देश की तो छोड़ो गुजरात से भी जायेगा, वह दिल्ली तो आ जाये इक बार!
देश की तो छोड़ो गुजरात से भी जायेगा, वह दिल्ली तो आ जाये इक बार!
अशोक कुमार पाण्डेय
पकिस्तान तो उसके जूतों की धूल से उड़ जायेगा
वह दिल्ली तो आ जाये एक बार
आतंक तो क्या हर वाद धुएँ की तरह उड़ जायेगा
वह दिल्ली तो आ जाये एक बार
वही सरदार हैं, गांधी हैं, लहर हैं, आँधी है
टाटा का ताऊ है और बिरला के नाती हैं
अदानी, अम्बानी के सपनों का भारत हैं
नागपुर के दिए की इकलौती बाती हैं
चढ़के रुपया डॉलर के सर पर चिल्लायेगा
सेंसेक्स आसमान के उस ओर चला जायेगा
वह दिल्ली तो आ जाये एक बार !
सारे पहाड़, जंगल हाथ जोड़े खड़े होंगे
नदियाँ सब उनके आदेश से ही बहेंगी
बादल भी बरसेंगे उनकी ही अनुमति से
उनसे ही पूछ के अब बन्दूकें भी चलेंगी
आदिवासी की हिम्मत है आवाज़ उठायेगा?
थाली में जंगल लिये रामराज बनवायेगा
वह दिल्ली तो आ जाये इक बार!
हाथी सा फूला है मिडिल क्लास का सीना
बरसेगा रोज़गार जैसे सावन का महीना
गिन गिन के लेंगे बदला सारे अपमान का
अब तो पैर उसका और मियाँ का सीना
फसादों को सालाना जलसा बनवायेगा
संसद और लाल किला भगवा रंगवायेगा
वह दिल्ली तो आ जाये इक बार!
मदिराई आँखों के इन सपनों की जय हो
दंगाई रातों के इन सपनों की जय हो
लकड़ी का लाल क़िला लकड़ी की संसद
उस पर से मतवाले फतवों की जय हो
होगा चुनाव तो सब पता चल जायेगा
देश की तो छोड़ो गुजरात से भी जायेगा
वह दिल्ली तो आ जाये इक बार!


