जनांदोलनों को राहत देने वाला सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
जनांदोलनों को राहत देने वाला सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
जनांदोलनों को राहत देने वाला सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
अनुराग मोदी
श्रमिक आदिवासी संगठन विरुद्ध म. प्र. सरकार के मामले में अपने आदेश के जरिए सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने जजों की कमी से अदालतों में लंबित मामलों से निपटने की दिशा में पहला कदम तो बढ़ा दिया।
12 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर, आर. भानुमती और यू. यू. ललित की खंडपीठ ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता संगठन के कार्यकर्ताओं पर दर्ज़ सभी अपराधिक मामलों (लगभग 50 ) में खंडवा, हरदा और बैतूल जिले में जिला शिकायत निवारण प्राधिकरण जाँच करेगा और तीन माह के अंदर-अंदर अपनी रिपोर्ट जिला न्यायाधीश को कार्यवाही हेतु सौपेंगा – जो तथ्य ना पाए जाने पर उनमें खात्मा दाखिल करेंगे। और संगठन ने जिन मामलों में अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें की है, उनमें तथ्य पाए जाने पर संबंधित पुलिस स्टेशन अधिकारी एफ. आई. दर्ज करेगा और कानून के अनुसार सारी कार्यवाही करेगा।
कोर्ट ने म. प्र. को भी आदेश दिया कि सरकार इस हेतु हर तरह की आर्थिक और मानव सेवा प्राधिकरण को उपलब्ध कराए।
संगठन और समाजवादी जन परिषद की ओर से अनुराग, शमीम, राजेंद्र, बबलू, संजय, सदाराम सहित सभी कार्यकर्ताओं ने इस फैसले का स्वागत किया।
यह फैसला देशभर के जनांदोलनों और एन. जी. ओ. और आम लोगों पर दर्ज होने वाले झूठे अपराधिक मामलों में राहत-भरा हो सकता है।
आमतौर पर जब जनांदोलन, एन. जी. ओ. या आर. टी. आई कार्यकर्ताओं व्दारा भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के गठजोड़ का पर्दाफाश किया जाता है या सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई जाती है, तब उन्हें कई सारे झूठे केस में फंसाना आम-बात है। देश का हर जनांदोलन और कार्यकर्ता इससे पीड़ित है – सोनी सोरी से लेकर ग्रीनपीस और एमनेस्टी की मामले तो अभी ताज़े हैं।
ऐसे में आमतौर पर, आम कानूनी प्रक्रिया के तहत ( दंड प्रक्रिया सहिंता) कोर्ट से राहत मिलते-मिलते, 10 से 20 साल लग जाते हैं।
इस बीच मीडिया ट्रायल हो जाती है; वो अलग।
कोर्ट ने श्रमिक आदिवासी संगठन की ओर से प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण और प्योली के इस तर्क को सिद्धांत: स्वीकार कर लिया कि आज जब अदालत वैसे ही केसों के बोझ तले दबी है, तब इससे निपटने के लिए नई व्यवस्था खड़ी करने की जरूरत है। और संगठन के कार्यक्षेत्र खंडवा, बैतूल और हरदा जिले में आदिवासियों और अन्य लोगों पर झूठे मामलों और सरकारी अधिकारियों व्दारा प्रताड़ना तथा लोगों की शिकायत पर पुलिस व्दारा एफ. आई. आर. दर्ज करने के मामलों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम के आदेश के जरिए सन 2012 से ही जिला शिकायत निवारण प्राधिकरण गठित किया गया था।
इस अंतरिम आदेश में संगठन की विशेष अनुमति याचिका को स्वीकार करने से अब एक नज़ीर तय हो गई।
अपने आदेश में कोर्ट ने बताया कि याचिकाकर्ता ने बताया कि म. प्र. के बैतूल, हरदा और खंडवा जिले में कार्यरत अनुराग मोदी और शमीम मोदी ने टाटा समाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई की मदद से श्रमिक आदिवासी संगठन का गठन किया था। और संगठन से जुड़े आदिवासी कार्यकर्ताओं ने जब भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के गठजोड़ का पर्दाफाश करते हुए वन क्षेत्रों में अवैध माइनिंग का मामला उठाया और आदिवासियों ने जंगल पर अपने अधिकार मांगे, तो उन पर दर्जनों झूठे मामले
दर्ज कर दिए गए।
जबलपुर हाईकोर्ट ने, एक अन्य याचिका क्रमांक 4644/04 में, वन छेत्रों में अवैध माइनिंग का मामला जाँच में सही पाया था और वन अधिकारियों व्दारा आदिवासियों को घायल करने की मामले में उनके बयान भी दर्ज किए थे और मेडिकल भी करवाया था।
उल्लेखनीय है कि बैतूल जिले के घोरपडमाल में तो आदिवासियों पर 20-20 वन अपराध दर्ज हैं; वही दानवाखेडा में दस।
इसी तरह हरदा जिले के ढेगा वनग्राम में गंगाराम पर दस और ऊँचाबरारी वनग्राम के किशोरी, सूबेदार और ब्रजलाल आदि पर भी दस-दस केस दर्ज हैं।
आदिवासी इन केस में पेशी पर आते-आते ही आधा हो जाता है।
कोर्ट ने 11, 12 और 13 जुलाई 2007 की घटना में दर्ज मामलों को विशेष रूप से उल्लेख किया।
ज्ञात हो कि 11 जुलाई को हरदा जिले के वनग्राम ढेगा में वनकर्मियों ने आदिवासियों पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया था। लेकिन, जहाँ हरदा पुलिस ने संबन्धित रेंजर की शिकायत पर शमीम और अनुराग मोदी सहित 22 आदिवासियों पर लूट, हत्या के लिए अपरहण आदि का मामला दर्ज किया था, वहीं आदिवासियों की शिकायत पर कोई कार्यवाही नहीं की थी। और, जब 13 जुलाई को हमले में घायल आदिवासी शमीम मोदी के साथ शिकायती केस दर्ज करने के लिए हरदा कोर्ट के सामने पहुंचे, तो पुलिस उन्हें जबरदस्ती उठाकर ले गई और उल्टा शमीम मोदी और साथी कार्यकर्ता बबलू नलगे पर उन आदिवासियों को जान से मारने का केस दर्ज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते-आते, पिछले माह इस मामले में विचारण न्यायालय ने भी अपने फैसले में इस बात की तस्दीक की है।
इस फैसले से भ्रष्ट अधिकारियों और अफसरों की मनमानी पर कुछ तो रोक लगेगी।
The Supreme Court's historic decision to relieve people's movements.


