लाखों बच्चों से अभी भी दूर है शिक्षा की रोशनी

नई दिल्ली 1 मई, 2017: साल 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की कुल जनसंख्या 1.22 बिलियन है लेकिन यहाँ मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान होने के बाद भी वयस्कों, युवाओं में निरक्षरता और स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों का स्तर बहुत ज्यादा है। भारत की कुल जनसंख्या का सिर्फ 74.04 प्रतिशत आबादी ही साक्षर है।

अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर किए गए प्रयासों के बावजूद भी जिस तरह के आंकड़े यूनेस्को e-atlas ने स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों पर जारी किए हैं, वह चिंता का विषय है। दुनिया भर में स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या 124 मिलियन है, जिनमें से 17.7 मिलियन बच्चे भारतीय हैं।

निरक्षरता से निपटने और सभी बच्चों को साक्षर किया जाए, इसे सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार ने समय-समय पर कई प्रयास किए हैं, जिनमे साल 1990 का एजुकेशन फॉर ऑल, साल 2000 में एमडीजी को भारत सरकार द्वारा अंगीकृत किया जाना शामिल है। यहीं नहीं भारत सरकार ने साल 2015 में सतत विकास लक्ष्य भी अंगीकृत किया। इसी क्रम में साल 2009 में सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार भी दिया गया।

Global Action week for Educationसतत विकास लक्ष्य का चौथा लक्ष्य खास तौर पर उचित और गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की बात करता है। इसके अलावा लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने, तकनीकी और पेशेवर हुनर बढ़ाने की बात इसमे की गयी है। लेकिन दुर्भाग्यवश सरकार ने एसडीजी-4 को अंगीकृत करने के बाद इसके लिए कोई रोडमैप तैयार नहीं किया। बाद में एसडीजी संकेतक संरचना का मसौदा लेकर आई और लोगों से इसपर सलाह मांगी। लेकिन सलाह देने के लिए तय की गयी समायावधि इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में इनपुट हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं था।

एसडीजी-4 के लक्ष्यों पर विचार करते हुए नेशनल कोलिसन फॉर एजुकेशन, नयी दिल्ली ने एक सप्ताह की लंबी गतिविधि चलायी। इस गतिविधि को ग्लोबल एक्शन वीक फॉर एजुकेशन कहा गया। इसका आयोजन 24 राज्यों में किया गया और इसका समापन एक मई 2017 को नयी दिल्ली में हुआ।

जेएनयू के प्रोफेसर अजय कुमार, प्रोफेसर पूनम बत्रा के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के विजय वर्मा, संसद सदस्य उदित राज, दद्दन मिश्रा, सिविल सोसाइटी संगठन के प्रतिनिधि अजय झा, अंजेला तनेजा, रमाकांत राय और शिक्षक संघ के रामपाल सिंह सहित इस परिचर्चा में छात्रों ने हिस्सा लिया।

परिचर्चा के दौरान शिक्षा बजट में हुई कटौती, निजी स्कूलों के बढ़ते ट्रेंड्स, स्कूलों में गिरता गुणवत्ता का स्तर, सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े बच्चों के स्कूली दाखिले में घटती संख्या सहित एसडीजी-4 के लक्ष्यों और भारत में समस्याओं को सुलझाने में इसकी भूमिका पर चर्चा की गयी।