह पूरे हिमालय की कथा है।
यह उत्तर आधुनिक उत्तराखंड की कथा जितनी है उतनी ही हिमाचल से लेकर सिक्कम की कथा भी है।
O- पलाश विश्वास