डॉ. अनिल पुष्कर

जरा देखो तो झांककर कि संसद चल रही है

लोकतंत्र बार-बार कहता है “मैं संसद की बैठक में हूँ”

और वो संडास में बैठा हुआ बीड़ी फूंकता है

जहां देश के नीति निर्माता अपने पुट्ठे धरे विराजमान हैं

प्रधानमंत्री देश की नई-नई नीतियाँ उलटा रहा है

एक दुर्गन्ध उठ रही है एक उबाल आने-आने को है

एक अनकहा भभका बुलबुला सा फूटने को है

एक अनचाहा गर्भ गिराया जा रहा है लोकतंत्र की कोख से

और एक अनचाही प्यास और भूख पर कार्रवाई होने को है

देश के पेट का पतीला और हांडी में पकाया जा रहा है जनता का खून

और वो देश की मूत्र्कोशिकाओं में जमा है और जो बिकाऊ है

वो अभी तक बीच आँतों में बम की तरह फटने की प्रतीक्षा में है

संसदीय वाद-विवाद में कुशल आदमी कर रहा है नेतृत्व

वो ताकतों का व्यापार करना भली भाँति जानता है

वो अर्थ की बढ़त को तरक्की बता रहा है

वो अपाहिज बनाने वाली चिकित्सा को फायदेमंद बताता है

नेस्तनाबूद करने वाली योजनाओं को देश के लिए कारगर और मुफीद बता रहा है

वो जब भी दाखिल होता है उधर एक शाही द्वार के भीतर

उसके साथ-साथ जाते हैं तमाम सुरक्षा कर्मी बिना असलहे लिए

तमाम दलों के शीर्ष निर्वाचित सदस्य और उनमें भी

एक अध्यक्ष संसद का पक्ष समर्थक और विपक्ष को इजाजत देता है

मान्यवर कहें अपनी बात – कम शब्दों और निर्धारित अवधि में

कुर्सी पर बैठ या तो गंभीरता से अनौपचारिक हलचलों को ताकता है या फिर

सभा स्थगित कर देने का फरमान जारी करता है एक ठसक के साथ

देश की दाल रोटी पक रही है देश के इस संडास में

तरक्की चल रही है देश के संडास में

तय हो रहे हैं फैसले देशहित और जनहित के इस संडास में

सामने एक शख्स खड़ा है जो कि पुराने वाकयात दोहराता है

गुजरे जमाने का वाहियात इतिहास दोहराता है

और मुस्तकबिल की ओर देखता है

देखता है सवाल पेश हो रहे हैं

ख्याल आया किधर जाएँ कि ख्वाहिशें कमजोरियों के हवाले न हों

वो दोहराता है दुनिया तेजी से बदल रही है

हमें उसी रास्ते पर चलना है पीछे छूट गयी चीजें वापिस लाना है

इस तरह वो एक नए नक़्शे पर अपनी नज़र गड़ाता है

कहता है जितनी ताकतें इंसान को मिली हैं

हम उसी दरवाजे पर खड़े हैं इंसान खड़ा है

हमें वो ताकत हासिल करना है

दुनिया के नक़्शे में आगे बढ़ना है

आइये हम आपका रुख साफ़ करने को संसद के भीतर लिए चलते हैं

जहां इस वक्त सत्र के आरम्भ में पक्ष विपक्ष और निष्पक्ष सभी मौजूद हैं

सबके इरादे मजबूत हैं और समर्थन के लिए सबकी हथेलियाँ खुली हैं

कि कब कितनी रहमत बरसे कि मुद्दा बहुसंख्यक सहमतियों के पार पहुंचे

याकि सर्वसहमति बने और सुविधायें बहाल हो यानि

संसद को तरीके से लोकतंत्र खाने को मुहाल हो

एक ख्वाहिश है

मुद्दा ये नहीं कि कितने मरे भूख से कोई कहे

कितने दंगों के शिकार इन नीतियों की भेंट चढ़े

कितने बंटवारे की रस्म अदायगी में मारे गये

कितने अर्थतंत्र की उदारता में गुमशुदा हुए

उनकी इस बात में दिलचस्पी है कि राजनायकों के नफे और नुक्सान से

तय होगा सूचकांक और तय हो लोकतंत्र का भविष्य

जो बिना रीढ़ और दांत के जबड़े खोले खड़ा है

देखो जालिम के सिंहासन पे उदारता का प्रतीक

तरक्की, बेहतरी की खातिर देश का प्रधानमंत्री जिद पर अड़ा है.