दावा तो गांव-गरीबों को देने का है, पर बजट सेवा तो कार्पोरेट घरानों की ही करता है
दावा तो गांव-गरीबों को देने का है, पर बजट सेवा तो कार्पोरेट घरानों की ही करता है
संजय पाराते
केन्द्रीय बजट 2017-18 पर नोटबंदी के दुष्परिणामों की छाया स्पष्ट है। पिछले वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण में वर्ष 2016-17 में आर्थिक विकास दर 7.75% रहने का अनुमान लगाया था।
बजट कहता है कि इस विकास दर को हम प्राप्त नहीं कर पाए और वित्तीय वर्ष 2016-17 के अंतिम आंकड़े 6% पर आकर टिक जाएंगे। लेकिन जो सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि दर को ही अपनी सफलता की कसौटी मानती है, उसे यदि इसी कसौटी पर कसा जाएं, तो यह एक संकुचनकारी बजट है, क्योंकि पिछले वर्ष का संशोधित बजट आकार कुल जीडीपी का 13.4% था, तो इस बार का बजट घटकर 12.7% के स्तर पर आ गया है। और यदि रेवेन्यू को आबंटित 1.13 लाख करोड़ रुपयों को घटा दिया जाए, (याद रहे कि रेल बजट को इस बार से केन्द्रीय बजट में ही समाहित कर दिया गया है) तो परिमाण में इस वर्ष का बजट पिछले वर्ष के बजट आकार के लगभग बराबर ही रह जाएगा।
अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ‘गांव-गरीब’ का जो जाप किया है, आंकड़ों का विश्लेषण करने से ही एक बार में ढह जाता है।
दरअसल, आंकड़े अपने-आप में कुछ नहीं कहते। आंकड़ों का विश्लेषण ही सच्चाई को दबाने या उजागर करने का काम करता है।
और सच्चाई यही है कि दावा तो गांव-गरीबों को देने का है, यह बजट सेवा तो कार्पोरेट घरानों की ही करता है।
गरीबों की झोली में इस बार उतना भी नहीं पड़ा, जितना उसे पिछली बार दिया गया था। यदि 5% मुद्रास्फीति को ही गणना में लिया जाएं, तो इस ब...


