गीदड़ों की भीड़ का सोया हुआ राष्ट्रवाद
गीदड़ों की भीड़ का सोया हुआ राष्ट्रवाद
वे गोडसे का मंदिर राष्ट्र विरोधी गतिविधि नहीं मानते
गीदड़ों की भीड़ का सोया हुआ राष्ट्रवाद इस देश को एक और बंटवारे की तरफ धकेल रहा है।
उसे डालर कमाने के लिए देश और अपने माता-पिता को छोड़ने में एक मिनिट नहीं लगता, पर तिरंगा देखकर राष्ट्रवाद उफनने लगता है
भारत देश की पहचान उसकी विविधता से है, यह विविधता केवल संस्कृति में ही नहीं है, राष्ट्रवाद में भी है। जितने लोग उतने ही राष्ट्रवाद। कुछ लोगों के लिए भारत का संविधान राष्ट्रवाद का प्रतीक है, तो कुछ लोगों के लिए वह छद्म राष्ट्रवाद है, असली राष्ट्रवाद वह है, जो वे बताते हैं। इन्हें अपने राष्ट्रवाद के लिए किसी पुलिस या कानून की जरुरत नहीं होती, वे खुद की पुलिस होते हैं और खुद ही कानून। जिस तरह गीदड़ों की भीड़ मिलकर हमला करती है, वे भी उसी प्रकार मिलकर हमला करते हैं।
इस प्रकार के राष्ट्रवाद आजकल हर गली चौराहे पर मिल जाते हैं, जो आपकी हर दिनचर्या पर नजर रखते हैं और बताते हैं, क्या करना चाहिए, क्या नहीं? अगर कभी ये किसी मामले में छूट दे दें, तो तमाम गैर राष्ट्रवाद काफी सुकून महसूस करते हैं। इस प्रकार के राष्ट्रवादियों का पढ़ाई-लिखाई से कोई वास्ता नहीं होता, वे मौखिक ज्ञान लेकर दीक्षित होते हैं और फिर दूसरों को करते हैं। आम तौर पर तर्क करने पर अकेले होने पर वे भाग जाते हैं और बहुमत में होने पर तर्क करने वाले पर या तो हमला कर देते हैं या उसे देश द्रोही करार दे देते हैं। तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश करने में ये सिद्धहस्त होते हैं, क्योंकि वे जानते हैं, कि देश में बहुतायत ऐसे लोगों का ही है, जिनका पढ़ने लिखने से कोई वास्ता नहीं होता। आप विकास की, महंगाई की, बेरोजगारी की, कुपोषण की, कृषि संकट की बात करें, तो वे धर्म की बात करना शुरु कर देते हैं, या पाकिस्तान का वीजा बांटने लगते हैं, जिससे जनता का ध्यान भटकाया जा सके। आप विज्ञान की बात करें, तो वे पुष्पक विमान की और गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी की बात शुरु कर देते हैं। लोगों के व्यक्तित्व पर हमला करना इन लोगों का खास शगल होता है।
इन राष्ट्रवादियों को दो प्रकार के लोग खास तौर पर समर्थन करते हैं, एक वे जो अपनी संस्कृति को इसलिए श्रेष्ठ मानते हैं, क्योंकि इससे उनके स्वार्थ सिद्ध होते हैं । दूसरे वे होते हैं, जिनका राष्ट्रवाद आम तौर पर सोया हुआ होता है, जो किसी न किसी उत्प्रेरक की मदद से जागता है। उत्प्रेरक भी दो प्रकार के होते हैं, एक सोशल मीडिया, दूसरा विजुअल मीडिया। वैसे तो ये तबका पढ़ा-लिखा होता है, पर जब से नालंदा विश्वविद्यालय की लाईब्रेरी जली है, इसने कसम उठा ली है वे अपने कोर्स को छोड़कर, पढ़ाई नहीं करेंगे। कोर्स इसलिए, क्योंकि डिग्री के लिए जरूरी है। देश दुनिया की सारी जानकारी इन्हें सोशल मीडिया पर मिलती हैं, इसीलिए इनका राष्ट्रवाद भी तभी जागता है, जब कोई ऐसा सनसनाता मामला सामने आता है। राष्ट्रवाद हर बार जगा रहे, यह भी जरूरी नहीं है, जब वे दाल खरीदने जाते हैं, या सरकार टेक्स में छूट नहीं देती है या आफिस आने के लिए अंगूठे वाली मशीन लगा देती है, तो मामला उलट कर गालियों तक भी पहुंच जाता है, पर ऐसे मामले कम ही होते हैं। इस प्रकार राष्ट्रवादी आम तौर पर मध्यम वर्ग तक सीमित है, जिसका पेट भरा हुआ है। उसके लिए देश और देश की समस्याएं केवल बहस का विषय है, जिसे वे गली, चौराहे या अपने आफिसों में करते नजर आ जाते हैं। उनके लिए राष्ट्र का अर्थ यहां रहने वाले लोगों से नहीं है, इसलिए जब वे टैक्स चुराते हैं, नदियों को प्रदूषित करते हैं, आत्महत्या करते किसान को, सड़क पर सोते लोगों को, स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में दम तोड़ते गरीबों को देखते हैं तो इनका राष्ट्रवाद नहीं जागता। वे अपने बच्चों को समझाते हैं, कि राजनीति से दूर रहें, इसीलिए स्कूल या कालेज की फीस बढ़ने पर वे उसका विरोध नहीं करते, अपने रिश्वत की फीस बढ़ा देते हैं। वे मुगलों के 500 साल पुराने इतिहास पर तो बहस करते हैं, पर कुछ साल पहले तक लड़ी गई आजादी की लड़ाई में राष्ट्रवादियों के इतिहास पर कोई बात नहीं करते। कई बार तो वे प्रामाणिक तथ्यों को भी नकार देते हैं। गांधी और नेहरू उनके लिए अप्रासंगिक हो चुके हैं, इसीलिए जब गोडसे का मंदिर बनाने की बात होती है, तो वे उसे राष्ट विरोधी गतिविधि नहीं मानते, हालांकि ऐसा कोई संदेश सोशल मीडिया या विजुअल मीडिया पर भी नहीं आता, जिससे राष्ट्रवाद नहीं जाग पाता। हां, कभी कभार वे भगतसिहं जिंदाबाद के नारे अवश्य लगा देते हैं।
इन सोए हुए राष्ट्रवादियों की सबसे अच्छी पहचान राष्ट्रवादियों और मीडिया ने की है। अंग्रेजी चैनल के एक पत्रकार, जो बहस के दौरान लोगों पर आरोप सिद्ध कर देते हैं, न जाने कितने लोगों को फांसी चढ़ा चुके होता, तब बाकी चैनल किसे अपराधी बताते, यह संकट खड़ा हो जाता। हमारे संविधान में इसमें काफी मदद की है, वरना सोए हुए राष्ट्रवादियों को सिर्फ एक ही चैनल देखने को मिलता। अखबार वे पढ़ते नहीं हैं, वैसे अखबारों ने भी जानकारियां देना शुरु कर दिया है, खबरें गायब कर दी हैं। जानकारी का दूसरा स्रोत गूगल, जिस पर कुछ भी खोजा जा सकता है, उस पर भी केवल मतलब की बातों को ही सच माना जाता है।
यह सोया हुआ राष्ट्रवाद सबसे खतरनाक है, क्योंकि यह उस तानाशाही का सबसे बड़ा समर्थक है, जो इस देश में धीरे-धीरे आ रही है, इसके साथ ही वह खुद को निर्दोष भी ठहराने की कोशिश करता है। एयरलिफ्ट देखकर तो उसका राष्ट्रवाद जागता है, पर उस फिल्म में भारत सरकार की जो बेईज्जती की गई है, उसे वह सही मानता है। कश्मीर में भाजपा शासन के दौरान लगने वाले भारत विरोधी नारे उसे उद्देलित नहीं करते, जेएनयू में करते हैं। उसे औवेसी से नफरत है, पर जब वह महाराष्ट्र में भाजपा की मदद करता है, तो ऐतराज नहीं होता। वह एक आतंकी हैडली की बात पर तो भरोसा करता है, पर गुजरात सरकार के पुलिस अफसर संजीव भट्ट की बात पर नहीं। उसे डालर कमाने के लिए देश और अपने माता-पिता को छोड़ने में एक मिनिट नहीं लगता, पर तिरंगा देखकर राष्ट्रवाद उफनने लगता है, वह दूर देश से अपनी राय जाहिर करने में भी पीछे नहीं हटता, कि देश में क्या होना चाहिए? सोया हुआ राष्ट्रवाद इस देश को एक और बंटवारे की तरफ धकेल रहा है।


