विकास तो मिल गया है। उसके पापा नहीं मिल रहे। अब वे लापता हैं। जिस किसी को मिलें खबर करें। विकास को उनसे मिलाना है।
पिछले कई दिनों से देश के लोग विकास को खोज रहे थे। उसके पापा से प्रश्न पूछ रहे थे कि कहां है विकास। विकास कहीं दिख नहीं रहा इन दिनों। सब चिंतित थे विकास के लिये।
कल चौराहे पर चीथड़ों से लिपटा एक अधनंगा लड़का मिला, जो कार का शीशा ठक-ठक कर भीख माँग रहा था। उसकी गोद में एक और नाक बहता गंदा बच्चा था। उसका नाम पूछा। बोला विकास। इसके पहले कि उसके पापा का नाम पूछता, सिगनल चालू हो गया।
शहर में एक निर्माणाधीन सरकारी बिल्डिंग देखने तपती दोपहर में गये। गाँवों से आये आदिवासी मज़दूर मजदूरनियाँ काम कर रहे थे। कईयों के दुधमुँहे बच्चे आधी धूपछाँव में वहीं रस्सी पर टँगी कपड़े की झोलियों में लेटे रो रहे थे। हग मूत रहे थे। एक मजदूरन बच्चे को दूध पिलाने आई। बच्चे का नाम पूछा। बोली विकास। मैंने कहा इसके पापा का क्या नाम है, वह जवाब दे पाती उसके पहले सुपरवाइज़र ने गंदी गाली देकर उसे काम पर बुला लिया।
अपने मित्र के साथ मंदिर गया। लोगों को धर्मप्राण श्रद्धालु जन भंडारे में खाना खिला रहे थे। एक लडके ने रोटी के लिये हाथ पसारा। पुजारी ने डाँटते हुए उस लड़के को कहा अबे ओ विकास ...ज़ादे, पीछे हट, भिखमंगा कहीं का। मुझे लगा विकास मिल गया। मैंने पुजारीजी से पूछा तुम तो विकास को अच्छी तरह जानते हो। कहाँ रहता है वह, उसके बाप का नाम क्या है कि तभी लाउडस्पीकर पर जोर जोर से 'भजन' चलने लगा 'तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो'। बात भजन में दब गई।
रेल की पटरियों के किनारे, झुग्गियों में, हाथों में बड़ा सा बड़े थैला लिये कचरा बीनते, होटलों में बर्तन धोते, कटे हाथों से भीख माँगते, रेलों में हाथ पसारते अंधे, कई विकास मिले। पर बात हर बार अधूरी रही।
आखिर में एक अनाथालय के बाहर एक बच्चा जोर-जोर से रो रहा था। उससे पूछा वह क्यों रो रहा है। जानकर रोंगटे खड़े हो गये। उसका प्रबंधक द्वारा दुष्कृत्य हुआ था। उसे सांत्वना दी, नाम पूछा। बोला विकास। उसे कहा तेरे पापा को खोजेगें। बता कहाँ रहते हैं तेरे पापा। वह सहमते हुए बोला दिल्ली में।
विकास तो मिल गया है। उसके पापा नहीं मिल रहे। अब वे लापता हैं। जिस किसी को मिलें खबर करें। विकास को उनसे मिलाना है।
//जसबीर चावला//