नोटबंदी : कतार में मर गया बालादीन क्योंकि गरीब था मोदी की तरह फ़कीर नहीं
ज़ीशान अख़तर
‘मैं फ़कीर हूँ’ याद ही होगा.
शायद ही ये बताने की ज़रूरत हो कि ये किसने कहा.
पीएम बनने तक का सफ़र तय करने वाले मोदी जी जब खुद को फ़कीर कहते हैं, तो मन में कई सवाल उठते हैं.
जब पीएम फ़कीर हैं तो देश का गरीब क्या है. क्या वह भी फ़कीर है. या ये फ़कीर गरीब हैं.
असमंजस के बीच परिभाषित करने की कोशिश की है. शायद आकलन ठीक न हो, आप सहमत न हों, लेकिन बता रहा हूँ. खुद भी समझने की कोशिश है.
जैसा कि पता चला दलित बालादीन फ़कीर नहीं था.
15 दिसंबर को बैंक की लाइन में किसान की मौत हुई. ज़रूरत अधिक रूपयों की थी. तीन दिन लाइन में लगने के बाद 6 हज़ार मिले. हार्टअटैक से बैंक के अन्दर ही दुनिया छोड़ दी.
बैंक के माथे पर किसान की मौत का कलंक चस्पा हो गया.
बैंक यह मानने को तैयार नहीं है कि किसान बैंक के कारण मरा. कैश कम होने के कारण रुपये कम दिए गये.
बैंक में कैश नहीं है, यह किसकी गलती है? इशारा किसकी ओर है. खुद ही गुणा-भाग कीजिये.

बैंक में मौत के बाद बेटों ने इस तरह ढोया पिता का शव

यहाँ फ़कीर और गरीब में कुछ अंतर स्पष्ट हुआ.
फ़कीर तो झोला लेकर चल देगा. मांग कर खा लेगा. मदद मांग लेगा. हाथ फैला लेगा, लेकिन बालादीन जैसे गरीब अक्सर ऐसा नहीं करते.
गरीब, गरीब ज़रूर होते हैं, लेकिन आसानी से हाथ नहीं फैलाते हैं. फैलाते भी हैं तो स्वाभिमान के साथ. वरना मर जाते हैं. मर भी रहे हैं. बुंदेलखंड इसका बड़ा उदाहरण है.
यहाँ फ़कीर नहीं मरते. गरीब मरते हैं.
इसी तरह बालादीन ने भी हमें अलविदा कह दिया.
दो बेटे बैंक में नोटों की खातिर दुनिया छोड़ गये अपने पिता बालादीन के शव को बैलगाड़ी से लेकर चले. गाड़ी खुद खींची. बैल बन गये. भले ही बैंक की लाइन से थाने की दूरी कम थी. आधा किलोमीटर भी नहीं.

ज़ीशान अख़तर, जनसरोकार से वास्ता रखने वाले युवा पत्रकार हैं।

अगर किसान के बेटे मदद मांगते तो शायद कुछ हो जाता, लेकिन इन्होंने साबित किया कि वह गरीब हैं. झोला उठाकर, हाथ फैलाकर, बार-बार रोकर मदद नहीं मांगी. पुलिस देखती रही. उन्हें थाने तक पहुंचाने को हांकती रही.
एम्बुलेंस नहीं मिल पायी. समाजवादी 108 एम्बुलेंस अपने टाइटल पर खरी नहीं उतर सकी.
ऐसे में जैसा कि और जगहों पर होता आया है. लोग बाप का शव थाने तक ढोने के लिए बैल बने बेटों की तस्वीरें लेते रहे.
बार-बार यह क्यों लिखा जाए कि संवेदनाएं फिर मर गयीं. न जाने कितनी बार लिखा गया होगा.
संवेदनाएं पहले ही मर चुकी हैं, किसानों की मौतें तो अब हो रही हैं.
खैर...रुपयों के कारण मौत से यह कहा जा सकता है कि बुंदेलखंड के महोबा के सिकरपुरा गाँव का रहने वाला 80 साल का दलित बालादीन फ़कीर नहीं था.
फ़कीर ऐसे नहीं मरते. फ़कीर बैंकों में नहीं मरते.
किसान के बेटे रामपाल ने बताया कि पिता पर 30 हज़ार का क़र्ज़ भी था. सवाल मानें या जवाब, लेकिन लोग कहते हैं कि फकीरों पर क़र्ज़ भी नहीं होता. पहले कहा जाता होगा, लेकिन अब शायद ही फ़कीर त्यागी या महापुरुष कहे जाते हैं. दिन भर आसानी से जुगाड़ कर खा पीकर सो जाते हैं.
सही संघर्ष और त्याग बालादीन जैसे लोग करते हैं. जो परेशानी होने पर फ़कीर की तरह झोला उठाकर चल नहीं देते. समस्याओं के बीच दम तोड़ देते हैं.
देश में अधिकतर लोग बालादीन जैसे ही है. 70 प्रतिशत आबादी ऐसी ही है. संघर्ष और गरीबी के बीच दम तोड़ने वाली.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ नोटबंदी के बाद से बुंदेलखंड में अब तक करीब 20 किसानों की मौत हो चुकी है.
झाँसी, ललितपुर, जालौन, बाँदा, हमीरपुर, महोबा, चित्रकूट सहित लगभग पूरे बुंदेलखंड से ख़बरें आयीं कि नोट नहीं मिलने से परेशान ग्रामीणों ने जाम लगाया. कुछ जगहों पर बैंक में तोड़फोड़, बैंक अधिकारियों को रुपये नहीं देने पर बौखलाहट में जान से मारने की धमकी देने की भी ख़बरें आ चुकी हैं.
यह सिलसिला अभी थमा नहीं है.
बुंदेलखंड के एक्टिविस्ट आशीष सागर कहते हैं-

रोजगार पहले ही नहीं था. थोड़ा बहुत काम था, वो भी छिन गया. पलायन भी रास्ता नहीं बचा. नोटबंदी के कारण महानगरों या दूसरी जगहों पर भी काम नहीं है. लोग बौखला गये हैं. चक्का जाम और रोज हो रहे प्रदर्शन इस बात का सुबूत हैं.

प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह कहते हैं कि खेती पर असर पड़ेगा. बुंदेलखंड का मौसम किसान के साथ नहीं रहता. इस बार मौसम के साथ ही नोटबंदी से हालात बिगड़े हैं.
व्यापारियों का कहना है कि बुंदेलखंड जैसी जगह के बाज़ार को करोड़ों का नुकसान हुआ है. इसका असर गाँवों में भी दिखेगा.
ऐसे में गरीबी का तमगा ज्यादा भयावह लगता है. फकीरी कुछ हलकी फुलकी मालूम होती है.
पहले फ़कीर गरीब लगता था और गरीब फ़कीर, लेकिन यहाँ फ़कीर 10 लाख का सूट पहन सकता है. और गरीब बैंक की लाइन में मर सकता है.
‘देश हित में इतना भी नहीं कर सकते’ जैसे तकियाकलाम और बालादीन जैसे लोगों के मरने के बीच वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी लिखते हैं कि नोटबंदी से काला धन ख़त्म होने की बात भ्रामक है. काले धन का बड़ा हिस्सा ज़मीन-जायदाद, सोने-चांदी के साथ ही दूसरे रूपों में होता है. अब तक सारी पुरानी नक़दी बैंकों में लौटने का अनुमान है. यानी सारी काली नक़दी बैंक में वापस पहुँचेगी. तो सरकार काला धन कैसे पकड़ेगी? इतनी बड़ी क़वायद के बाद उसे कुछ काला धन तो पकड़ना ही है, वरना बड़ी भद पिटेगी. पकड़े जा रहे लाखों-करोड़ों रुपये इस बात का सुबूत है कि नए नोटों का कालाधन भी रातोंरात तैयार हो गया.
लेखक गुरचरण दास का मानना है कि नोटबंदी की वजह से लाखों नौकरियां जाएंगी और सरकार को पछताना होगा.
वहीँ, पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि डिजिटल तरीके से लेन-देन से गरीबी हटेगी. सरकार भी ऐसा ही कह रही है, लेकिन पूरे देश में हाहाकार और बुंदेलखंड जैसी जगहों पर बालादीन जैसे लोगों की मौतों के बाद ऐसा होगा, फिलहाल यह कहना मुश्किल है.
अधिकतर गरीब आर्थिक मुसीबत में नोट पहचानते हैं, पेटीएम में उनकी दिलचस्पी कम मालूम होती है.