दो करोड़ गौवंश कहाँ कैसे रखेंगे, प्रतिदिन इजाफा भी हो रहा है
दो करोड़ गौवंश कहाँ कैसे रखेंगे, प्रतिदिन इजाफा भी हो रहा है
हिन्दू धर्म समेत सभी धर्मों में शराब को बुरा कहा गया है। ज़ाहिर है अजब वह बुरी है तो उसका कारोबार भी बुरा है और उसे से होने वाली कमाई भी बुरी, जिसका किसी धार्मिक काम Religious work में प्रयोग तो बिलकुल नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन संघ परिवार का हिन्दू धर्म असल हिन्दू धर्म Hindu religion से बिलकुल अलग है। सनातन धर्म Sanatan Dharma की सारी मान्यताओं और प्रतीकों को संघ ने बदल दिया है। संघ के धर्म के अनुसार अपना मकसद प्राप्त करने के लिए उचित अनुचित नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि साम दाम दंड भेद, जिस तरह भी हो, अपना ध्येय हासिल किया जाना चाहिए। जब वह हर-हर महादेव की जगह हर-हर मोदी का नारा हिन्दू जन मानस से लगवा सकता है। भगवान शंकर के त्रिशूल का डिजाईन बदल सकता है। अर्ध कुम्भ Semi kumbh को कुम्भ kumbh करवा सकता है, तो वह शराब की आय से गौ सेवा Gau Seva का पुण्य काम क्यों नहीं कर सकता और योगी जी ने यह कर दिखायाI
गाय से प्रेम है तो सांडों बछड़ों का प्रेम त्यागना पड़ेगा अन्यथा भारी सियासी मूल्य भी चुकाना पड़ सकता है बीजेपी को
योगी जी ने गौ सेवा और गौशालाओं के निर्माण और उनके रख रखराव पर आने वाले भरी भरकम खर्च को जुटाने के लिए अन्य क़दमों के अलावा जिनमें टोल टैक्स में इजाफा भी शामिल है, शराब पर भी टैक्स बढ़ा दिया है। इस तरह एक पुण्य कमाने के लिए उन्होंने पाप की कमाई का सहारा ले कर धर्म की नयी व्याख्या भी कर दी है। यही नहीं उन्होंने साहब बहादुरों अर्थात जिला अधिकारियों को यह भी आदेश दिया कि वह 10 जनवरी तक सभी छुट्टा जानवरों को गौशाला पहुंचा दें। यानी अब साहब बहादुरों को चरवाहा भी बनना पड़ेगा।
कभी जो ब्यूरोक्रेसी स्टील फ्रेम कही जाती थी उसको योगी जी ने उसकी औकात दिखा दी है। अब बेचारे जिला अधिकारी महोदय जो आम अवाम को तो छोड़िये अपने मातहतों तक का सलाम भी बस गर्दन को जरा हिला कर कुबूल करते हैं, गाय सांड हांकते हुए देखे जा सकेंगे। उन्हें पुण्य कमाने की संतुष्टि तो भले ही मिल जाए, लेकिन दिल अपनी इस बेऔकाती पर रो ज़रूर रहा होगा I
छुट्टा गायें और सांड बहुत बड़ी आर्थिक समाजिक और राजनीतिक समस्या बन रहे हैं। योगी जी के मूर्खतापूर्ण गौ प्रेम के चलते पूरे प्रदेश में लाखों छुट्टा गायें और सांड न केवल किसानों, बल्कि आम जनता के लिए एक समस्या बन गए हैं। दूसरी तरफ किसान अपने बेकार हो चुके इन जानवरों को बेच कर चार पैसे नहीं कमा पा रहे हैं। उलटे उनको चारा पानी का बोझ अलग से उठाना पड़ रहा है। ऐसे में उनके सामने इन को खुला छोड़ कर हांक देने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यह छुट्टा जानवर झुण्ड के झुण्ड निकलते हैं और किसानों की खड़ी फसल तबाह कर देते हैं। मजबूरन किसानो को प्रेमचन्द की मशहूर कहानी पूस की एक रात के हरखू किसान बन कर इन छुट्टा गायों सांडों से अपनी फसल बचानी पड़ रही है, लेकिन यह समस्या का हल नहीं क्योंकि अधिकतर किसानों के खेत अलग-अलग जगह होते हैं। वह अगर एक खेत की रखवाली में एक रात बिताते हैं तो दूसरी जगह के खेत चर जाते हैं। फिर यह छुट्टा गाय सांड कोई रात या दिन में ही तो नहीं आते किसी भी समय किसी भी तरफ आ सकते हैं अर्थात किसान अपना घर बार और दूसरे काम छोड़ कर सिर्फ खेतों की ही रखवाली तो नहीं कर सकता।
इसके साथ ही एक और समस्या खड़ी हो गयी है। किसानों ने अपने खेतों के चारों और लोहे के तार लगाने पर लाखों रूपा खर्च किया। जानवर जब इन तारों को पार कर के खेत के अन्दर घुसने की कोशिश करते हैं तो नुकीले तार उनके बदन में घुस जाते हैं जिस से वह ज़ख़्मी हो जाते हैं। छुट्टा होने की वजह से उनकी मरहम पट्टी तो होती नहीं इन ज़ख्मों में कीड़े पड़ जाते हैं। इन बेचारी गायों और सांडों की इस तकलीफ को समझा जा सकता, बस योगी जी जैसे धर्मांध भले न समझ सकेंI
गौ प्रेम के कारण उत्पन होने वाली यह समस्या दोगुनी गोवंश की धारणा के कारण हो गयी है। अभी पचीस तीस साल पहले तक बैल खेती का आवश्यक अंग थे तब बछड़ों बैलों की किसानों को ज़रूरत थी अब ट्रेक्टर और अन्य मशीनों के कारण इनका कोई उपयोग नहीं रह गया। पहले जो किसान गाय के बछडा पैदा होने पर बेटा पैदा होने जैसी ख़ुशी मनाता था और उसी तरह उसकी परवरिश करता था अब यह बछडा उसके लिए बोझ हो गया है न वह खेती के काम आ सकता है और न ही बेचा जा सकता है। नतीजतन जब तक उसके द्वारा गाय से दूध लेना होता है तब तक उसे रखते हैं और उसके बाद जैसे ही वह कुछ खाने पीने लायक हो जाता है उसे छुट्टा छोड़ देते हैं।
गोवंश रक्षा कानून में यह ध्यान रखा गया था कि बछड़ों के नाम पर कहीं गाय ही न काटी जाए, लेकिन यह बहुत मूर्खतापूर्ण और नुकसानदायक कानून बन गया। यही नहीं गौ ह्त्या रोकने के नाम पर जानवरों की खरीद बिक्री भी रोक दी गयी है। गौ रक्षा के नाम पर हुई म़ॉबलिंचिंग के बाद तो अब गैर मुस्लिम भी इन जानवरों को हांक के एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हुए डरते हैं।
लब्बो लुबाब यह कि अंध गौ भक्ति और गौ प्रेम ने पूरी कृषि अर्थव्यवस्था को चौपट कर के रख दिया है। यही नहीं शहरों में भी गाय और सांड उतनी ही बड़ी समस्या बने हुए हैं। बड़े-बड़े शहरों के ख़ास ख़ास भीड़-भाड वाली सड़कों और चौराहों पर दर्जनों छुट्टा गाय और सांड जुगाली करते दिखाई दे जायेंगे। यह उन्मुक्त हो कर कभी सींग लड़ाने लगते हैं, कभी भागते दौड़ते हैं जिस से न जाने कितने लोग ज़ख़्मी हो चुके हैं, कुछ की तो मौत भी ही गयी I
एक सर्वे के अनुसार केवल उत्तर प्रदेश में इस समय करीब दो करोड़ गो वंश है। अगर इन में से आस्था के नाम पर गायों को अलग करके बछड़ों सांडों का व्यापार खोल दिया जाए तो समस्या आधी रह जायेगी। इस से गायों की भी ठीक प्रकार से सेवा और देख भाल हो सकेगी। लेकिन सवाल यह है कि यह ढील कौन देगा ? इन दो करोड़ गोवंश को रहने के लिए 17 हज़ार फुटबाल स्टेडियम जितनी जमीन चाहिए। उधर कटाई मंड़ाई मशीनों से होने के कारण भूसे पुवाल कर्बी आदि की पैदावार दिन प्रति दिन घटती जा रही है। अनुपयोगी पशुओं के लिए चारा कौन लाएगा और कहाँ से आयेगा। गौ शालाओं में चारा उत्पादन का तो कोई प्रबंध किया नहीं गया हैI
यही नहीं जो गाय कभी हिन्दुओं के लिए गौमाता और मुसलमानों के लिये गाय अम्मा थी जिसका दूध सभी हिन्दू मुसलमान पीते हैं, उसी गाय को हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच कटुता और नफरत ही नहीं हत्या तक के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इस से बीजेपी कुछ सियासी लाभ भी नहीं मिलेगा क्योंकि गांव में किसान तो त्रस्त थे ही, शहरों में आम आदमी भी छुट्टा जानवरों से परेशान है और अब गाय के नाम पर अधिक टैक्स आदि जनता आसानी से बर्दाश्त नहीं करेगी। भले इसके अलावा समाज में कटुता पैदा करना गौ प्रेम बिलकुल नहीं कहा जा सकता और खुद गौ माता भी अपने इस दुरूपयोग पर दिल ही दिल में रो रही हैंI
आवश्यकता है कि गौ प्रेम आस्था के साथ ही साथ वैज्ञानिक आर्थिक सामाजिक और realistic भी हो तभी जा के गाय की सही अर्थों में सेवा हो सकेगी अन्यथा यह सियासी बाजीगरों और धर्म के ठेकेदारों के हाथों में यूँही खिलौना बन के तड़पती कराहती रहेगी I
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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