“जो कायर थे वो कायर ही रहेंगे”
सन् 1977 मेँ आपातकाल के बाद हुए आम चुनाव मेँ काँग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर भानमती का कुनबा जनता पार्टी के नाम से सत्‍ता पर काबिज हुआ। इसी कुनबे मेँ भारतीय जनसंघ भी शामिल थी, जो कुनबे के बिखराव के समय दोहरी सदस्‍यता (जनसंघ-आरएसएस) के सवालों को झेलती हुई 1979 के अंत में भारतीय जनता पार्टी का रूप धरकर अवतरित हुई. जो नमो- नाम- जाप कर आज केँद्र की सत्‍ता मेँ बैठी है।
इस इतिहास अंश का सिर्फ जिक्र किया, मैँ कहना कुछ और ही चाहता हूँ...
1977 मेँ जब जनता पार्टी सत्‍ता मेँ आई उस समय "सारिका" सर्वोत्‍तम साहित्‍यिक पत्रिका थी, जो स्‍व. कमलेश्‍वर जी के सम्पादकत्‍व मेँ निकल रही थी। जनता पार्टी के सत्‍ता मेँ आने के बाद कमलेश्‍वर जी ने सारिका मेँ एक सम्पादकीय लेखमाला लिखी “जो कायर थे वो कायर ही रहेंगे”। बाद मेँ इसी के कारण उन्‍हे सम्पादक पद भी छोड़ना पडा। इसी लेखमाला के एक लेख मेँ कमलेश्‍वर जी ने एक वाक्‍य मेँ एक राजनीतिक दल और दलोँ के दलदल की वैचारिकता को लेकर बहुत तीक्ष्‍ण प्रहार किया था, जो मुझे आज भी याद है - "काँग्रेस और जनता पार्टी की लड़ाई एक इलाके के दो बदमाशोँ की लडाई थी जिसमें एक हार गया और दूसरा जीत गया।"
जनता पार्टी का कुनबा बिखर गया...चन्द्रशेखर जी के निधन के बाद उसके अवशेष भी समाप्‍त हो गए। जनता दल भी नहीँ रहा, लेकिन भारतीय जनसंघ के चेहरे पर भाजपा का मुखौटा लगाकर साम्प्रदायिकता के नये नारोँ के साथ भाजपा अपने अस्‍तित्‍व का विस्‍तार करती रही। पहले अटल जी और उसके बाद नमो जी की चालबाजियोँ के चलते आज प्रचण्ड बहुमत के साथ केँद्र की सत्‍ता मेँ बैठी है।
आज मुझे कमलेश्‍वर जी का वह लेख और उसकी पँक्‍तियाँ शिद्‍दत से फिर याद आ रही हैं। आप भी सूरते हाल पर जरा गौर से निगाह डालिए... नमोनामधारी और नमोजापकारी कुछ वक्‍त पहले जो मुद्‍दे लेकर तत्‍कालीन सत्‍ताधारी दल की घेरेबन्दी करते थे, वही मुद्‍दे लेकर आज विपक्ष ही नहीँ आमजन भी नमोराज को घेरने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैँ। कमलेश्‍वर जी की पँक्‍तियोँ मेँ 'एक इलाके' का साम्‍य दिखा आपको ??
दूसरा रहे उनके अपने मुद्‍दे, तो धारा 370 से लेकर, समान संहिता , राममन्दिर से लेकर सुभाषचन्द्र बोस तक के मामले मेँ यू-टर्न जनता देख रही है, मगर उनकी निगाह मेँ जनता तो अँधी और बहरी है। ऎसी जनता तो बस जनता है जनता का क्‍या....
तीसरे पहलू पर भी नजर डालिए... वाम दल पिछले चुनाव मेँ आजादी के बाद का बड़ा संख्‍याबल लेकर आए, लेकिन आज हाशिए पर सिमटे हैं। वही पुराना ढाँचा, वही पुरानी छतरी और छोटे-छोटे गुटोँ मेँ गुट बिखराव की पराकाष्‍ठा पर है।
एक और मोर्चा की उड़ान परवान चढ़ रही है। विक्‍टोरियन जन्‍म दिन मना चुका वातानुकूलित समाजवाद वैशाख-जेठ की तपती दोपहरी और पूस-माघ की कड़कड़ाती ठण्ड अपनी देह पर ढो रहे लोगों की चिन्ता मेँ सत्‍ताप्राप्‍ति की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहा है। सामन्ती युग की तरह समाजवादी-राजनीतिक रिश्‍तेदारी नेतृत्‍व के लिए संख्‍याबल दहेज में सजाकर पेश कर रही है। मगर नीति, सिद्धान्त, नारे अभी गढ़ें जाने हैं।
यह सभी लोग अपनी थकी बाहेँ, ढीली मुट्‍ठियाँ और खोखले नारोँ के साथ जनता को क्‍या देने और जनता से क्‍या लेने जा रहे हैँ, यह सोचना जनता का काम है। हमारा आपका सबका काम है... सोचिए राजनीति की डगर के बारे मेँ भी सोचिये... और अपनी आवाज बुलन्द कीजिए.....मैँ तो बस यही कहूँगा... ना जुबाँ किसी ने खरीद ली...ना कलम किसी की गुलाम है.......
O- रामेन्द्र जनवार
रामेन्द्र जनवार, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। वे लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के महामंत्री व ऑल इण्डिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की उप्र इकाई के अध्यक्ष रहे हैं।