खबरों के इलाके में कविता : रघुवीर सहाय
खबरों के इलाके में कविता : रघुवीर सहाय
किसी रचनाकार के खाली पड़े सिरहाने और पैताने तक की अस्त-व्यस्त खाली पड़ी पसरी दुनिया से कुछ भी बटोरकर, सहेजकर, समेटकर, एकत्रित कर उसके जाने के बाद बचे हुए नगदी दिनों की तफ्तीश करना बिल्कुल वैसा ही है, जैसे शिकारी के खाली मचान और बंधी हुई बकरी के खाली खूंटे को देखकर गोलियों की आवाज़ और तीव्रता का अनुमान लगाना, और ज़मीन पर पाँव के निशाँ देखकर यह पहचान करना कि ये चीता, शेर, बाघ, तेंदुआ, या कुछ और था. शिकारी की जमीन पर पड़ी बंदूक देखकर ये धारणा बनाना कि शिकारी को सँभलने का मौका शायद नहीं मिला और वो मचान से फिसलकर या अनजाने ही अपने बेसुधपने में धँसककर नीचे आ गिरा होगा। उसकी मौत एक ‘रहस्यनामा’ या फिर ‘अकस्मात हादसे का शिकार’ या ‘अनहोनी’ या फिर ‘होनी थी सो हो गयी, फिर खूब छानबीन करने पर कुछ धब्बे लहू के पाकर यह अंदाजा लगाना कि शिकार कितनी बेरहमी और क्रूरता से मारा गया। उसे कितनी दूरी तक ले जाकर घसीटते हुए उसकी पसलियों का मर्दन किया गया होगा और इन तमाम साक्ष्यों को आधार बनाकर एक साफ़ सुथरी खबर बनाना।
यकीनन ये काम भी बेहद मुश्किल, पूर्वाग्रह और दुराग्रह से भरा है.
‘एक समय था’ कविता संग्रह कुछ इसी तरह की पूर्वपीठिका ‘ये अन्तिम कवितायें’ से भरा हुआ है। कविता के बहाने आदमी और दुनिया को समझने से कहीं ज्यादा कविता को लेखन कारखाने में चिट-पुर्जों, निमंत्रणपत्रों की सादी पीठ, लिफ़ाफ़े के रिक्त स्थानों, सूचनापत्रों, सिगरेट की डिब्बियों आदि-आदि पर खोजने की जद्दोजहद प्राक्कथन में साफ़ झलकती है।
और फिर अंत में ऐसे भी संवाद मिल ही जायेंगे, जो ये कहते नहीं अघाते कि कवि अन्तिम समय में किस अवस्था, किस मिजाज़, किस मानसिक दशा से गुजरा है.... और जब कुछ और नहीं सूझता, तो कवि की सूझबूझ, तुनकमिजाजी, बेतकल्लुफी, को कविताओं से तुक मिलाकर उसके अन्तिम पहर के समय से जोड़कर कविताओं का व्यक्तिगत तौर पर स्थूल अर्थ की तलाश, अर्थ खोजने के क्रम में कुछ लक्षणों के साथ उसका मिलान करने लग जाते हैं।
क्या ये एक निहायत संजीदा कवि के साथ न्यायप्रियता और कविता की शास्वत्ता का सन्देश दे रहे हैं? या वो ये कहने की कोशिश कर रहे हैं कि कवि अपने अन्तिम दौर में खुद को ही जीवन के आखिरी समय की अन्तिम खबर की तरह पेश कर रहा है? क्या मृत्यु की चीत्कार पर दहाड़ देने वाला कवि निस्स्सहाय, निरुपाय भी कभी हो सकता है भला? यकीनन नहीं, मृत्यु पर कवि का साधक रूप, नियंता कितना प्रबल है –
“और फिर अंत में छाँटने लग गया
इनमें से काम का एक कागज
जीवन के अन्तिम दिन
यही करते हुए
इस कोठरी की रद्दी उसमें रखते हुए चल बसा.”
‘एक समय था’ कविता-संग्रह –पृष्ठ, 149
इतना ही नहीं, कवि को मरने के पूर्व ही मृत्यु का पूर्व-आभास और मृत्यु के पार भी जीवन जीने की इच्छा बेहद सबल है। और कवि इस बात को कहने में जरा भी नहीं सकुचाता कि “काम का एक कागज” उसे किस रूप में पाने की इच्छा है -
“अभी कुछ दिन और ज़िंदा रहूँगा
अधूरे लेखों को पूरा नहीं कर पाया तो
घर में जमा कागजों को छांटना है
और बहुत से काम के बर्तन हटाने हैं
जो कभी सहसा किसी की मेजबानी के वास्ते रखे थे
आखिर ये अधलिखी डायरियां लिए
कहाँ-कहाँ तक जाऊँगा.
कवि मृत्यु से नहीं घबराता, न ही हारता है, न ही उससे जीवन की भीख माँगता है, न गिड़गिड़ाता है, न ही मृत्यु को अन्तिम सत्य कहकर जीवन का विराम चाहता है, वो मृत्यु को बार-बार कविता में ला-लाकर जीवन की बची हुई अधूरी कामनाओं को पूरा करता चलता है। इसीलिए वो यह कहता है, कभी ‘चल बसा’ कभी कहता है ‘और ज़िंदा रहूँगा’ कभी ‘मैं बच रहा’ ‘मैं मर चुका हूँ’ ‘मेरे मरने पर’ ‘मैं अगर गया तो’ ‘मुझे अभी जीना है’ कवि मृत्यु से कतई बेपरवाह होकर उससे कई-कई तरह की पहेलियों नुमा बातें रखता है जैसे - .........जारी आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
‘तो मैं आराम से मरता
अगर मरा हुआ पैदा होता.
कवि इन पंक्तियों में साफ़ तौर पर ये कह रहा है कि मरा हुआ पैदा होने पर भी उसे उसमें जीवन की बू आ रही है, वो हर स्थिति में जीवन को ही स्वीकारता है मृत्यु उसके लिए जीवन से अधिक महत्त्व नहीं रखती। इसीलिए वो पुनः कह उठता है –
यह संसार बार-बार मर जाता है मेरे लिए
और मैं ज़िंदा रहता हूँ
और अगर संसार उस कवि को ज़िंदा जान पड़ता है जिसमें जीवन की संभावना, जीवेषणा, जीवन की तिश्नगी, जीवन-राग, जीवन का कोलाहल, जीवन की मृदुता, हर क्षण जीवन का आभास जिस रूप में भी नज़र आता है तब वो और अंदाज़ में कहता है –
फिर जब यह ज़िंदा होता है
मैं कुछ और ज़िंदा हो जाता हूँ
बार- बार इसमें जीवन खत्म हो जाता है.
कवि आज़ाद हिन्दुस्तान की दयनीय स्थिति को जानकर कहता है –‘हम एक मुश्किल समय में जीते हैं’ आज़ादी जिस दर्द से पाई गयी थी, उसमें अनगिनत कुर्बानियां, शहादतें, नए सूत्रधार पैदा करने वाली सख्शियतों वीरांगनाओं की हसरतों भरी ज़िंदगियाँ थी. कवि की नजर में अब ‘सिर्फ कुछ पट्टियां हैं फाहे हैं मरहम है.’ और ये सब कुछ महसूसने वाला कवि मृत्यु को पछाड़कर, मृत्यु को बारम्बार खंगालते हुए, मृत्यु का सामना किये, मृत्यु को छलते हुए, जीवन की ओर बढ़ने के लिए मृत्यु को तर्क से टटोलते, बरगलाते, ठिठोली करते, मृत्यु से आसक्त न होकर कहता है -
‘दस बरस और जियूँ
और अपने सामने उन्हें मरता देखूँ.
कवि मृत्यु पर पुनर्विचार, भी करता है। मृत्यु को कुछ और समय तक टालमटोल करते हुए उसे दिग्भ्रमित करने के लिए भी वो लोगों का आश्रय और उनका विश्वास हासिल करना चाहता है कि किसी तरह मृत्यु का पटाक्षेप हो तो कवि उसमें भी जीवन का अंश, जीवन का आह्वान देखते हुए मृत्यु को अपना सके।
मृत्यु यूँ न आये कि सब कुछ झाडकर ले जाए। अब तक तमाम संकल्पनाओं में जीता आदमी एकदम से शून्य में दाखिल हो जाए और दुनिया के ताने-बाने के शोर से विरत सन्नाटे में विचरण करती मृत्यु का ही साम्राज्य हो। मानो कवि ये चाहता है उसके लिए मृत्यु आपाधापी भरे जीवन की ही महिमा का गान भरा हो।
एक बार लोग क्षमा कर देते
तो मरता चैन से
कहता है थका वृद्ध
किन्तु अभय मिलते ही
मरने की चाह छोड़ देता है
लोग नए सिरे से क्षमा के विषय पर
विचारने लगते हैं.
यहाँ रघुवीर सहाय उस वृद्ध के बहाने खुद ही लोगों के विश्वास को भी जीवन जीने की अद्भुत शक्ति के आकर्षण में सवालिया घेरे में रख देते हैं, कि लोग क्षमा पर पुनः विचार करें। मृत्यु को लेकर ऎसी संकल्पना यकीनन तमाम ख्यातिनाम कवियों में अन्यत्र देखने को नहीं मिलती।
रघुवीर सहाय के लिए मृत्यु जैसे रंगमंच पर किसी किरदार का भरा पूरा अभिनय हो और वो किरदार सफलतापूर्वक उसमें कलाबाजियां दिखाता मृत्यु को भ्रमित करने, भांति-भांति से कुशलतापूर्वक पराजित करने की मंशा लिए अनेकों अभेद्य लोक रचता हो। उसके लिए मृत्यु किसी खल-चरित्र की भांति तो बिल्कुल नहीं है। हाँ वो उसे विदूषक के बतौर भले ही देखता हो। तभी तो कवि को इस बात का भी एहसास है –“मृत्यु के सामने होने से सब यथार्थ एक में जुड़ता है.”
रघुवीर सहाय जब मृत्यु से तमाम उधेड़बुन कर चुकते हैं, वे कतई मृत्यु से कतराते नहीं, बगल नहीं होते, धकियाते नहीं, ऊंघते-ऊबते नहीं, वो मृत्यु को जीवन की नित निजी क्षणों में शामिल किये मृत्यु का लिबास ओढ़कर उसके समक्ष खुद ही यह कहने लग जाते हैं –
ऐसा लंबा जीवन ही क्या मृत्यु नहीं है
और जो खड़ी लगती है वह नहीं है मृत्यु.
रघुवीर सहाय मृत्यु को कविता की प्रयोगशाला में रखकर उसे हर प्रकार से निरीक्षण करते-करते इतने मजबूत हृदय और बेख़ौफ़ होते चले गए कि अब वो इन हालातों में दूसरों की खोज-खबर लेने, शोक-सभाओं में शिरकत करने, यहाँ तक कि अब वो असमय ही लोगों की मौत, आत्महत्या हो चाहे, हत्या, या भविष्य की बर्बरता से संकटग्रस्त होकर मृत्यु चाहे किसी भी रूप में हो, वो मृत्यु के न अश्मसान बनने देने को राजी है, न ही संक्रांतिकाल के समय में निहत्थे जीवन जीने वालों को एक निष्कर्ष तक ले जाने को आतुर हैं।
....मगर अभी पूरी तरह उससे उन्हें ऐतबार नहीं। मगर वो प्रयासरत हैं निरंतर, और इस बात को गौर से देखते हुए महसूसते हैं कि –“मृत्यु का परिणाम जीवन से इतना बड़ा अंतर दिखाता है कि हम भयभीत हो जाते हैं.” एक तो वो इस बिंदु पर आकर मृत्यु से भय का कारण जान लेते हैं और इसके साथ ही वो इसके उपाय की कोशिशों में लग जाते हैं ये कहते हुए -
जिन्हें मृत्यु आकर ले जायेगी
दबे पाँव आहट को सुनता हूँ
और उसे शोर बनने नहीं देता हूँ
हाँ मैं कुछ करता हूँ जिसका
उपचार से कोई सम्बन्ध नहीं.
- डॉ. अनिल पुष्कर कवीन्द्र


