सिर्फ निंदाभर से क्या होगा?

हरे राम मिश्र

पाकिस्तान में आतंकवाद और जासूसी के आरोप में जेल में बंद कुल भूषण जाधव के परिवार के लोग हाल ही में पाकिस्तान उनसे मिलने गए थे। जैसा कि खबरें हैं- पाकिस्तान में उनके साथ बहुत ही आपत्तिजनक और अपमानित करने वाला व्यवहार किया गया। पाकिस्तानी प्रशासन ने जाधव और उनके परिवार के बीच जेल में मुलाकात के पहिले परिवार के सदस्यों के चूड़ी, कंगन, कृपाण और पर्स तथा सैंडल इत्यादि अलग रखवा लिए थे।

पाकिस्तान की मीडिया ने जाधव के परिवार से शर्मसार करने वाले सवाल पूछे और यहां तक पूछा कि एक आतंकवादी की बीवी, बहन और मां होकर आपको कैसा महसूस हो रहा है?

गौरतलब है कि भारत सरकार जाधव को जहां सेना से सेवानिवृत्त एक सामान्य भारतीय कारोबारी बताती है वहीं पाकिस्तान उसे भारतीय जासूस मानता है। फिलहाल पाकिस्तान में जाधव को सेना की एक अदालत से मौत की सजा सुनायी जा चुकी है और मामला अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में विचाराधीन है।

जाधव परिवार के साथ अपमान के इस प्रकरण पर संसद में काफी बात हुई और इसकी एक सुर में निंदा की गई।

अगर गौर किया जाए तो जाधव एक संप्रभुता संपन्न राज्य पाकिस्तान के ऐसे अपराधी हैं जो वहां की शब्दावली में मानवता का हत्यारा है-आतंकवादी है (हालांकि अभियोग चलाने के तरीके पर बात और बहस हो सकती है)। यह बात अलग है कि भारत में लोग जाधव के बारे में ऐसा नहीं मानते। लेकिन पाकिस्तान में जाधव के परिवार के साथ प्रशासनिक अथॉरिटी और मीडिया द्वारा जो किया गया, उसे गहराई से समझने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच हिन्दू बनाम मुस्लिम विरोध पर आधारित पूरी सत्ताई राजनीति और खूनी राष्ट्रवाद के उर्वर बाजार को गंभीरता से समझना होगा। सिर्फ संसद के निंदा कर दिए जाने से इस मामले को नहीं समझा जा सकता।

असल में जिस तरह से भारत में राष्ट्रवाद और देशभक्ति की पूरी बहस मुस्लिम और पाकिस्तान के विरोध पर टिकी होती है, ठीक उसी तरह से पाकिस्तान में भी हिन्दू विरोधी राष्ट्रवाद का अपना राजनैतिक और प्रशासनिक बाजार है।

भारत में जिस तरह देशभक्त होने की आवश्यक सत्ताई और हिन्दुत्ववादी शर्त पाकिस्तान को गाली देना है, मुसलमानों पर संदेह करना है- ठीक वही शर्त पाकिस्तान में भी देशभक्त होने के लिए हिन्दुओं के परिप्रक्ष्य में लागू होती है। दोनों देशों के बीच अमन, विकास, मित्रता की बात करने वाले लोग पाकिस्तान और भारत दोनों जगह अल्पसंख्यक हैं।

दरअसल, जाधव का परिवार इसी राजनैतिक राष्ट्रवाद का शिकार हुआ है जो कि अब नफरत की हद तक पहुंच चुका है। हालांकि यह बात अलग है कि इस नकली और हिंसक राष्ट्रवाद की तरफदारी में दोनों देशों की सरकारें वैश्विक पूंजीवाद का ऐसा उपनिवेश बन चुकी हैं जो भविष्य में न्यायपूर्ण विकास की हर संभावना को नष्ट किए दे रहा है।

दरअसल, मुझे हैरानी तब हुई संसद ने जाधव के परिवार से इस बदसलूकी पर सतही आंसू बहाए और पूरे मामले को ’हल्का’ करने का प्रयास किया। यह कटु सत्य है कि आतंकवाद के मामलों में जैसा जाधव के परिवार के साथ पाकिस्तान में किया गया वह सब भारत में भी खुलेआम होता है। आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद मुसलमानों को बिना फैसले के ही भारतीय मीडिया अपराधी ठहरा देता है। उनका व उनके परिवार का शर्मनाक मीडिया ट्रायल होता है। यही नहीं उनके परिवार को पूरा समाज खुले आम जलील करता है। जहां तक प्रशासनिक मशीनरी का सवाल है, इस मामले में आरोपी परिवार के साथ उसका व्यवहार भी आपराधिक होता है।

मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर कथित आतंकी हमले में गिरफ्तार बरेली के चांद खान (अब अदालत से बाइज्जत बरी) के परिवार की आपबीती सुनिए। चांद खान इसी देश के नागरिक थे और अपने ही देश में जेल में बंद थे। उनका भी भरपूर मीडिया ट्रायल किया गया। जब चांद खान अहमदाबाद जेल में बंद थे तब उनकी पत्नी नगमा बानो उनसे साल में एक बार बरेली से अहमदाबाद मिलने जाया करती थीं। नगमा ने एक बार मुझसे और मेरे साथी शाहनवाज से बात करते हुए जेल में चांद खान से मुलाकात के जो दृश्य बयां किए थे वह अपने आप में बहुत शर्मसार करने वाले थे।

नगमा बताती हैं कि जब वह चांद से मिलने जेल में जाती थीं पुलिस वाले उन्हें गालियां देते थे। वह खुलेआम जलील करते हुए कहते थे कि तुम सबको गोली मार देनी चाहिए। जेल में चांद से उनकी मुलाकात तीन जालियों की एक दीवार बना कर करवायी जाती थी। वह याद करती हैं कि किस तरह से दोनो ओर खुफिया पुलिस के लोग खड़े रहते थे और हमारे आपसी संवाद की रिकार्डिंग की जाती थी। वह बताती हैं कि जाली से हम चांद खान को कभी ठीक से देख तक नहीं पाते थे, गले लगने की बात तो दूर थी। पांच मिनट का वक्त मिलता और फिर समय पूरा होने का फरमान सुना दिया जाता। यह सब उनके साथ दस साल से ज्यादा चला है। यही नहीं, आतंकवाद के आरोप में बंद कैदियों को जेल प्रशासन ठीक से पानी तक नहीं देता है।

लखनऊ जेल में बंद रहे जियाउद्दीन का अनुभव बहुत ही शर्मनाक है। परिवार के साथ भी मुलाकात के दौरान सिर्फ इसलिए अभद्रता की जाती है क्योंकि वह मुसलमान हैं।

बात यहीं तक सीमित नहीं है। आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद लोगों का मुकदमा लड़ने वाले वकील शोएब मोहम्मद पर अदालत परिसर में कातिलाना हमले हुए हैं।

यह सब बताने का मकसद सिर्फ यह है कि यहां जिस तरह से मुस्लिम विरोधी भावनाओं का इस्तेमाल करके राजनीति की जाती है, सत्ता हासिल की जाती है ठीक उसी तरह से पाकिस्तान में हिन्दू विरोधी माहौल के सहारे आवाम को बेवकूफ बनाने का चोखा राजनैतिक बिजनेस चलता है। भारत-पाक में यही एक साम्य है।

असली सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है?

दरअसल दोनों देशों की सरकारें अपने नागरिकों को उनकी बुनियादी सुविधाएं जैसे रोटी, कपड़ा, मकान और चिकित्सा, शिक्षा देने में असफल रही हैं। आज सरकारें अपने नागरिकों का भरोसा खो चुकी हैं। कुपोषण से मौतें दोनों ही देशों में होती हैं। जब शासक वर्ग के पास बुनियादी सवालों पर राजनीति की हिम्मत नहीं है तब यह स्वाभाविक है कि नफरत के फसाने गढ़े जाएंगे। यह फसाना भारत में मुसलमानों के दानवीकरण के रूप में सामने है जिसके प्रोडक्ट मोदी हैं। और पाकिस्तान में हिन्दू समुदाय के दानवीकरण का बाजार नवाज शरीफ किस्म के पनामा चोरों को जगह देता है। इसलिए जाधव के परिवार के साथ जो हुआ उस पर विलाप करने से अच्छा है कि हम अपमान करने की इस नफरती जड़ को नष्ट करें ताकि दक्षिण एशिया की दो ताकतें एक दोस्ताना माहौल में नयी सुबह का फसाना लिख सकें। क्या इस गंभीर प्रकरण में सिर्फ ’निंदा’ करने से आगे हमारी संसद कुछ सोचेगी?

(हरे राम मिश्र, राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार)