दर्द का एक इतिहास है मुंक की सारी कला
दर्द का एक इतिहास है मुंक की सारी कला
दर्द का एक इतिहास है मुंक की सारी कला
महान कलाकार मुंक के शहर में उनकी कला का मेला
शेष नारायण सिंह
ओस्लो 8 सितम्बर। नार्वे में अपने महान नायकों की बहुत इज्ज़त की जाती है। यहाँ साहित्यकार हेनरिक इब्सेन के नाम पर शहर का सबसे प्रमुख इलाका है और महान पेंटर एडवर्ड मुंक के 150 साल पूरा होने पर उनकी याद में बहुत ही बेहतरीन प्रदर्शनी लगी हुयी है जिसमें मुंक का काम प्रदर्शित किया गया है जो पूरे शहर में फैला हुआ है। यह मुंक म्यूज़ियम में है नार्वेजी भाषा में म्यूज़ियम को मुसीत कहते हैं। मेट्रो ट्रेन के प्रमुख स्टेशन तोइयन के पास यह प्रदर्शनी है और स्टेशन पर जहाँ स्टेशन के नाम का निशान है उसके साथ ही यह भी सूचना है कि यह मुंक मुसीत भी साथ ही है। साथ साथ में कैफे हैं जहाँ दर्शकों के अलावा कुछ नामी कलाकार भी कभी कभी मिल जाते हैं। इसके ओस्लो विश्विद्यालय के हॉल में मुंक ने जो म्यूराल पेंट किया था वह भी खूब शान से दिखाया जा रहा है। समकालीन कला के राष्ट्रीय म्यूज़ियम में भी मुंक का काम बहुत ही प्रमुखता से दिखाया गया है। दरअसल करीब एक हज़ार रूपये का जो टिकट मुंक मुसीत के अन्दर जाने के लिये लिया जाता है वही टिकट राष्ट्रीय म्यूज़ियम के लिये भी चल जाता है। नार्वे में अपने महान लोगों की कितनी इज्ज़त की जाती है इस बात का अँदाज़ इसी से लगाया जा सकता है कि ओस्लो हवाई अड्डे पर उतरते ही उनके काम के रिप्रिंट नज़र आने लगते हैं। पूरे रास्ते यही लगता है कि आप मुंक की सरज़मीं पर आ गये हैं।
उनके 150 साल पूरा होने पर मुंक की याद में जो प्रदर्शनी लगी हुयी है, उसमें उनके काम को एक जगह पर जितनी बड़ी संख्या में लगाया गया है इसके पहले कभी भी इतना बड़ा रेट्रोस्पेकटिव एक जगह पर नहीं लगा। मुंक ने जीवन भर काम किया उनके काम की सभी शैलियों को इस प्रदर्शनी में देखा जा सकता है। इस प्रदर्शनी का मकसद साफ़ तौर पर लगता है कि कि यूरोप में ललित कला की दुनिया में एडवर्ड मुंकका वह स्थान मुकम्मल तौर पर सुनिश्चित किया जा सके जिसके कि वे वास्ताव में हक़दार हैं।
मुंक ने 1880 के दशक में कला की दुनिया में प्रवेश किया था और करीब साठ साल तक काम करते रहे। ओस्लो पर नाजी कब्ज़े एक दौरान उनकी मृत्यु हुयी। मुंक 150 प्रदर्शनी में उनकी 250 से ज्यादा पेंटिंग लगी हुयी हैं। उनकी सबसे चर्चित कलाकृतियाँ भी इस प्रदर्शनी में हैं। इस प्रदर्शनी में वे काम भी शामिल किये गये हैं जो न तो मुंक म्यूज़ियम की सम्पत्ति हैं और न ही नार्वे में हैं। दुनिया भर से इन कला कृतियों को लाया गया है। 1892 से 1903 तक का काम नैशनल गैलरी में है जबकि मुंक मुसीत में 1904 से 1944 तक का काम है।
कला के जानकारों की बात अलग है वरना कला के बारे में मामूली रूचि रखने वालों के लिये मुंक का नाम लेते ही उनकी अति प्रसिद्ध कृति चीख (स्क्रीम ) का नाम दिमाग में आ जाता है। उनकी यह कला समकालीन इतिहास में बहुत चर्चित भी है। इसको कला के जानकारों के बाहर दुनिया में वही हैसियत हासिल है जो पिकासो की गुएर्निका को दी जाती है। लेकिन मुंक की 150 साल वाली प्रदर्शनी देखने के बाद ही एक साधारण आदमी को अंदाज़ लगता है कि मुंक की कला की दुनिया कितनी विस्तृत है। मुंक ने अपनी स्क्रीम के कई संस्करण बनाये,पहला तो शायद 1893 में बनाया था और आखिरी 1910 में। जिन लोगों को नहीं मालूम है उनके लिये यह जानना ज़रूरी है कि उनकी स्क्रीम को पिछले साल न्यूयार्क में कला की एक नीलामी में 12 करोड़ डॉलर में बेचा गया था। आज के हिसाब से अगर देखा जाये तो उसकी कीमत करीब 700 करोड़ रूपये की होगी। स्क्रीम के बारे में कला की दुनिया में तरह तरह की व्याख्याएं हैं। पता नहीं क्यों कुछ हलकों में माना जाता है कि यह एक पागल की चीख का विजुअल रिकॉर्ड है जबकि मुंक ने खुद ही अपनी डायरी में लिखा है कि जब वे एक दिन ओस्लो में किसी पहाड़ी के ऊपर से गुजर रहे थे तो उनको लगा था कि प्रकृति पता नहीं क्यों चीख रही है और उसी अनुभव को मुंक ने एक पेंटिंग की शक्ल दे दिया था।
मुंक ने अपनी ज़िन्दगी में बहुत तकलीफ देखी थी। उन्होंने लिखा है कि बीमारी,पागलपन और मौत को मैंने बहुत करीब से देखा है। जब वे पाँच साल के थे तो माँ मर गयी, जब 14 साल के हुये तो उस बहन का देहांत हो गया जो इनकी देखभाल कर रही थी, उनके पिता जी की भी कुछ वर्षों बाद मृत्यु हो गयी। वैसे भी उनके ऊपर इतने बड़े परिवार का पालन कारने का जिम्मा था कि वे मुंक का कोई ध्यान नहीं रख पा रहे थे। मुंक खुद बार- बार अस्पताल जाते रहे और कई बार नशे की आदत के शिकार हुये। कहते हैं कि उनकी प्रेमिका ने भी उन्हें बहुत निराश किया था। और उनकी पेंटिंग ‘ वेम्पायर‘उसी मनोदशा में पेंट की गयी थी। उनके काम के दायरे में उनका अपना जीवन बार बार आता है। उनका मुसीबत से भरा बचपन, समाज से उनकी परेशानी और निजी सम्बंधों में निराशा,
सब उनके काम में दिखता है। उनका अपना दर्द और उससे पैदा हो रहे बिम्ब सारे जहाँ का दर्द बनकर मुंक के काम में नज़र आते रहते हैं। उनकी पेंटिंग “डेथ इन अ सिक रूम“ उनकी बहन की मौत के बाद हुये दर्द की जो अमिट छाप मुंक के दिमाग में रिकार्ड हो गयी थी, उसी का प्रतिनिधि काम है। किस ( चुम्बन ) न्यूड मडोना, और वेम्पायर, सभी कृतियाँ, महिलाओं के साथ मुंक के अनुभवों के प्रतिनधि हैं। लेकिन यह निजी होते हुये भी ऐसी बन गयी हैं कि सभी के दर्द को अनुभव कराने की क्षमता रखते हैं।
मुंक ने लिखा है कि मेरी सारी कला दर्द का एक इतिहास है, अगर दर्द न होता अतो शायद मेरा काम कुछ अलग तरह का रहा होता। अपने समकालीन इब्सेन की वे बाहुत इज्ज़त करते थे और उनकी पेंटिंग ‘ ग्रैंड कैफे में इब्सेन” को भी बहुत हे एम्ह्त्वपूर्ण माना जाता अहै। अपनी यूनिवर्सिटी में जो उनका काम है उसमें भी इब्सेन हैं, उसमें नीत्शे भी हैं, वहाँ उनका सेल्फ़ पोर्ट्रेट भी है क्योंकि बताते हैं कि जब 1944 में न्यूमोनिया से उनकी मौत हुयी तो उनकी जो मनोदशा थी वह ‘बिटवीन द क्लाक एंड द बेड‘ में नज़र आता है।


