प्रतिबद्धता के ज़मीनी चेहरे

- विनीत तिवारी

हर राज्य में कुछ न कुछ ऐसे लोग मिलते हैं जो हौसले की ज़िंदा मिसाल होते हैं। सागर के ऐसे ही कॉमरेड चंद्रकुमार जैन अभी जीवित और सक्रिय हैं। वे अपने सीमित संसाधनों के साथ एक जुनून की तरह प्रगतिशील और जनवादी साहित्य को लोगों तक पहुंचाने के काम मे दशकों से जुटे हुए हैं। जबलपुर में ऐसे ही एक साथी त्रिलोक सिंह थे जिनसे उनके इंतक़ाल के पहले एक-दो बार मुलाक़ात का मौका भी हासिल हुआ था। इंदौर में जब तक कॉमरेड अनंत लागू चलने फिरने की स्थिति में थे, मराठी का युगांतर हमेशा वक़्त पर पहुंचाने और उसकी सदस्यता एकत्र करने का काम वे पूरी गंभीरता से करते थे। बाद में वही काम कॉमरेड शिंत्रे स्वस्थ रहने तक करते रहे।

प्रगतिशील और जनवादी साहित्य या अन्य साहित्यिक या वाम राजनीतिक पत्रिकाएँ हिंदी पट्टी में बहुत ज़्यादा नहीं बिकतीं। उनमें कोई अधिक कमीशन आदि का लाभ भी नहीं होता। कम से कम इस काम से घर का तो क्या एक आदनी का खर्च भी निकलना मुश्किल होता है। मतलब ये कि जो भी ये काम करते हैं वो किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं करते और इसके पीछे उनका मुख्य मक़सद अपने वक़्त में सही हस्तक्षेप के लिए लोगों को मानसिक रूप से तैयार करने से ज़्यादा कुछ नहीं होता। हालाँकि यह भी कोई छोटा मक़सद नहीं है, बस इसमें कमाई का लक्ष्य शामिल नहीं है।

जो साथी प्रकाशन और वितरण के काम को अधिक व्यवस्थित तरीके से कर रहे हैं, उनमें उसके लिए सामूहिक निर्णय और संसाधन इकट्ठे किये जाते हैं। लेकिन जो लोग अकेले ही इस काम को अंजाम दिए जा रहे हैं क्योंकि या तो उनके पास उतना सांगठनिक समर्थन नहीं है या उनके काम के दायरे को उन्होंने बढ़ाने का कभी सोचा ही नहीं, तो ऐसे साथियों के नाम विशेष उल्लेख की माँग करते है। बरसों पहले ये काम अशोकनगर में पंकज दीक्षित के ज़रिए होता था, गुना में अभी भी गिरीश इस काम को अंजाम दे रहे हैं।

इतनी बात इसलिए कि भारत के दक्षिण में तमिलनाडु और तमिलनाडु के भी दक्षिण में जिस तूतिकुढ़ी ज़िले के एक छोटे से गाँव एटटायापुरम में मैं हूँ, वहाँ भी सैकड़ों किताबें लेकर एक लगभग 75-80 साल का बुज़ुर्ग बिना थके क़िताबें जमा रहा है। किताबें तमिल में हैं। मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ, से लेकर अम्बेडकर, गाँधी, पेरियार, और सुब्रमण्य भारती सहित अनेक लेखकों की किताबें यहाँ मौजूद हैं जिन्हें ज़ाहिर है, में उन पर छपी तस्वीर से ही पहचान पाता हूँ।

पसीने से तरबतर वो शख़्स लाल शर्ट पहने है और घुटनों तक लुंगी लपेटे अपने काम मे लगा है। कोई तमिल साथी मुझे उससे मिलवाने के लिए आवाज़ देकर बुलाते हैं। "इंगे वा" यहाँ आओ, सुनकर वो सहज अनथकी चौड़ी मुस्कान लेकर आते हैं।

सुब्रमण्यम भारती का दूसरे दिन का कार्यक्रम शुरू होने में थोड़ा वक़्त बाक़ी है। प्रगतिशील लेखक संघ का जलसा है, सुब्रमण्यम भारती के गाँव मे ही। एक बड़ा स्मारक, लगभग 15 फ़ीट की मूर्ति लगी है। स्मारक को दूर से ही बिजली की रंग बिरंगी झालरों से सजाया गया था कल उद्घाटन की शाम। साथ ही भयंकर ज़ोरदार साउंड सिस्टम, जो न आने वालों के घरों में अंदर तक आवाज़ पहुंचाने में सक्षम था और जो आ गए, उनको स्पीकरों से दूर खिसकने पर मज़बूर कर रहा था और बख़ूबी अपना काम कर रहा था। पहले दिन यानि 22 सितंबर, 2018 को रैली में भी काफ़ी उत्साह से बच्चे और बड़े शामिल थे, जवानों की कमी यहाँ भी थी। बिहार से राजेन्द्र राजन, रवीन्द्रनाथ राय, पंजाब से सुखदेव सिंह, आंध्र प्रदेश से पेनुगोंडा लक्ष्मीनारायण, वल्लुरु शिवप्रसाद, राछपालम चंद्रशेखर रेड्डी, केरल से मोहनदास, और तमिलनाडु के सेलम, नागरकोइल, चेन्नई, मदुरै, कोयम्बटूर, पुडुकोट्टई, तिरुनेलवेली और अन्य जगहों से लोग शामिल हुए थे।

बढ़िया भाषण हुए, तमिल में और हिंदी में। फिर बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां।

छोटे से गाँव मे महत्त्वपूर्ण उत्सव जैसा माहौल था।

23 सितंबर को सुबह से परिचर्चा थी। तभी मेरी मुलाकात लालशर्ट धारी बुज़ुर्गवार से हुई।

जो उन्होंने मुझे बताया और जिसका तर्जुमा जो मुझे समझाया गया उसका निचोड़ ये था:

नाम है उनका षणमुगम वेल, रहने वाले हैं तिरुनेलवेली ज़िले के किसी गाँव के। खेती करते हैं, खुद हल बैल चला कर। उम्र हो चली होगी 75-80.

लेकिन असल काम है उनका अपनी साईकल पर लादकर जगह जगह किताबें बेचना। ख़ासतौर पर स्कूलों में, कॉलेजों की लाइब्रेरी में। एक एल्बम भी है उनके पास जिसमें कॉमरेड जीवानन्दा के परिजनों, पुन्नीलन आदि के साथ खींची तस्वीरें हैं। जिसे दिलचस्पी हो, उसे दिखाते हैं वो एल्बम, वरना उन्हें कोई रोब जमाने का शौक नहीं दिखाई दिया।

शहर और ज़िले के लगभग सभी स्कूली बच्चे उन्हें रेड शर्ट grandpa यानी लाल शर्ट वाले दादा के नाम से पुकारते हैं।

काफ़ी ज़िंदगी कम्युनिस्ट पार्टी में काटी, लेकिन किसी बात पर उनका और पार्टी का तालमेल बिगड़ गया सो पार्टी छूट गई। फिर भी लाल शर्ट पहनते हैं। अपना सीना ठोक कर दिखाते हैं, कि पार्टी और लाल रंग यहाँ भीतर रहता है।

ऐसे लोगों के ऐसे जज़्बे देखकर उलट उदाहरणों का भी ख़याल आता है जो अपना पक्ष बदलने के लिए किसी न किसी बहाने के इंतज़ार में ही रहते हैं।

षणमुगम वेल और उनके जैसे तमाम प्रतिबद्ध लोगों को सलाम जो संसाधनों के कम होने का रोना रोये बग़ैर, सरकारी इमदाद और अवार्डों का इनतज़ार किये बग़ैर अपने काम में जुटे और बिना निराश हुए जुटे रहे और 70-80 साल की उम्र, बीमारी, परिवार आदि की तकलीफ़ों के बाद भी न उनके इस यकीन में कोई कमी आई कि इस दुनिया को एक दिन शोषणविहीन बनाएँगे ही, और न उनकी सहज चौड़ी मुस्कान में कोई कमी आई।

- विनीत तिवारी (एटटायापुरम, 23.09.2018)

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