त्यागी जी को ग़ुस्सा क्यों आता है ?
त्यागी जी को ग़ुस्सा क्यों आता है ?
अरुण माहेश्वरी
जेडीयू के तथाकथित बौद्धिक नेता के सी त्यागी ने आख़िर कह दिया है कि वे भाजपा के साथ अपने को ज्यादा सहज महसूस करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि 'लेकिन भाजपा के साथ उनके विचारधारात्मक मतभेद कायम हैं'।
सवाल उठता है, तब वे उनके साथ सहज कैसे हैं ? वे किस गरज से उन अनुभवों को भुला देना चाहते हैं जब मोदी जी और अमित शाह ने नीतीश जी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाओं पर सबसे भद्दे ढंग से हमला किया था ? उन्हें अगर एनडीए में शामिल होने का अनुभव है तो आज राजग और कांग्रेस के बल पर ही वे बिहार के मुख्यमंत्री भी हैं !
त्यागी जी ने नाराज़गी जाहिर की है गुलाम नबी आज़ाद के इस बयान पर कि नीतीश जी बिहार की बेटी को हराने में लगे हुए हैं।
प्रश्न है कि गुलाम नबी आज़ाद के बयान में क्या रत्ती भर भी झूठ है ? कोविंद के पक्ष में खड़े होकर मीरा कुमार को हराया नहीं जा रहा है तो क्या किया जा रहा है ?
त्यागी जी ! विचारधारात्मक मतभेदों के बावजूद किसी के साथ सहजता के अनेक कारणों में एक कारण राजनीतिक अवसरवाद भी होता है ? ख़ास राजनीतिक उद्देश्यों के लिये विरोधी से भी हाथ मिलाना संयुक्त मोर्चा की राजनीति की आम बात है। लेकिन जरूरी यह है कि उस राजनीतिक उद्देश्य की आपके सामने एक साफ सूरत होनी चाहिए और उसे जनता के सामने भी रखा जाना चाहिए।
राजनीतिक स्वच्छता की माँग है कि नीतीश जी और त्यागी जी कोविंद जी को दिये जा रहे अपने समर्थन के राजनीतिक उद्देश्य को सबके सामने रखें, न कि 'जाने दीजिए' कह कर चुप्पी साधे रहें ! इस विषय को उठाने वालों पर नाराज़गी का कोई मायने नहीं होता है।


